‘राष्ट्रीय हिन्दी-दिवस’ (१४ सितम्बर) के अवसर पर विशेष प्रस्तुति
●आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
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देश की अधिकतर जनता हिन्दी लिखना, पढ़ना तथा समझना जानती है। सम्पूर्ण देश मे साहित्य की दोनो विधाओँ (केवल दो विधाएँ होती हैंँ।) पद्य और गद्य के समस्त विषयोँ पर आवश्यकता से अधिक पुस्तकेँ प्रकाशित हो चुकी हैँ; परन्तु स्वतन्त्रता-प्राप्ति के ७८ वर्षों बाद भी ज्ञान-विज्ञान, कृषि, अभियान्त्रिकी, प्रविधि, प्रौद्योगिक आदिक विषयोँ पर हिन्दी मे पुस्तकोँ का अभाव है। इतना ही नहीँ, इन विषयोँ पर जितने भी शोध आलेख/शोधपत्रादिक राष्ट्रीय आयोजनो मे विद्यार्थियोँ और अध्यापकोँ-द्वारा प्रस्तुत किये जाते रहे हैँ, अँगरेज़ी मे होते हैँ।यदि वही शोधपत्रादिक हिन्दीभाषा में होते तो विद्यार्थी और अध्यापक अपनी विचारजीविता और बौद्धिकता को सुतार्किक रूप मे प्रस्तुत कर सकते थे; परन्तु हिन्दी को मातृभाषा माननेवाले भारतीय भी अभारतीय भाषा अँगरेज़ी का महिमा-मण्डन कर स्वयं को प्रतिस्पर्द्धा के बाज़ार मे उतार चुके हैँ।
भौतिकविज्ञान, जीवविज्ञान, वनस्पतिविज्ञान, रसायनविज्ञान, प्राणिविज्ञान, कम्प्यूटर विज्ञान, ज्योतिर्विज्ञान, मौसमविज्ञान, भूविज्ञान, प्रकृतिविज्ञान, अन्तरिक्षविज्ञान, पर्यावरणविज्ञान, पारिस्थितिकी इत्यादिक विषयोँ की शिक्षा-प्रशिक्षा कहनेभर के लिए हिन्दी-माध्यम मे होती है, जबकि व्यवहार मे अँगरेज़ी-माध्यम को ही प्रोत्साह किया जाता रहा है। यदि उक्त विषयोँ का अध्ययन-अध्यापन हिन्दी मे हो और हिन्दी मे लिखी गयी मौलिक पुस्तकोँ को अध्ययन करने के प्रति विद्यार्थियोँ को अभिप्रेरित किया जाये तो हमारी हिन्दीभाषा शिक्षा के उत्तुंग शिखर पर समासीन होकर समस्त विद्यार्थियोँ को अपनी उपयोगिता-महत्ता का प्रसाद बाँटती संलक्षित होगी।
जलयान, सामान्य वायुयान, हेलीकाप्टर तथा युद्धक विमान तथा पैराशूट-निर्माण की प्रौद्योगिकी को समझानेवाली पुस्तकेँ हिन्दीभाषा में उपलब्ध नहीं हैं। चिकित्साविज्ञान की मानक पुस्तकेँ हिन्दीभाषा मे प्रकाशित नहीँ हो पायी हैँ। इनका प्रमुख कारण यह है कि उक्त सेवाओँ के लिए समस्त पुस्तकेँ अँगरेज़ी-भाषा मे उपलब्ध हैँ। उन क्षेत्रों मे अँगरेज़ी की घुसपैठ बनी हुई है। आश्चर्य है कि अतिरिक्त प्रदर्शन के साथ देश-देशान्तर मे 'विश्व हिन्दी-सम्मेलन' का आयोजन होता आ रहा है; लाखोँ रुपये बरबाद किये जाते रहे हैँ; परन्तु कभी विज्ञान-प्रौद्योगिकी-विषय के अध्ययन-अध्यापन हिन्दी-माध्यम मे कराये जाने की समवेत स्वर मे माँग नहीँ की गयी। हमारे विद्यार्थियोँ और अध्यापकोँ ने भी व्यवहार-स्तर पर हिन्दी-माध्यम मे पठन-पाठन की व्यवस्था बनाने की प्रभावकारी ढंग से कभी माँग ही नहीँ की, अन्यथा आज हिन्दी की तस्वीर कुछ और ही होती।
विज्ञान और प्रौद्योगिकी के अत्याधुनिक पक्षोँ को विश्व के प्राय: प्रत्येक देश तक पहुँचाया गया है। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र को सुचारु रूप से संचालित करने, समस्त उलझनो को सुलझाने तथा समस्याओँ का निराकरण करने के लिए अत्याधुनिक यन्त्रोँ और उपकरणो के आविष्कार-निर्माण किये गये थे। उनकी उपादेयता तब सिद्ध हुई जब उनका उपयोग ब्रह्माण्ड, चिकित्सा, शिक्षा-प्रशिक्षा, सूचना-प्रौद्योगिकी, कृषि-पशुपालन, यान्त्रिकी- अभियान्त्रिकी, परमाणुशक्ति, पारम्परिक-अपारम्परिक ऊर्जा-स्रोत, अन्तरिक्ष, अर्थव्यवस्था, खेल, पर्यटन आदिक क्षेत्रोँ में किये गये थे।
अब हम अभियान्त्रिकी-विषय की उपयोगिता और महत्ता की परख ‘हिन्दी’ के सन्दर्भ मे करेँगे।
अभियान्त्रिकी के क्षेत्र मे हिन्दी
अभियान्त्रिकी एक प्रकार का कला, विज्ञान है तथा व्यवसाय भी। इसकी सहायता से पदार्थ के गुण को उन संरचनाओँ और यन्त्रोँ के बनाने मे, जिनके लिए यान्त्रिकी के सिद्धान्त और उपयोग आवश्यक है, मानवोपयोगी बनाया जाता है। अभियान्त्रिकी शब्द अतीव व्यापक है और इसका अर्थ भी। इसके अन्तर्गत नाभिकीय अभियान्त्रिकी (न्यूक्लियर इंजीनियरिंग) आती है, जिसमे उच्च वैज्ञानिक और प्राविधिक क्षेत्र, श्रमिक नियन्त्रण प्रबन्धन-कार्यक्षमता, समय और गति का अध्ययन आदिक सम्मिलित हैँ। ये प्रायोगिक विज्ञान के विस्तृत क्षेत्रोँ को प्रभावित करते हैँ। इतना ही नहीँ, इस अभियान्त्रिकी का विस्तार कल्पनातीत है। यही कारण है कि इसकी उपयोगिता सैन्य (थलसेना, नौसेना तथा वायुसेना) असैन्य कार्योँ (पुल, बाँध, सड़क, भवन आदिक के निर्माण) के लिए महत्त्व की रही है। अभियान्त्रिकी के अनेक भाग हैँ :– असैनिक अभियान्त्रिकी, यान्त्रिकी अभियान्त्रिकी, वैद्युत् अभियान्त्रिकी, कृषि अभियान्त्रिकी, रासायनिक अभियान्त्रिकी, खनन् अभियान्त्रिकी, कम्प्यूटर अभियान्त्रिकी, धातुनिस्तारण अभियान्त्रिकी, यान्त्रिक अभियान्त्रिकी आदिक।
इस प्रकार हमने अभियान्त्रिकी के विकास, स्वरूप तथा व्याप्ति को सम्यक् रूपेण ग्रहण कर लिया है। हमारे देश के विद्यार्थियोँ के लिए उपर्युक्त अभियान्त्रिकी के बहुआयामिक रूप दृष्टिगत होते है; परन्तु दु:ख और खेद का विषय है कि उक्त समस्त सम्भागोँ मे हिन्दी-माध्यम मे न तो शिक्षा होती है और न ही प्रशिक्षा। इसका मुख्य कारण है कि अभियान्त्रिकी के क्षेत्र मे प्रवेश-परीक्षा से लेकर शिक्षा-प्रशिक्षा तक सभी कार्य-व्यवहार 'अँगरेज़ी' मे ही दिखते हैँ। शासन-स्तर पर भी अँगरेज़ी को ही प्राथमिकता दी जाती रही है, प्रभावस्वरूप समग्र अभियान्त्रिकी-परिवेश मे हिन्दीभाषा के प्रयोग को हतोत्साह किया जा रहा है। ऐसा नहीँ कि देश में योग्य लेखकोँ का अभाव है, अभाव है तो शासनस्तर पर इच्छाशक्ति का। देश की सरकार व्यवहार-स्तर पर 'एक राष्ट्र-एक शिक्षा' घोषित करने से कतराती आ रही है।
शिक्षा-जगत् मे जितने भी सामान्य, विशेष तथा प्राविधिक-प्रौद्योगिकी-विषय हैँ, उनकी एकरूपता सम्पूर्ण देश मे लागू करने की आवश्यकता है। इसके लिए अँगरेज़ी मे लिखी गयी पाण्डुलिपियोँ के स्थान पर देवनागरी लिपि और हिन्दीभाषा मे लिखी गयी पाण्डुलिपियोँ को शासन और शिक्षण-संस्थानस्तर पर प्राथमिकता दी जाती तो हमारी हिन्दीभाषा का ज्ञान-विज्ञान और प्राविधिक- प्रौद्योगिकी/तकनीकी क्षेत्रोँ मे कल्पनातीत विस्तार होता तथा तकनीकी हिन्दी-शब्दावली और पारिभाषिकी के प्रयोग होने से हमारे हिन्दी-शब्दकोश और हिन्दी विश्वज्ञान-कोश की प्रभाव सर्वत्र संलक्षित होती। इतना ही नहीँ, देश का वह मेधावी विद्यार्थी-वर्ग, जिसका आरम्भ से ही अध्ययन और अभ्यास हिन्दी-माध्यम मे होता आ रहा है, वह हिन्दी-माध्यम मे शिक्षा-प्रशिक्षा, पठन-पाठन के वातावरण का अनुभव कर, अपने विश्वास को चतुर्गुण रूप मे पाता और आशातीत सफलता उसका चरण-चुम्बन कर रही होती।
वर्तमान मे, देश मे शासकीय सेवाओँ का अभाव होता जा रहा है और निकट भविष्य मे इसका व्यवहारक्षेत्र अत्यन्त संकुचित हो जायेगा। इस दृष्टि से निजी संस्थानो की उपयोगिता और महत्ता बढ़ जायेगी। निजी संस्थानो के चरित्र और प्रकृति का अध्ययन और सर्वेक्षण करने पर यही निष्कर्ष निकलता है कि उनका अँगरेज़ी-मोह परवान चढ़ेगा और हिन्दी की अवनति होगी। वहाँ सरकार का भी अधिकार-क्षेत्र निष्प्रभावी सिद्ध होगा। ऐसे मे, अभियान्त्रिकी क्षेत्र मे हिन्दी-माध्यम मे पठन-पाठन का वातावरण कैसे बनेगा, यह विषय-विन्दु विचारणीय है। इसके लिए कोई समन्वय-मार्ग अवश्य निकालना होगा, जिससे कि हिन्दीभाषा का उन्नयन हो और हिन्दीभाषा-भाषी विद्यार्थी को उपयुक्त वातावरण मिले। अब इस विषय पर नये सिरे से विचार करना होगा, तभी टिमटिमाती आशा एक नव- ज्योति का आकार ग्रहण कर पायेगी।
सम्पूर्ण देश मे छठी कक्षा से अभियान्त्रिकी के मूलभूत स्वरूप से परिचित कराने का लक्ष्य बनाना होगा। इसके लिए हिन्दी-माध्यम मे विद्यार्थियोँ को ज्ञान कराया जाये और सिद्धहस्त विषय-विशेषज्ञोँ की पाठ्यक्रम-निर्धारण- समिति-जैसी एक समिति गठित की जाये, जो विद्यार्थियों की ग्रहणशीलता की क्षमता के अनुरूप छठी कक्षा से बारहवीँ कक्षा तक के पाठ्यक्रम हिन्दी-भाषा मे तैयार करे-कराये। आगे चलकर, उच्च शिक्षास्तर पर अपेक्षाकृत बृहद् रूप मे स्नातक-परास्नातक के लिए भी हिन्दी-माध्यम मे पाठ्यक्रम का निर्धारण करने के लिए एक अन्य ‘उच्चस्तरीय पाठ्यक्रम-समिति’- जैसी समिति का गठन सुयोग्य विशेषज्ञोँ के नियन्त्रण मे हो, जिसके निर्देशन मे हिन्दीभाषा मे पाठ्यक्रम का निर्धारण हो और उसी के आधार पर हिन्दीभाषा मे पुस्तकोँ का लेखन भी। इस प्रकार हमारी हिन्दीभाषा की परिव्याप्ति लक्षित होगी। आज मौसमविज्ञान, ऊष्मा-गतिकी, द्रव-गतिकी,परिपथ-अभिकल्पन, विद्युत्-चुम्बकत्व आदिक की व्यावहारिक दुनिया मे अत्यधिक प्रचलन है। ऐसे मे, इन विषयोँ पर हिन्दी-माध्यम मे अध्ययन- अध्यापन की व्यवस्था करनी आवश्यक है।
अभियान्त्रिकी के अन्तर्गत ही ‘अभियान्त्रिकी और विज्ञान’, ‘अभियान्त्रिकी और समाज’ तथा ‘अभियान्त्रिकी और आयुर्विज्ञान’ आदिक हैँ। अभियान्त्रिकी की शाखाएँ-प्रशाखाएँ ही इतनी अधिक हैँ कि उतने मे ही यदि हमारी हिन्दी-भाषा की पुस्तकोँ को सिद्धान्त और प्रयोगस्तर पर स्थान मिल जाता है तो उसकी पहुँच जनजीवन के उस तकनीकी अँगरेज़ी ज्ञानकोश तक होगी, जहाँ वह पहुँचकर अपनी देवनागरी लिपि और हिन्दी-भाषा की समृद्धि से विद्यार्थियोँ और अध्यापकोँ को चमत्कृत करती दिखेगी। सैन्य प्रौद्योगिकी, असैन्य-प्रौद्योगिकी, जैव-प्रौद्योगिकी, वैमानिकी, रासायनिक, विद्युतीय, अन्तरिक्षीय, भू-प्रौद्योगिकी, कम्प्यूटरविज्ञान-तकनीकि, जल-अभियान्त्रिकी, नियन्त्रण-प्रौद्योगिकी, पर्यावरण-प्रौद्योगिकी आदिक अभियान्त्रिकी की शाखाओं की उपादेयता समझी जा सकती है। प्रत्येक शाखा के लिए देवनागरी लिपि और हिन्दी-भाषा मे यदि पुस्तकोँ के अध्यापन के लिए स्वीकृति कर दी जाती है तो वह विशेष ज्ञान सामान्य व्यक्ति के लिए भी पठनीय हो सकता है। इतना ही नहीँ, इन और अन्य विषयोँ पर लोकप्रिय विज्ञान और प्रौद्योगिकी-लेखन के अन्तर्गत जनसामान्य के लिए हिन्दीभाषा मे पुस्तकलेखन-प्रकाशन आरम्भ हो सकता है।
इसी अभियान्त्रिकी की एक रोचक शाखा ‘आनुवंशिक अभियान्त्रिकी है, जो जैव-प्रौद्योगिकी के अन्तर्गत आती है। ‘डी० एन० ए०’, ‘आनुवंशिक रोग’, ‘जीनोम’, ‘क्लोन’, ‘जैव-प्रौद्योगिकी’ आदिक के अध्ययन-अध्यापन सुरुचिपूर्ण शैली मे किये जा सकते हैँ। यदि हिन्दी-भाषा मे इन विषयोँ पर सहजता के साथ मौलिक चिन्तन और विश्लेषण के आधार पर पाण्डुलिपियाँ तैयार की जाती हैँ और उनका मुद्रण होता है तो निस्सन्देह, वे पुस्तकेँ विद्यार्थियोँ के लिए सुबोध होँगी ही, हिन्दीशब्द-कोश को बृहत्तर रूप देने मे भी अत्यन्त सहयोगी सिद्ध होँगी।
कृषि और पशु-पालन के क्षेत्र मे हिन्दी
देश मे खेती-बारी के साथ-ही-साथ पशुपालन, बाग़वानी, रेशमकीट-पालन, सुअर-पालन, भेँड़-बकरी-पालन, मुर्ग़ी-पालन, मधुमक्खी-पालन, मछली-पालन, बत्तख-पालन आदिक का आज कृषि के क्षेत्र मे नितान्त महत्त्वपूर्ण स्थान है। प्रौद्योगिकी का ग्रामीण विकास मे कैसे योगदान हो? जैविक कृषि कैसे हो? जल-उपयोग की दक्षता-वृद्धि करने के लिए सूक्ष्म सिँचाई-प्रणाली की जानकारी कैसे हो? इन प्रश्नो के उत्तर से विद्यार्थियोँ को संतुष्ट करने की आवश्यकता है। पशुपालन और दुग्ध-उद्योग, बीज और उत्पादन, फूल, फल तथा सब्ज़ी-उत्पादन, औषधीय और सुगन्धीय पौधोँ की खेती, कृषि-आधृत कुटीर उद्योग-धन्धे आदिक विषयोँ पर अथवा इनसे सम्बन्धित हिन्दीभाषा मे पुस्तकेँ हैँ ही नहीँ। आप केवल कल्पना करके देखेँ। यदि उक्त विषयोँ पर हिन्दीभाषा मे पाठ्य पाण्डुलिपियोँ का मुद्रण हो जाता है तो इन्हीँ विषयोँ के आधार पर हिन्दीभाषा की ऐसी सुदृढ़ स्थिति हो जायेगी कि कोई अन्य अभारतीय भाषा उसके समक्ष ठहर ही नहीँ पायेगी। स्मरणीय है कि १५ मई, २०२० ई० को देश की वित्तमन्त्री ने कृषि, खाद्यप्रसंस्करण-उद्योग, हर्बल-कृषि आदिक के मद मे करोड़ोँ रुपये ख़र्च कर किसानो को आत्मनिर्भर बनाने के लिए घोषणा की थी। हमारे देश का मूल किसान विशुद्ध हिन्दीभाषाभाषी है। ऐसे मे, यदि उक्त आर्थिक लाभ की योजनाओँ से सम्बन्धित जानकारी देनेवाली सचित्र पुस्तकेँ हिन्दी मे होतीँ तो किसानोँ के लिए उपयोगी सिद्ध हो सकती थीँ। ऐसे मे, देश की स्वयंसेवी सामाजिक संस्थाएँ यदि इस दिशा मे कारगर क़दम उठाती हैँ तो इससे हिन्दीभाषा का ग्रामीण क्षेत्रोँ मे प्रचार-प्रसार तो होगा ही, उक्त योजनाओँ के लाभार्थी के रूप मे किसानो को हिन्दीज्ञान का लाभ भी मिलेगा।
आज ‘ई० लर्निंग’, ‘ई० शिक्षा’ को लागू करते समय विज्ञान- प्रौद्योगिकी, स्वास्थ्य-उपचार- औषध, कृषि-तकनीकि, कम्प्यूटर के हार्डवेअर- सॉफ़्टवेअर तथा उपर्युक्त समस्त विषयोँ-उपविषयोँ आदिक को पढ़ाते समय अँगरेज़ी-माध्यम का ही आश्रय लिया जा रहा है। उन विषयोँ की तकनीकी शब्दावली और पारिभाषिकी इतनी जटिल रहती हैँ कि उनके अर्थ-अवधारणा तथा सन्दर्भ की पकड़ और परख कर पाना उतना सरल-सहज नहीँ होता, जितना कि समझा जाता है। अँगरेज़ी-माध्यम मे अध्ययन करते आ रहे मेधावी विद्यार्थी तो समझ लेते हैँ; किन्तु हिन्दी- माध्यम मे अध्ययन कर रहे सामान्य स्तर के विद्यार्थियोँ को कष्ट और कठिनाई का सामना करना पड़ता है, जबकि सर्वाधिक संख्या हिन्दी-माध्यम मे अध्ययन कर रहे विद्यार्थियोँ की ही रहती है। ऐसे मे, विद्यार्थियोँ को विधिवत् रूप से ज्ञान कराने के लिए हिन्दी-माध्यम मे शिक्षा-प्रशिक्षा की ठोस सैद्धान्तिक-प्रायोगिक व्यवस्था करनी होगी; हिन्दीभाषा मे विद्यार्थियोँ और अध्यापकोँ के लिए उपयोगी पुस्तक-लेखन की अनिवार्यता पर बल देना होगा। इससे हिन्दीलेखन की दिशा मे एक शैक्षिक क्रान्ति आ सकती है, जिसकी महती आवश्यकता है। इसके लिए केन्द्र और राज्य की सरकारोँ को सम्बन्धित विषयोँ के विशेषज्ञोँ के साथ मिल-बैठकर व्यावहारिक विमर्श करना होगा।
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