ज्ञान-विज्ञान और प्रौद्योगिकी-क्षेत्र में हिन्दी ससीम से असीम की ओर

हिन्दी-माध्यम मे शिक्षा-प्रशिक्षा की ठोस सैद्धान्तिक-प्रायोगिक व्यवस्था से हिन्दीलेखन की दिशा मे एक शैक्षिक क्रान्ति आ सकती है

आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

‘हिन्दी-पक्ष’ (पखवाड़ा) के अवसर पर विशेष प्रस्तुति

★ आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
(भाषाविज्ञानी और समीक्षक)

देश की बहुसंख्य जनता देवनागरी लिपि मे हिन्दी लिखना, पढ़ना तथा समझना जानती है। सम्पूर्ण देश मे साहित्य की दोनो विधाओं (केवल दो विधाएँ होती हैं।):– पद्य और गद्य के समस्त विषयों पर आवश्यकता से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं; परन्तु स्वतन्त्रता-प्राप्ति के ७५ वर्षों-बाद भी विज्ञान, प्रविधि तथा प्रौद्योगिक विषयों पर हिन्दी मे पुस्तकों का अभाव लक्षित हो रहा है। इतना ही नहीं, इन विषयों पर जितने भी शोध आलेख/शोधपत्रादिक राष्ट्रीय आयोजनो मे विद्यार्थियों और अध्यापकों-द्वारा प्रस्तुत किये जाते रहे हैं, अँगरेज़ी मे होते हैं। यदि वही शोधपत्रादिक हिन्दीभाषा मे होते तो विद्यार्थी और अध्यापक अपनी विचारजीविता और बौद्धिकता को सुतार्किक रूप मे प्रस्तुत कर सकते थे; परन्तु हिन्दी को मातृभाषा माननेवाले भारतीय भी अभारतीय भाषा अँगरेज़ी का महिमा-मण्डन कर, स्वयं को प्रतिस्पर्द्धा के बाज़ार मे उतार चुके हैं।

भौतिकविज्ञान, जीवविज्ञान, वनस्पतिविज्ञान, रसायनविज्ञान, प्राणिविज्ञान, कम्प्यूटरविज्ञान, ज्योतिर्विज्ञान, मौसमविज्ञान, भूविज्ञान, प्रकृतिविज्ञान, अन्तरिक्षविज्ञान, पर्यावरणविज्ञान, पारिस्थितिकी आदिक विषयों की शिक्षा-प्रशिक्षा कहनेभर के लिए हिन्दी-माध्यम मे की जाती है, जबकि व्यवहार मे अँगरेज़ी-माध्यम को ही प्रोत्साहित किया जाता रहा है। यदि उक्त विषयों का अध्ययन-अध्यापन हिन्दी मे हो और हिन्दी मे लिखी गयी मौलिक पुस्तकों को अध्ययन करने के प्रति विद्यार्थियों को अभिप्रेरित किया जाये तो हमारी हिन्दीभाषा शिक्षा के उत्तुंग शिखर पर समासीन होकर समस्त विद्यार्थियों को अपनी उपयोगिता-महत्ता का प्रसाद बाँटती संलक्षित होगी। जलयान, सामान्य वायुयान, हेलीकाप्टर, युद्धक विमान तथा पैराशूट-निर्माण की प्रौद्योगिकी को समझानेवाली पुस्तकें हिन्दीभाषा में उपलब्ध नहीं हैं। चिकित्साविज्ञान की मानक पुस्तकें हिन्दीभाषा में प्रकाशित नहीं हो पायी हैं। इनका प्रमुख कारण यह है कि उक्त सेवाओं के लिए समस्त पुस्तकें अँगरेज़ी-भाषा मे उपलब्ध हैं। उन क्षेत्रों मे अँगरेज़ी की घुसपैठ बनी हुई है। आश्चर्य है कि अतिरिक्त बाह्याडम्बर के साथ देश-देशान्तर मे ‘विश्व हिन्दी-सम्मेलन’ का आयोजन होता आ रहा है; लाखों रुपये बरबाद किये जाते रहे हैं; परन्तु उन सम्मेलनो मे पूर्ण सत्य-निष्ठा के साथ कभी विज्ञान-प्रौद्योगिकी-विषय के अध्ययन-अध्यापन हिन्दी-माध्यम मे कराये जाने की माग (‘माँग’ अशुद्ध है।) नहीं की गयी। हमारे विद्यार्थी और अध्यापक ने भी व्यवहार-स्तर पर हिन्दी-माध्यम मे पठन-पाठन की व्यवस्था बनाने की प्रभावकारी ढंग से कभी माग की ही नहीं, अन्यथा आज हिन्दी की तस्वीर कुछ और ही होती।

विज्ञान और प्रौद्योगिकी के अत्याधुनिक पक्षों को विश्व के प्राय: प्रत्येक देश तक पहुँचाया गया है। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र को सुचारु रूप से संचालित करने के, समस्त उलझनों को सुलझाने तथा समस्त समस्याओं का निराकरण (यहाँ ‘समाधान’ अनुपयुक्त है।) करने के लिए अत्याधुनिक यन्त्रों और उपकरणों के आविष्कार-निर्माण किये गये थे। उनकी उपादेयता तब सिद्ध हुई जब उनके उपयोग ब्रह्माण्ड, चिकित्सा, शिक्षा-प्रशिक्षा, सूचना-प्रौद्योगिकी, कृषि-पशुपालन, यान्त्रिकी- अभियान्त्रिकी, परमाणुशक्ति, पारम्परिक-अपारम्परिक ऊर्जा-स्रोत, अन्तरिक्ष, अर्थव्यवस्था, खेल, पर्यटन आदिक क्षेत्रों मे किये गये थे।

अब हम अभियान्त्रिकी-विषय की उपयोगिता और महत्ता की परख ‘हिन्दी’ के सन्दर्भ मे करते हैं।

अभियान्त्रिकी के क्षेत्र मे हिन्दी

अभियान्त्रिकी एक प्रकार का कला, विज्ञान है तथा व्यवसाय भी। इसकी सहायता से पदार्थ के गुणों को उन संरचनाओं और यन्त्रों के बनाने मे, जिनके लिए यान्त्रिकी के सिद्धान्त और उपयोग आवश्यक हैं, मानवोपयोगी बनाया जाता है। अभियान्त्रिकी शब्द अतीव व्यापक है और इसका अर्थ भी। इसके अन्तर्गत नाभिकीय अभियान्त्रिकी (न्यूक्लियर इंजीनियरिंग) आती है, जिसमे ('जिसमें' अशुद्ध है।) उच्च वैज्ञानिक और प्राविधिक क्षेत्र, श्रमिक नियन्त्रण प्रबन्धन-कार्यक्षमता, समय और गति का अध्ययन आदिक सम्मिलित हैं। ये प्रायोगिक विज्ञान के विस्तृत क्षेत्रों को प्रभावित करते हैं। इतना ही नहीं, इस अभियान्त्रिकी का विस्तार कल्पनातीत है। यही कारण है कि इसकी उपयोगिता सैन्य (थलसेना, नौसेना तथा वायुसेना) असैन्य कार्यों (पुल, बाँध, सड़क, भवन आदिक के निर्माण) के लिए  महत्त्व की रही है। अभियान्त्रिकी के अनेक भाग हैं :-- असैनिक अभियान्त्रिकी, यान्त्रिकी अभियान्त्रिकी, वैद्युत् अभियान्त्रिकी, कृषि अभियान्त्रिकी, रासायनिक अभियान्त्रिकी, खनन् अभियान्त्रिकी, कम्प्यूटर अभियान्त्रिकी, धातुनिस्तारण अभियान्त्रिकी, यान्त्रिक अभियान्त्रिकी आदिक।
  
इस प्रकार हमने अभियान्त्रिकी के विकास, स्वरूप तथा व्याप्ति को सम्यक् रूपेण ग्रहण कर लिया है। हमारे देश के विद्यार्थियों के लिए उपर्युक्त अभियान्त्रिकी के बहुआयामिक रूप दृष्टिगत होते हैं; परन्तु दु:ख और खेद का विषय है कि उक्त समस्त सम्भागों मे हिन्दी-माध्यम मे न तो शिक्षा होती है और न ही प्रशिक्षा। इसका मुख्य कारण है कि अभियान्त्रिकी के क्षेत्र मे प्रवेश-परीक्षा से लेकर शिक्षा-प्रशिक्षा तक सभी कार्य-व्यवहार 'अँगरेज़ी' मे ही दिखते हैं। शासन-स्तर पर भी अँगरेज़ी को ही प्राथमिकता दी जाती रही है, प्रभावस्वरूप समग्र अभियान्त्रिकी परिवेश मे हिन्दीभाषा के प्रयोग को हतोत्साह किया जा रहा है। ऐसा नहीं कि देश मे योग्य लेखकों का अभाव है; अभाव है तो शासनस्तर पर इच्छाशक्ति का। देश की सरकार व्यवहार-स्तर पर 'एक राष्ट्र-एक शिक्षा' घोषित करने से कतरा क्यों रही है? शिक्षा-जगत् मे जितने भी सामान्य, विशेष तथा प्राविधिक-प्रौद्योगिकी-विषय हैं, उनकी एकरूपता सम्पूर्ण देश मे लागू कर दी जाती। इसके लिए अँगरेज़ी मे लिखी गयी पुस्तकों के स्थान पर देवनागरी लिपि और हिन्दी-भाषा मे लिखी गयी पुस्तकों को शासन और शिक्षण-संस्थानस्तर पर प्राथमिकता दी जाती तो हमारी हिन्दीभाषा का ज्ञान-विज्ञान और प्राविधिक- प्रौद्योगिकी/तकनीकी क्षेत्रों मे कल्पनातीत विस्तार होता तथा तकनीकी हिन्दी-शब्दावली और पारिभाषिकी के प्रयोग होने से हमारा हिन्दी-शब्दकोश और हिन्दी विश्वज्ञान-कोश की प्रभाव और प्रवाहमयी समृद्धि होती। इतना ही नहीं, देश का वह मेधावी विद्यार्थी-वर्ग, जिसका आरम्भ से ही अध्ययन और अभ्यास हिन्दी-माध्यम मे होता आ रहा है, वह हिन्दी-माध्यम मे शिक्षा-प्रशिक्षा, पठन-पाठन के वातावरण का अनुभव कर, अपने विश्वास को चतुर्गुण रूप मे पाता।
 
वर्तमान मे, देश मे शासकीय सेवाओं का अभाव होता जा रहा है और निकट भविष्य मे इसका व्यवहारक्षेत्र अत्यन्त संकुचित हो जायेगा, ऐसा लगने लगा है। इस दृष्टि से निजी संस्थानों की उपयोगिता और महत्ता बढ़ जायेगी। निजी संस्थानों के चरित्र और प्रकृति का अध्ययन और सर्वेक्षण करने पर यही निष्कर्ष निकलता है कि उनका अँगरेज़ी-मोह परवान चढ़ेगा और हिन्दी की अवनति होगी। वहाँ सरकार का भी अधिकार-क्षेत्र निष्प्रभावी सिद्ध होगा। ऐसे मे, अभियान्त्रिकी क्षेत्र मे हिन्दी-माध्यम मे पठन-पाठन का वातावरण कैसे बनेगा, यह विचारणीय विषय-विन्दु है। इसके लिए कोई समन्वय-मार्ग अवश्य निकालना होगा, जिससे कि हिन्दीभाषा का उन्नयन हो और हिन्दीभाषा-भाषी विद्यार्थी को उपयुक्त वातावरण मिले। अब इस विषय पर नये सिरे से विचार करना होगा, तभी टिमटिमाती आशा एक नव ज्योति का आकार ग्रहण कर सकती है। 
 
सम्पूर्ण देश मे छठी कक्षा से अभियान्त्रिकी के मूलभूत स्वरूप से परिचित कराने का लक्ष्य बनाना होगा। इसके लिए हिन्दी-माध्यम मे विद्यार्थियों को ज्ञान कराया जाये और सिद्धहस्त विषय-विशेषज्ञों की एक पाठ्यक्रम-निर्धारण- समिति-जैसी एक समिति गठित की जाये, जो विद्यार्थियों की ग्रहणशीलता की क्षमता के अनुरूप छठी कक्षा से बारहवीं कक्षा तक के पाठ्यक्रम हिन्दी-भाषा मे तैयार करे-कराये। आगे चलकर, उच्च शिक्षास्तर पर अपेक्षाकृत बृहद् ('वृहद्' अशुद्ध है।) रूप मे स्नातक-परास्नातक के लिए भी हिन्दी-माध्यम मे पाठ्यक्रम का निर्धारण करने के लिए एक अन्य 'उच्चस्तरीय पाठ्यक्रम-समिति'-जैसी समिति का गठन सुयोग्य विशेषज्ञों के नियन्त्रण मे हो, जिसके निर्देशन मे हिन्दीभाषा मे पाठ्यक्रम का निर्धारण हो और उसी के आधार पर हिन्दीभाषा मे पुस्तकों का लेखन भी। इस प्रकार हमारी हिन्दीभाषा की परिव्याप्ति लक्षित होगी। आज मौसमविज्ञान,  ऊष्मा-गतिकी, द्रव-गतिकी, परिपथ-अभिकल्पन, विद्युत्-चुम्बकत्व आदिक की व्यावहारिक दुनिया मे अत्यधिक प्रचलन है। ऐसे मे, इन विषयों पर हिन्दी-माध्यम मे अध्ययन- अध्यापन की व्यवस्था करनी आवश्यक है। 
अभियान्त्रिकी के अन्तर्गत ही 'अभियान्त्रिकी और विज्ञान', 'अभियान्त्रिकी और समाज' तथा 'अभियान्त्रिकी और आयुर्विज्ञान' आदिक हैं। अभियान्त्रिकी की शाखाएँ-प्रशाखाएँ ही इतनी अधिक हैं कि उतने मे ही यदि हमारी हिन्दी-भाषा की पुस्तकों को सिद्धान्त और प्रयोगस्तर पर स्थान मिल जाता है तो उसकी पहुँच जनजीवन के उस तकनीकी अँगरेज़ी ज्ञानकोश तक हो जाती, जहाँ वह पहुँचकर अपनी देवनागरी लिपि और हिन्दी-भाषा की समृद्धि से विद्यार्थियों और अध्यापकों को चमत्कृत करती दिखती। सैन्य प्रौद्योगिकी,।असैन्य प्रौद्योगिकी, जैव-प्रौद्योगिकी, वैमानिकी, रासायनिक, विद्युतीय, अन्तरिक्षीय, भू-प्रौद्योगिकी, कम्प्यूटरविज्ञान-तकनीकि, जल-अभियान्त्रिकी, नियन्त्रण-प्रौद्योगिकी, पर्यावरण-प्रौद्योगिकी आदिक अभियान्त्रिकी की शाखाओं की उपादेयता समझी जा सकती है।  

प्रत्येक शाखा के लिए देवनागरी लिपि और हिन्दी-भाषा मे यदि पुस्तकों के अध्यापन के लिए स्वीकृति कर दी जाती है तो वह विशेष ज्ञान सामान्य व्यक्ति के लिए भी पठनीय हो सकता है। इतना ही नहीं, इन और अन्य विषयों पर लोकप्रिय विज्ञान और प्रौद्योगिकी-लेखन के अन्तर्गत जनसामान्य के लिए हिन्दीभाषा मे पुस्तकलेखन-प्रकाशन आरम्भ हो सकता है। 

इसी अभियान्त्रिकी की एक रोचक शाखा 'आनुवंशिक अभियान्त्रिकी है, जो जैव-प्रौद्योगिकी के अन्तर्गत आती है। 'डी० एन० ए०', 'आनुवंशिक रोग', 'जीनोम', 'क्लोन', 'जैव-प्रौद्योगिकी' आदिक के अध्ययन-अध्यापन सुरुचिपूर्ण शैली मे किये जा सकते हैं। यदि हिन्दी-भाषा मे इन विषयों पर सहजता के साथ मौलिक चिन्तन और विश्लेषण के आधार पर पाण्डुलिपियाँ तैयार की जाती हैं और उनका मुद्रण होता है तो निस्सन्देह, वे पुस्तकें विद्यार्थियों के लिए सुबोध होंगी ही, हिन्दीशब्द-कोश को बृहत्तर रूप देने मे भी अत्यन्त सहयोगी सिद्ध होंगी।

कृषि और पशु-पालन के क्षेत्र में हिन्दी

   देश मे खेती-बारी के साथ-ही-साथ पशुपालन, बाग़वानी, रेशमकीट-पालन, सुअर-पालन, भेंड़-बकरी-पालन, मुर्ग़ी-पालन, मधुमक्खी-पालन, मछली-पालन, बत्तख-पालन आदिक का आज कृषि के क्षेत्र मे नितान्त महत्त्वपूर्ण स्थान है। ई० प्रौद्योगिकी का ग्रामीण विकास मे कैसे योगदान हो, जैविक कृषि कैसे हो, जल-उपयोग की दक्षता-वृद्धि करने के लिए सूक्ष्म सिंचाई-प्रणाली की जानकारी कैसे हो? पशुपालन और दुग्ध-उद्योग, बीज और उत्पादन, फूल, फल तथा सब्ज़ी-उत्पादन, औषधीय और सुगन्धीय पौधों की खेती, कृषि-आधृत कुटीर उद्योग-धन्धे आदिक विषयों पर अथवा इनसे सम्बन्धित हिन्दीभाषा मे पुस्तकें हैं ही नहीं। आप केवल कल्पना करके देखें। यदि उक्त विषयों पर हिन्दीभाषा मे पाठ्यपुस्तकों का मुद्रण हो जाता है तो इन्हीं विषयों के आधार पर हिन्दीभाषा की ऐसी सुदृढ़ स्थिति हो जायेगी कि कोई अन्य अभारतीय भाषा उसके समक्ष ठहर ही नहीं पायेगी। स्मरणीय है कि १५ मई, २०२० ई० को देश की वित्तमन्त्री ने कृषि, खाद्यप्रसंस्करण-उद्योग, हर्बल-कृषि आदिक के मद मे करोड़ों रुपये ख़र्च कर किसानों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए घोषणा अँगरेजी-भाषा मे की थी। हमारे देश का मूल किसान विशुद्ध हिन्दीभाषाभाषी है। ऐसे मे, यदि उक्त आर्थिक लाभ की योजनाओं से सम्बन्धित जानकारी देनेवाली सचित्र पुस्तकें हिन्दी मे होतीं तो किसानों के लिए उपयोगी सिद्ध हो सकती थीं। ऐसे मे, देश की स्वयंसेवी सामाजिक संस्थाएँ यदि इस दिशा मे कोई कारगर क़दम उठाती हैं तो इससे हिन्दीभाषा का ग्रामीण क्षेत्रों मे प्रचार-प्रसार तो होगा ही, उक्त योजनाओं के लाभार्थी के रूप मे किसानो ('किसानों' अशुद्ध है।) को हिन्दीज्ञान का लाभ भी मिलेगा।

आज ‘ई०लर्निंग’, ‘ई० शिक्षा’ को लागू करते समय विज्ञान- प्रौद्योगिकी, स्वास्थ्य-उपचार- औषध, कृषि-तकनीकि, कम्प्यूटर के हार्डवेअर-सॉफ़्टवेअर तथा उपर्युक्त समस्त विषयों-उपविषयों आदिक को पढ़ाते समय अँगरेज़ी-माध्यम का ही आश्रय लिया जा रहा है। उन विषयों की तकनीकी शब्दावली और पारिभाषिकी इतनी जटिल रहती हैं कि उनके अर्थ-अवधारणा तथा सन्दर्भ की पकड़ और परख कर पाना उतना सरल-सहज नहीं होता, जितना कि समझा जाता है। अँगरेज़ी-माध्यम में अध्ययन करते आ रहे मेधावी विद्यार्थी तो समझ लेते हैं; किन्तु हिन्दी- माध्यम मे अध्ययन कर रहे विद्यार्थियों को कष्ट और कठिनाई का सामना करना पड़ता है, जबकि सर्वाधिक संख्या हिन्दी-माध्यम मे अध्ययन कर रहे विद्यार्थियों की ही होती है। ऐसे मे, विद्यार्थियों को विधिवत् रूप से ज्ञान कराने के लिए हिन्दी-माध्यम मे शिक्षा-प्रशिक्षा की ठोस सैद्धान्तिक-प्रायोगिक व्यवस्था करनी होगी; हिन्दीभाषा मे विद्यार्थियों और अध्यापकों के लिए उपयोगी पुस्तक-लेखन की अनिवार्यता पर बल देना होगा। इससे हिन्दीलेखन की दिशा मे एक शैक्षिक क्रान्ति आ सकती है। आज उसी की आवश्यकता है।

सम्पर्क-सूत्र
आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
२३५/११०/२-बी, अलोपीबाग़, प्रयागराज– २११ ००६
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यायावरभाषक-संख्या– ९९१९०२३८७०, ८७८७००२७१२