सई नदी की करुण कथा : पौराणिक और ऐतिहासिक नदी मर रही है

जहां भी ज़रूरत हो, सवाल उठाये जाएँ

Janvadi Lekhak Sangh India

कल दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कॉलेज में, जो कुछ दिनों पहले आरएसएस के विद्यार्थी विंग की गुंडागर्दी और जम्हूरियत-पसंद विद्यार्थियों-शिक्षकों के शानदार प्रतिरोध के कारण चर्चा में आया था, एक और निंदनीय घटना हुई. वहाँ के थिएटर-समूह ‘शून्य’ ने नुक्कड़-नाटकों का महोत्सव रखा था, जिसमें सात प्रविष्टियाँ आयीं थीं. एक दिन पहले नए-नए कार्यभार संभाले कामकाजी प्राचार्य ने आयोजकों को बुलाया और कहा कि उन्हें प्रविष्टि वाले सभी नाटकों की थीम बतायी जाए. सिनोप्सिस देखने के बाद प्राचार्य ने सात में से चार के प्रदर्शन की इजाज़त देने से मना कर दिया, क्योंकि उनमें राष्ट्रवाद या इसी तरह के मुद्दों पर विवाद होने की गुंजाइश थी. आज ‘इंडियन एक्सप्रेस’ में छपी रिपोर्ट के अनुसार प्राचार्य ने अपनी किसी भूमिका से इनकार किया है और कहा है कि आयोजकों ने ही उनके सामने यह बात रखी थी कि फलां-फलां प्रविष्टियों को इजाज़त नहीं दी जा सकती. प्राचार्य का यह दावा सफ़ेद झूठ है. रामजस कॉलेज के सूत्रों से पता चला है कि उन्होंने खुद आगे बढ़कर इस कारवाई को अंजाम दिया है.

यह प्रकरण बेहद शर्मनाक है. ज़िम्मेदार पदों पर बैठे हुए लोग अगर हिन्दुत्ववादियों की धमकियों के आगे ऐसी शर्मनाक सावधानियां बरतते रहेंगे और अपने-अपने स्तर पर सेंसरशिप लागू करते रहेंगे, तो भारत का संविधान पन्नों पर छपे हुए शब्द भर रह जाएगा. यह जानना दिलचस्प होगा कि इजाज़त न मिलने वाले चार नाटकों की सिनोप्सिस क्या बताती है. एक नाटक है, ‘ट्रम्प कार्ड’, जो खालसा कॉलेज के समूह को पेश करना था. इसमें पंथ-पूजा के मारे लोग सुशासन और विकास के लिए एक मसीहा चुन लेते हैं और जो भी असहमत है, उसे राष्ट्रविरोधी घोषित कर दिया जाता है. दयाल सिंह कॉलेज के नाटक ‘जोकिस्तान’ में जोकिस्तान नाम की एक जगह है जहां लोग खुशी-खुशी रहते हैं और खूब चुटकुले सुनाया करते हैं. धीरे-धीरे कुछ ऐसा होता है कि उनकी सुख-शान्ति घटती जाती है. इसमें भारत और जोकिस्तान के बीच सादृश्य रचा गया है. गुरु गोविन्द सिंह कॉलेज ऑफ़ कॉमर्स के नाटक ‘सवाल तो उठेगा’ की सिनोप्सिस कहती है कि ‘[अंग्रेज़ी के] 26 अक्षरों का कोई भी कॉम्बिनेशन यह नहीं बता सकता कि भारत कितना असहिष्णु हो गया है. जहां भी ज़रूरत हो, सवाल उठाये जाएँ, नाटक इस पर केन्द्रित है.’ गार्गी कॉलेज के नाटक ‘मैं कश्मीर और आप? मैं मणिपुर’ में केंद्र और परिधि के सत्ता-संबंधों पर सवाल खड़े किये गए हैं.

रामजस कॉलेज के प्राचार्य ने ठीक वही किया जिसकी मुखालफ़त ये नाटक करते हैं. इनका प्रदर्शन न हो पाने से इनके प्रदर्शन की ज़रूरत और गहरे रंगों में रेखांकित होती है. इन्हें लिखने और तैयार करने वाले विद्यार्थी ही हमारे समय की सबसे बड़ी उम्मीद हैं, और उन पर बदिशें लगाने वाले इस दौर के सबसे घिनौने चेहरे!