एक ही परिवार के पाँच सदस्य फन्दे से लटक गये!

● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

यह देश कभी धन-धान्य से परिपूर्ण था; किन्तु जबसे ‘न्यू इण्डिया की मोदी-सरकार’ ने भारत मे क़दम रखे हैं, जनजीवन पूरी तरह से अस्त-व्यस्त हो गया है। हमारे घर के भोजन की थाली आज इतनी महँगी हो गयी है कि हमे सोचना पड़ता है– क्या खायें और क्या न खायें? ऋण लेना आसान कर दिया गया है; किन्तु उसका ब्याज इतना बढ़ा दिया गया है कि एक सामान्य जीवन जीनेवाला सत्यनिष्ठ व्यक्ति उसे आसानी से चुका ही नहीं सकता। यही कारण है कि ऋण लेने के बाद उसे न चुका पाने के कारण बैंकों तथा अन्य स्थानो से इस प्रकार की धमकियाँ दी जाती हैं कि किसी स्वाभिमानी व्यक्ति के लिए जीवन-मरण का प्रश्न बन जाता है; क्योंकि वैसी स्थिति मे व्यक्ति अपनी प्राथमिकताएँ सुनिश्चित कर नहीं पाता। वह व्यक्ति पहले अपने परिवार के भोजन का प्रबन्ध करे अथवा ऋण को ही चुकाता रहे?

इसी का जीवन्त किन्तु ‘न्यू इण्डिया की मोदी-सरकार’ की ग़लत आर्थिक नीतियों के गालों पर भरपूर तमाचा मार रही है, ५ जून प्रात: अथवा ४ जून की विलम्ब रात्रि की वह मर्मान्तक घटना, जिसमे एक ही परिवार के पाँच सदस्य-सदस्याओं :– बूढ़ी मा, पति-पत्नी तथा दो पुत्रों, ने फन्दे से लटककर अपनी ग़रीबी से विमुक्ति पा ली थी।
यह घटना उस देश के शासन का संचालन करनेवालों के लिए चुल्लूभर पानी मे डूब मरनेवाली है।

मर्मबेधक घटना बिहार के समस्तीपुर ज़िले के मऊ धनेशपुर गाँव का है, जहाँ एक ही परिवार के पाँच सदस्यासदस्य :– सीतादेवी (६५ वर्ष), मनोज झा (४२ वर्ष), सुन्दरमणि (३८ वर्ष), सत्यम (१० वर्ष) तथा शिवम (७ वर्ष) ने भुखमरी से तंग आकर आत्महत्या कर ली है; भुखमरी इसलिए कि कहीं से लिये गये ऋण को चुकता न कर पाने की स्थिति मे अपनी इहलीला को समाप्त कर लेना ही श्रेयस्कर समझा।

सत्य तो यह है कि वर्तमान सरकार अपनी जनता के हितों के साथ क्रूर छल करती आ रही है। महँगाई, बेरोज़गारी, भ्रष्टाचार तथा हत्या चरम पर पहुँच चुकी हैं; आर्थिक नीति पूरी तरह से डगमगा चुकी है। उसे नियन्त्रित करने के लिए कथित मोदी-सरकार एक द्वार खोलती है तो उसी से लगा हुआ दूसरा द्वार बन्द कर देती है, जिससे जनता उसी मे कसमसा कर रह जाती है।

वास्तविकता यह है कि इस सरकार की संवेदना मर चुकी है।

‘न्यू इण्डिया की मोदी-सरकार’ की जनघाती नीतियों मे यदि बदलाव नहीं आया तो वह भी समय आनेवाला है, जब स्वाभिमानी मध्यम वर्ग का परिवार याचक न बनकर, आत्महत्या करना पसन्द करेगा। प्रश्न है, वह भूख से तिल-तिलकर कब तक मरता रहेगा?

समाज को शासक बाँट चुका है, इसलिए फ़िलहाल, जनक्रान्ति की सम्भावना दिख नहीं रही है, फिर भी विचार-स्तर पर क्रान्ति का बीजवपन (बीज बोना) करने की आवश्यकता आ चुकी है; बोइए और समुचित समय पर काटिए।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ६ जून, २०२२ ईसवी।)