अतीत के झरोखे से : छायावाद के चतुर्थ स्तम्भ महादेवी जी के साथ पृथ्वीनाथ पाण्डेय-द्वारा की गयी एक भेंटवार्त्ता

"आज की कविताओं में दर्शन नहीं है"--- महादेवी वर्मा

महादेवी वर्मा से भेंटवार्त्ता करते डॉ॰ पृथ्वीनाथ पाण्डेय

● महीयसी महादेवी वर्मा की मृत्युतिथि (११ सितम्बर) पर विशेष

मैंने महादेवी जी के साथ अस्सी के दशक में एक मुक्त भेंटवार्त्ता की थी; तब मैं विद्यार्थी और पत्रकार की भूमिका में भी होता था। उसी भेंटवार्त्ता के कतिपय अंशों को यहाँ प्रस्तुत किया गया है :–

पृथ्वीनाथ– आपने जब काव्यक्षेत्र में प्रवेश किया था तब का साहित्यिक परिवेश कैसा था?
महादेवी– अतीव सम्भावनाओं से विकसित था, उस समय का साहित्यिक परिवेश। १९१७ में मैं यहाँ इन्दौर से आयी थी। ‘चाँद’ निकलता था। मेरी कई रचनाएँ छपीं भी। सौभाग्य से सुभद्रा जी (सुभद्रा कुमारी चौहान) के दर्शन हो गये। काफ़ी दिनों तक हम दोनों मिलकर कविता लिखते थे।

पृथ्वीनाथ– आलोचकों ने आपको भी नहीं बख़्शा। छायावाद के घेरे में आपको लाकर खड़ा कर दिया है। वैसे आपकी ‘यामा’ को पढ़ने के बाद आपको छायावादी परम्परा में लपेटने का कोई औचित्य नहीं है, आपका क्या विचार है?
महादेवी– देखिए! जो जैसा होता है वैसा ही मूल्यांकन करने का प्रयास करता है। आज का आलोचक ‘निन्दा’ के लिए लिखता है। उसकी दृष्टि एक ‘निन्दक’ की होती है। वह विषय की गहराई तक उतरे या न उतरे, उसके लिए कोई अन्तर नहीं पड़ता। मैं आठवीं में थी तब ‘नीहार’,’दीपशिखा’ और ‘प्रथम आयाम’ लिखी थी।

पृथ्वीनाथ– आप पद्य रचती हैं और गद्य भी लिखती हैं। ऐसे में दोनों की भावभूमि कैसे रचती हैं?
महादेवी– जब कविता रचती हूँ तब रागात्मक अभिव्यक्ति देती हूँ। जब विचारों की गहराई में डूबने लगती हूँ तब गद्यरचना करती हूँ; और यह तो आपको भी स्वीकार करना पड़ेगा कि व्यक्ति उसी क्षेत्र में अधिक-से-अधिक कार्य करना चाहता है, जिसमें उसे सफलता मिलती जाती है।

पृथ्वीनाथ– आज जिस प्रकार की कविताएँ लिखी जा रही हैं, क्या वे भविष्य के प्रति कहीं आश्वस्त करनेवाली जान पड़ती हैं?
महादेवी– आज की कविताओं में दर्शन नहीं है। कविताओं में व्यग्रता ज़रूर है; किन्तु धरातल उपयुक्त नहीं है। जब ‘मिशन’ होता है तब ‘लगन’ आती है। जीविका और रचनाधर्मिता का साथ-साथ शुद्धता से निर्वाह नहीं किया जा सकता।

पृथ्वीनाथ– आप बहुत समय से अस्वस्थ चल रही हैं। आपकी आर्थिक स्थिति बहुत उन्नत है। ऐसे में, आप विदेश जाकर उपचार क्यों नहीं करातीं?
महादेवी– देखो भाई! अन्तिम समय अपने देश की धरती पर यह शरीर गिरे। अब विदेश जाकर क्या करूँगी; शरीर ढल ही चुका है।

अन्तत:, महीयसी महादेवी वर्मा का ११ सितम्बर, १९८७ ईसवी को इलाहाबाद में शरीरान्त हो गया था। हम उन्हें और उनकी कालजयी रचनाशीलता को प्रणाम करते हैं।

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