संजय सिंह, सांसद, आप ने पेयजल एवं स्वच्छता मिशन पर उठाए सवाल! | IV24 News | Lucknow

“गङ्गे! तव दर्शनात् मुक्ति:”

★ आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

नीचे दिये गये चित्र को ध्यानपूर्वक देखें। कालिमा और कालुष्यमय रूप प्रयागराज-स्थित गङ्गानदी-जल का दिख रहा है। कितना विकृत और विवर्ण हो चुका है! गङ्गा के मौलिक जल से इतर बीभत्स जल का अवलोकन करते ही उस जल के प्रति मन में कुत्सित और कलुषित विचार उत्पन्न होने लगते हैं। लोग धार्मिक भावनाओं से ओत-प्रोत होकर गङ्गाजलावगाहन करते हैं; परन्तु विवेक पर भावना का भार इतना अधिक रहता है कि श्रद्धालु ‘शुचिता-अशुचिता’ का बोध नहीं कर पाते; हर-हर गङ्गे का समवेत अथवा एकाकी स्वर आत्मतुष्टि का विषय तो हो सकता है, जो व्यष्टिमूलक है; समष्टिमूलक नहीं। ऐसा इसलिए कि समष्टिगत स्वर “एकोहम् सर्वेषाम्” की ओर अग्रसर करता है; “सर्वे भवन्तु सुखिन:” की अभ्यर्थना करता संलक्षित होता है।

‘हिन्दुत्व’ का एक अध्याय ‘गङ्गा’ भी है; किन्तु ‘आजन्म यज्ञोपवीतधारी (जनेऊधारी) हिन्दू’ अपनी विकृत की जा रही संस्कृति के प्रति सजग नहीं है। ऐसा इसलिए कि उसका यज्ञोपवीत मात्र कुछ धागों का समूह है, जिसके प्रति उसकी आस्था ‘अवसरवादी’ ही दिखती आ रही है। यज्ञोपवीतधारी यही नहीं जानते कि ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य के लिए कौन-सा यज्ञोपवीत शुद्ध और उपयुक्त रहता है। ‘ब्रह्मग्रन्थि’ की रचनाशैली का भी बोध नहीं। ऐसे में, लगभग सभी कर्मकाण्डी अपावित्र्य के साथ कर्मकाण्ड को ‘परम्परा’ के रूप में निर्वहण करते आ रहे हैं।

वास्तव में, प्रयागराज ही नहीं, जिन-जिन नगरों से होकर गङ्गा की जलधारा निर्गत हो रही है, उन-उन नगरों में लक्षित होती गङ्गा अपनी मौलिकता खो चुकी है।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २० मार्च, २०२१ ईसवी।)