● आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
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अपने गाँव मिरीगिरी टोला, बाँसडीह, बलिया (उत्तरप्रदेश) मे अपना एक स्वतन्त्र घर हो, यह ‘मेरी’ इच्छा रही थी; क्योँकि जब मै गाँव मे संयुक्त परिवार के लिए निर्मित घर मे प्रवेश करता था तब न तो ‘अपनत्व’ लक्षित होता था और न ही ममत्व; एक सिरे से सारे चेहरे मिथ्यावाद से ग्रस्त लगते थे, जो आज भी हैँ। उन सबके प्रति ‘मोहभंग’ भी हो चुका है। आनेवाले कल मे इस विषय पर एक ‘विस्तृत उपन्यास’ का प्रणयन भी करूँगा।
मेरा चिन्तन और ‘कल’ की चिन्ता ने यह सीख दी है :– हमारे पूर्वजोँ ने हमे बहुत-कुछ दिया है। ‘कल’ हम ‘पूर्वज’ हो जायेँगे तब हमारी संतान भी सगर्व कह सके :– हमारे माता-पिता ने हमे ‘बहुत-कुछ’ दिया है, ताकि वे भी अपनी संतान के लिए ‘बहुत-कुछ’ दे सकेँ, जो आगे चलकर ‘पैतृक देन’ के रूप मे पुष्पित-पल्लवित होता रहे।
कई दशक से चले आ रहे ‘पारिवारिक विवाद’ और ‘मनभेद’ के कारण हमारी इच्छा मूर्त्त रूप नहीँ ग्रहण कर पा रही थी। मैने सुस्पष्ट कह दिया था :– सब बाँट लो; जो बच जाये, मुझे दे देना।
अन्तत:, ‘बँटवारा’ हुआ और हमारे हिस्से मे ‘जंगल-सा’ दिखनेवाला ‘झाड़-झंखाड़’ से युक्त एक भूभाग आया। चूँकि भूभाग पैतृक (‘पैत्रिक’ अशुद्ध है।) है अत: हमारा परम धर्म है, उसका महिमामण्डन करना और उसके आधार पर एक आकार देना।
आज, (२८ जून) जब अपने पूर्वजोँ-द्वारा छोड़े गये भूभाग पर १३ पिलर देखे तब मन और हृदय कितना संतुष्ट हुआ है, अनिर्वचनीय भाव है। हमारा संकल्प पूर्णता की ओर अग्रसर है; हम निमित्तमात्र हैँ; किन्तु मेरा स्वयं के प्रति ‘स्वयं’ का आग्रह कितना ठोस और अविचलित है, इसे मै और मेरी धारणा-प्रवृत्ति ही जानती है। ठान लेना और उसे पूर्णता की दिशा की ओर ले जाना, मेरी सदा की प्रवृत्ति रही है।
आज इतना ही। इत्यलम्।
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २८ जून, २०२५ ईसवी।)