सई नदी की करुण कथा : पौराणिक और ऐतिहासिक नदी मर रही है

नफ़रतों को बिसराने और मोहब्बतों के इस्तक़बाल का दिन है होली

अफ़ग़ानिस्तानी-हिंदुस्तानी संस्कृति की कड़ी
Saundarya Naseem-

रंगों के तेहवार की मुबारकबाद! कहते हैं कि हिंदू मज़हब के नए साल का आग़ाज़ भी आज ही के दिन है, तो इस नए साल की नई सुबह भी आपको मुबारक हो।

मैं सोचती हूँ, जश्न ज़िंदगी की ख़ुशियों के नाम हो तो क़ाबिले ताईद है। ऐसे मौक़ों पर मज़हबी दीवारों के कोई मायने नहीं रह जाते। तब्दीले आबोहवा में अपनी जिंदगी के रंग तो न जाने कहाँ गुुम गए, पर भरोसा तो रखना पड़ेगा कि अल्लाह आख़िरकार हर किसी के लिए ही बराबर का रंग आमेज़ है। मेरे हिस्से का रंग भी उसने कायनात के किसी कोने में सहेज रखा होगा। दुआ करूँगी कि मेरे हिस्से का वह रंग जहाँ भी हो, आप सबों की ज़िदगी में ख़ुशियों की रंग अफ़्शानी का सबब बने।

सही मायने में नफ़रतों को बिसराने और मोहब्बतों के इस्तक़बाल का दिन है यह। जाति-बिरादरी, औरत-मर्द, छोटे-बड़े.. सबके दरमियानी दीवारों के ज़मींदोज़ हो जाने का दिन! ख़ुदा करे आज के दिन संगे मील दूर बहुत दूर छूट जाए, संगे महक़्क आप सबों को खरा साबित करे और दिलों में चर्बे बरीं की बलंदियों पर जा पहुँचने का जज़्बा जगाए। तार-ए-अश्क का साया न पड़े, अलमस्तियाँ क़ायम रहें और हिक़्मते इलाही मेहरबान हो कि ख़ुशमिज़ाजी का पैकर बेशुमार रंगों से भर उठे। आमीन!