अदृश्य ‘जियो युनिवर्सिटी’ को ‘अग्रणी संस्थान’ घोषित करने का औचित्य?

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
(प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक)

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय-


मुकेश अम्बानी ने कुछ ही वर्षों में ‘मोबाइल-जगत्’ में ‘जियो’ उत्पाद लाकर ऐसी क्रान्ति कर दी है, जिसकी चिनगारी आज भी दिख रही है। ‘जियो’ शब्द तो वैसे ही उत्साहवर्द्धक है; अर्थात् ‘जीते रहो’।

अब यह ‘जियो’ डिजिटल दुनिया में सेंध लगाने के बाद ‘शीर्षस्थ शिक्षा-जगत्’ यानी विश्वविद्यालयों के सामने भी ताल ठोंककर सामने आ चुका है; अन्तर इतना है कि डिजिटल दुनिया में जियो का अस्तित्व लक्षित हो रहा था, परन्तु शिक्षाजगत् में बिना हाथ-पाँव के, बिना अंग के अर्थात् ‘अशरीरी कामदेव’ की तरह से सताने के लिए आ चुका है। अब एशिया के सर्वाधिक धनाढ्य उद्योगपति मुकेश अम्बानी की एक ऐसी युनिवर्सिटी विज्ञापित की जा रही है, जिसका नाम ‘जियो युनिवर्सिटी’ है; और वह मात्र नाम तक सीमित है; वह सिर्फ़ एक काग़ज़ी युनिवर्सिटी है। दूसरे शब्दों में– एक अजन्मे बच्चे की तरह से है। सन्तान पैदा हुई ही नहीं; नामकरण कर दिया गया; सरकारी-ग़ैर-सरकारी हिजड़े ढोल-ताशा लेकर ‘बधाई’ देने रोज़ पहुँच रहे हैं।

धन की महिमा होती ही है ऐसीे! सर्वाधिक आश्चर्य यह है कि ‘जियो युनिवर्सिटी’ मात्र फाइल में है– न तो भवन है और न ही वह ‘विश्वविद्यालय अनुदान आयोग’ के मानकों के अनुरूप है। उसके बाद भी नरेन्द्र मोदी और अमित शाह के सबसे क़रीबी उद्योगपति मुकेश अम्बानी के इस एकमात्र छद्म ‘जियो युनिवर्सिटी’ को ‘अग्रणी संस्थान’ / ‘विशेष दर्ज़ा’ केन्द्र-सरकार ने दिलवा दिया, जबकि ‘विशेष दर्ज़ा’ पाने के लिए ११४ शिक्षण-संस्थानों ने आवेदन किया था।

उल्लेखनीय है कि ऐसा अपवित्र खेल करने के लिए प्रकाश जावड़ेकर ने ‘ग्रीन फील्ड कैटगरी’ का सहारा लिया है, जिसके अन्तर्गत युनिवर्सिटी का अस्तित्व हो अथवा न हो, ‘विश्वविद्यालय अनुदान आयोग’, उसे ‘विशेष दर्ज़ा’ दे सकता है और सारी सुविधाएँ-साधन भी।
ऐसे में, प्रश्न है, जो शिक्षण-संस्थान अस्तित्व में बने हुए हैं, उनकी कार्यप्रणाली और अध्ययन-अध्यापन-पद्धति के आधार पर उनका मूल्यांकन न करते हुए, उन्हें ‘विशेष दर्ज़ा’/ ‘अग्रणी संस्थान’ का स्थान न देकर, ‘अदृश्य जियो युनिवर्सिटी’ को क्यों दिया गया?

(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, इलाहाबाद; १५ जुलाई, २०१८ ईसवी)

 

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