सई नदी की करुण कथा : पौराणिक और ऐतिहासिक नदी मर रही है

यह सद्भाव ही प्रेम है

प्रेम जितना बढ़ेगा काम उतना अच्छा होगा। प्रेमपूर्वक किया गया काम अवश्य, सुंदर, शुभ, कुशल और सुफल होता है। झुंझलाहट से किया गया काम अधकचरा ही रहता है।

प्रेम अपने भीतर ही जागता है सत्यनिष्ठा के कारण। सत्ज्ञान ही सतकर्म द्वारा सद्गुण का निर्माण करता है जिसे सद्भाव कहते हैं। यह सद्भाव ही प्रेम है। सरल व्यवहार, मधुर वाणी, कोमल स्पर्श भी प्रेम को जगाते हैं।

लेकिन प्रेम की भीख जो लोग बाहर दूसरे भिखारियों से मांगते है, उन्हें कभी प्रेम नहीं मिलता। एक भिखारी दूसरे भिखारी को भला कैसे प्रेम दे सकता है..!

वास्तव में प्रेम पाने की वस्तु नहीं बल्कि देने की वस्तु है।
जो प्रेम को दूसरों से पाना चाहता है, इसका अर्थ यह है कि उसके भीतर खुद प्रेम विकसित नहीं है।

प्रेम के बिना जो रूखा-सूखा जीवन जी रहा है उसमे न रस होगा, न उत्साह होगा, न आनंद होगा, न संवेदना होगी, न मैत्री होगी, न श्रद्धा होगी, न सम्बन्ध होंगे, न अनुशासन होगा।

प्रेम के बिना कोई भी मनुष्य स्वाभाविक रूप से कर्मठ नहीं होता। पाखण्ड या विवशता के वशीभूत होकर ही वह कर्म करता है।

✍️🇮🇳 (राम गुप्ता, स्वतन्त्र पत्रकार, नोएडा)