पिछले सत्तर साल में पाकिस्तानी फ़ौज ने राजनीतिक कल्चर को उभरने ही नहीं दिया !

महेन्द्र महर्षि, गुरुग्राम (से.नि. वरिष्ठ प्रसारण अधिकारी, प्रसार भारती)-


भारत का अमेरिका और इस्राईल के मामले में स्वतंत्र फ़ैसला शायद पाकिस्तान ने कभी सोचा भी नहीं होगा । वहाँ की फ़ौज कूटनीति को क्या समझे ? सिपाहियाना अनुशासन या तो हुक्म जानता है या फिर आर-पार की गोली वाली भाषा । उसे रिश्ते नहीं आते । भारत के इस रूख से पाकिस्तान तिलमिला गया है और फिर सिर धुनने के अलावा उसके पास क्या बचता है ? पिछले सत्तर साल में पाकिस्तानी फ़ौज ने राजनीतिक कल्चर को उभरने ही नहीं दिया । आज भी यही जारी है । फ़ौज तो हिफ़ाज़त करती है या फिर लड़ती है । लेकिन फ़ौज सामन्तियों की हो तो न तो रक्षक होगी न ही लड़ाकू । वह गुरिल्ला हो सकती है । सो हम देख रहे हैं । कश्मीर में क़बायली बन कर घुस आए, सीमा पर आतंकवादी बने हुए हैं । जब – जब लड़ने आए तो हारे और इस क़दर हारे कि अपने हिस्से ही टूट गए । दुनिया भर से सहायता की शर्तों पर दोस्ती की । परिणाम, कहीं भी सम्मान नहीं मिला । भिखारी सम्मान के पात्र नहीं दया के होते हैं और जब दयालुओं को भी निशाना बनाने लगें तो वे एबोटाबाद में घुस कर मार देते हैं । रक्षक भी आतंकी, छुपने वाले भी मौसेरे भाई ! भविष्य आने वाले इतिहास में छुपा नहीं सामने दिखता है ।

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