सख्त से सख्त सजा देने से अपराध होने या अपराधी बनने बंद हो जाते हैं क्या?

गज़ब सोचते हैं ये बुद्धिजीवी लोग भी, “प्यास लगने के बाद ही कुआँ खोदना भी आजकल शायद समझदारी की श्रेणी में आ चुका है।”

अपराधी को सख्त सज़ा दिए जाने के कानून से भला मेरिटोक्रेसी के कानून से क्या मुकाबला?

अपराधी तो वैसे भी जंगली जानवर तुल्य होता है सभ्य समाज में।

हमने मौजूदा डेमोक्रेसी (भीड़तंत्र) को मेरिटोक्रेसी (पात्रतानुसार कर्म, पद, सम्पदाओं के वितरण का कानून) पर लाने हेतु उनसे सवाल किया था।

वैसे सख्त से सख्त सज़ा देने से अपराध होने या अपराधी बनने बंद हो जाते हैं क्या?

हमारे देश या यूँ कहें पूरी दुनिया का कुकर्मी इतिहास साधारण मनुष्यों के लिए सख्त सज़ा देने के कानूनों से भरा पड़ा है।
लेकिन न अपराध कम हुए न अपराधी!

“वजह गधे को जबरदस्ती घोड़ा और घोड़े को मजबूरन गधे की रेस में दौड़ाना।”

राजनैतिक मेरिट पर बात करना मतलब खुद के पैर पर कुल्हाड़ी मारने जितना है हम समझ सकते है मौजूदा राजनीति में लगभग 0.01% भी नहीं जो राजनीति वरीयता, पात्रता, अहर्ता अर्थात SQ leval की श्रेणी में आते हों यदि कोई हो तो उनके लिए टेस्ट पास करने की सार्वजनिक व्यवस्था भी उपलब्ध है।
यदि कोई है तो सामने आये सेल्फ असेसमेंट हेतु अपने ब्रह्मत्व अर्थात लीडरशिप क्वालिटी को साबित करें।
“चपरासी से लेकर राष्ट्रपति और पंच-सरपंच से लेकर प्रधानमंत्री तक और हाँ उन्हें नकल करने की भी खुली छूट होगी।”

कोई हो जो खुद को फ़िलहाल लीडर मानता हो तो उन्हें कहिये सम्पर्क करें और देश के नागरिको के सामने अपनी पात्रता सिद्ध करें।

अपराधियों का नहीं अपराध का इलाज़ होना न्यायसंगत है इसपर कार्य करना सभ्य जनों के लिए हितकर होगा… यही न्यायनेतृत्वकर्ताओं का भी मत है।
अगर सख्त सजा देने से अपराध खत्म होते तो मान्यवर अंग्रेजों या मुगलों या गुप्तकालीन धूर्त सामंतों के समय ही हो जाते।

जिस देश में न्यायशील व्यवस्था स्थापित हो जाया करती है वहां तीन पद स्वतः खत्म हो जाया करते हैं पहला CA, दूसरा वकील और तीसरा जज का।
आर्थिक व मानवीय अपराध सिर्फ धूर्त शासनव्यवस्था की देन हुआ करती है।

किसी भी देश में मानवीय जेल होना या बनाना ही अमानवीयता व जघन्य अपराध की श्रेणी में आता है।

जिसदिन मौजूदा संविधान को ही अक्षरशः नागरिकों को समझा दिया जायेगा, मानवीय जेलों में सिर्फ जानवर बांधे जाने लगेंगे, हलाकि मौजूदा संविधान भी अभी सुव्यवस्थित नहीं है उसे सुव्यवस्थित किया जाना अनिवार्य है न्यायशील नियम निति निर्णयों द्वारा।

इसलिए देश के प्रत्येक नागरिक को फ़िलहाल संविधान की उद्देशिका में उल्लिखित सामाजिक न्याय, आर्थिक न्याय व राजनैतिक न्याय का न्यायोचित विश्लेषण मात्र समझाने की हिम्मत जुटाएं मौजूदा जिम्मेदार लोग।

•वे बुद्धिजीवी सिर्फ इतना बताएं की सामाजिक न्याय दिए जाने के दायरे में क्या क्या आता है?
“पूर्ण शिक्षा व प्रशिक्षण वो भी निःशुल्क, अनिवार्य व अबाध्य दिया जाना सामाजिक न्याय के दायरे में आता है या नहीं?”

•आर्थिक न्याय दिए जाने के दायरे में क्या आता है?
“क्या प्रतिपरिवार पात्रतानुसार एक रोजगार का अवसर व उससे जुड़े संसाधन दिया जाना आर्थिक न्याय के दायरे में आता है या नहीं?”

•और राजनैतिक न्याय दिए जाने के दायरे में क्या क्या आता है?
“क्या देश के नागरिकों को न्यायिका, विधायिका व कार्यपालिका में नियम निति निर्णयों को बनाने से पहले संवैधानिक पदाशीन लोगों को चुनने व उन नियम निति निर्णयों को लागू करने से पहले संवैधानिक मालिकों अर्थात नागरिकों का मताधिकार (वोटिंग पावर) और उन्हें पदच्युत/पदमुक्त किये जाने हेतु विशेषाधिकार (वीटो पावर) दिया जाना राजनैतिक न्याय के दायरे में आता है या नहीं?”

इतना जानने के बाद बाकी देश के नागरिक स्वतः न्यायशील व्यवस्था स्थापित कर लेंगे।

यक़ीन मानिये मौजूदा बड़े बड़े दिग्गज बुद्धिजीवियों का धुँआ ट निकल जायेगा उपरोक्त तीनों न्याय की व्याख्या करने मात्र से, और उनकी अबतक की सभी बदमासियां सार्वजनिक हो जाएँगी।

इधर वे व्याख्या करना शुरू करेंगे और खत्म होने से पहले ही अमानवीयता व जघन्य अपराधी की श्रेणी में स्वयं सिद्ध हो जाएँगे।

गज़ब नौटँकी है दुनिया की पहले अपराधी को जघन्य अपराध करने का मौका दिया जाये फिर उसे धूर्तों द्वारा बनाये कथित सख्त सज़ा के दायरे में लाकर उसकी जिंदगी नरक बनाई जाये या फिर उसे शरणागत बनाकर जीवनभर अपने फायदे के लिए अपराधबोध से ग्रसित कर उसके मानवीय अधिकारों को छीन लिया जाये।

अर्थात मानसिक गुलाम बनाकर रखा जाये।

अद्भुत है यह कला हज़ारों सालों से इन धूर्तों की यही तो होता आया है आपके मेरे समाज में अबतक।
कुछ भी नया नहीं, कुछ भी नहीं…

!!शुभकामना!!

✍️?? (राम गुप्ता, स्वतन्त्र पत्रकार, नोएडा)