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कोरोनाकाल में बदलना चाहिए ‘विद्यालय शुल्क का प्रारूप’

ज्वलन्त विषय

आरती जायसवाल (साहित्यकार, समीक्षक)

‘कोरोना’ महामारी के बढ़ते संक्रमण के बीच जब सबकुछ ऑनलाइन है तब ऐसी परिस्थितियों में हमारे देश के कुछ निजी विद्यालयों ने अपनी मानवता और आदर्शवादिता का परिचय देते हुए ‘जब तक स्कूल नहीं, तब तक फ़ीस नहीं’ का आदेश जारी कर दिया है। उनके प्रति अभिभावक कृतज्ञता से भर उठे हैं और यही उचित भी है ।

जब विद्या और विद्यालय बाज़ारवाद का रूप ले चुके हैं तब हानि और लाभ दोनों निवेशक के हिस्से में आता है । बाज़ार तो मात्र माँग और आपूर्ति के नियम पर स्थिर रहता है। जब सेवा नहीं तो शुल्क नहीं ,क्रय नहीं तो मूल्य नहीं। इस अवस्था में यही निर्णय स्वीकार्य और सराहनीय होगा। जब विद्यालयों के खुलने की अभी दूर-दूर तक कोई सम्भावना नहीं दिखाई दे रही है । (अक्टूबर में सम्भव भी है और नहीं भी) और जब विद्यालय नहीं तो ‘ऑनलाइन शिक्षण शुल्क के अतिरिक्त अन्य शुल्क नहीं।’ इससे तो अच्छा होगा कि इस वर्ष मात्र अति आवश्यक पढ़ाई करवाई जाए उसी आधार पर बच्चों की परीक्षा हो तथा उन्हें अगली कक्षा में प्रवेश दिया जाए। जब कि इसके विपरीत कुछ विद्यालयों ने अपनी निरंकुश छवि और अमानवीयता का परिचय देते हुए शिक्षण शुल्क के अतिरिक्त एडमिशन, ऐक्टिविटी, बिल्डिंग, ट्रांसपोर्टेशन, लैब इत्यादिक अभिभावकों के ऊपर लाद दिये हैं।

शिक्षा ऑनलाइन हो रही है तब प्रत्येक अभिभावक पुस्तकें/कॉपियाँ ड्रेस इत्यादि क्यों क्रय करें ? अधिकांश विद्यालयों के विद्यार्थी बिना ‘कोचिंग बूस्टर’ के अच्छे अंकों से उत्तीर्ण नहीं होते किन्तु सभी क़िताब-कॉपियाँ और स्कूल ड्रेसेज़ बेचने हेतु विकल हो रहे हैं। कोरोना काल में उन्हें अपना धन्धा चौपट होता दिखाई दे रहा है किन्तु अभिभावक भी क्या करें? उनकी अपनी विवशता है। उपर्युक्त शुल्कों के सम्बन्ध में विद्यालय प्रबन्धन किसी भी प्रकार के प्रश्न का उत्तर देने के स्थान पर अभिभावकों से दुर्व्यवहार पर आमादा हो रहे हैं।

ऐसी विषम परिस्थिति में जब अभिभावक भी आर्थिक संकट से जूझ रहे हों विद्यालयों की विद्यालय खोलने के सम्बन्ध में प्रारम्भिक आधार के रूप में स्थापित समाज सेवा की भावना लुप्तप्राय हो गई है। भारत सरकार को इस दिशा में हस्तक्षेप करके निजी विद्यालयों हेतु कोरोनाकाल में जब शिक्षण ऑन लाइन हो रहा तो शुल्क सम्बन्धी नया प्रारूप लागू करना चाहिए । ताकि भारत के स्वर्णिम भविष्य बच्चे अपनी शिक्षा जारी रख सकें।

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