अधूरा सच : लड़ाई एक ‘काफ़िर’ के विरुद्ध है इसलिए आप दखल न दें

बचपन मे उत्तर प्रदेश बोर्ड की प्राथमिक कक्षा में एक कहानी पढ़ी थी “राखी की लाज”। जिसमे पढ़ाया गया था कि चित्तौड़गढ़ की महारानी कर्णावती गुजरात के शासक बहादुरशाह के हमले से रक्षा के लिए मुगल बादशाह हुमायूं को राखी भेजती है और उदार, सच्चरित्र, सेक्युलर हुमायूं, रानी कर्णावती की राखी की लाज रखते हुए बहादुर शाह से उसकी रक्षा करता है।

जब बड़े हुए तो पता चला कि रानी कर्णावती ने हुमायूं से सहायता तो जरूर माँगी थी और हुमायूँ, रानी की सहायता के लिए आगरा से ग्वालियर तक पहुंच भी गया था। लेकिन तभी उसे बहादुरशाह का पत्र प्राप्त होता है जिसमें वह लिखता है कि उसकी लड़ाई एक ‘काफ़िर’ के विरुद्ध है इसलिए आप दखल न दें क्योंकि हम दोनों ही दीन वाले हैं।

हुमायूं को यह बात तुरंत ही समझ आ गई क्योंकि रानी पर आक्रमण करने वाला मुसलमान था और रानी काफ़िर। इसलिए वह चित्तौड़गढ़ के पूरी तरह बर्बाद हो जाने तथा रानी कर्णावती के अन्य नारियों सहित जौहर करने का इंतजार करता रहा।

वास्तविक इतिहास में कहीं भी इस तथाकथित गंगा-जमुनी घटना का जिक्र नहीं है। वस्तुतः इस मनगढ़ंत कहानी में लेशमात्र भी सच्चाई नहीं है लेकिन वर्षो तक हमारे बालमन को इस सफेद झूठ की घुट्टी पिलाई जाती रही।

बुद्धिजीवी इतिहासकारों की तरह ही सेक्युलर बॉलीवुड भी हमे अब तक अकबर की महानता, टीपू सुल्तान की वीरता और रजिया बेगम का साहस दिखाता आया है। छत्ता बाजार का सच, जजिया- कर किस पर और क्यों , कर्नाटक के ब्राह्मणों के नरसंहारकर्ता का नाम जैसे सच हमसे छुपाए जाते रहे।

सेक्युलर बॉलीवुड को राणा कुंभा, राणा सांगा , महाराणा प्रताप, वीर शिवाजी जैसे महान योद्धाओं पर मूवी बनाने की कभी नहीं सूझी क्योंकि यह सभी महापुरुष सेक्युलरिज्म के खांचे में फिट नहीं बैठे।

इसलिए सनातनियों ने उर्दुवूड विशेषकर खान तिकड़ी का बर्बाद होने तक बहिष्कार करने का निर्णय ले लिया है।

✍? विनय सिंह बैस