दिवाकर दत्त त्रिपाठी –
वो लेकर गोद में बच्चे को मुहब्बत सिखाती है ।
वो माँ, जो रोजमर्रा की हमें आदत सिखाती है ।
ये हिंदुस्तान की तहजीब सिखाती है मुहब्बत ,
किसी को कब कहाँ ये यार अदावत सिखाती है ।
कोई इंसान, पैदाइश से बागी नहीं होता
आदमी को जुल्म की हद, बगावत सिखाती है ।
मेरा धिक्कार है , उस मजहब को, उस जाति को यारों,
जो कि इंसान को बस कत्लो – गारत सिखाती है ।