‘सर्जनपीठ’ की ओर से आयोजित स्वतन्त्रता-विषयक अन्तरराष्ट्रीय परिसंवाद

मूल्य समझो, स्वतन्त्रता की!
● आयोजक– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

'सर्जनपीठ', प्रयागराज की ओर से छिहत्तरवें स्वतन्त्रतादिवस की पूर्व-संध्या मे 'स्वतन्त्रता का अर्थबोध और लोकधर्म' विषयक एक अन्तरराष्ट्रीय आन्तर्जालिक बौद्धिक परिसंवाद का आयोजन 'सारस्वत सदन-सभागार' अलोपीबाग़, प्रयागराज से किया गया था।
 "मानवमात्र के प्रति अपना कर्त्तव्य-निर्वहण करना ही स्वतन्त्रता है।"

● डॉ० विवेकमणि त्रिपाठी
(एसोशिएट प्रोफ़ेसर– हिन्दी, क्वान्ग्तोंग विदेशी भाषा विश्वविद्यालय, चीन)

"स्वयं निर्मित तन्त्र मे बद्ध होकर राष्ट्र एवं मानवमात्र के प्रति अपने कर्त्तव्यों का निर्वहण करना ही स्वतन्त्रता है। हमारी सनातन परम्परा एवं मान्यताएँ लोकधर्म की संवाहिका रही हैं। लोकतन्त्र से बद्धमूल हमारी संस्कृति दूसरों की स्वतन्त्रता के बलात् अपहरण मे विश्वास नहीं करती है। हमारी स्वतन्त्रता का मूल "जियो और जीने दो'' के बीज मन्त्र मे निहित है। लोकतन्त्र से बद्ध स्वतन्त्रता मे सहिष्णुता की सीमारेखा आवश्यक है, अन्यथा स्वतन्त्रता परतन्त्रता मे भी परिवर्त्तित हो सकती है। यही कारण है कि हमारा सहिष्णु स्वतन्त्र भारतीय समाज सदियों तक परतन्त्रता की बेड़ियों मे जकड़ा रहा। स्वतन्त्रता स्वाभिमान की जननी है, सहिष्णुता की नहीं।'' 

“स्वतन्त्रता मे व्यक्तित्व-विकास की अपार सम्भावनाएँ हैं”
● डॉ० नीलम जैन
(विज़िटिंग प्रोफ़ेसर– स्टेट युनिवर्सिटी ऑव़ अमेरिका)

  "स्वतंत्रता एक ग्राह्य मूल्य है जिसमें आत्मानुशासन, वर्गसाम्य, समान नागरिक आचार संहिता, जनसुरक्षा, शासक शासित समता, जन-सुविधाओं का सामान वितरण आदि तत्त्व  ही इसे विधिपरक बनाते हैं। स्वतंत्रता में व्यक्तित्व-विकास की अपार संभावनाएँ हैं। स्वतंत्रता व्यक्तिदेह-सुख से आगे आत्मिक सुख को अपना  बना ले तो वैयक्तिक और राष्ट्रीय उत्थान सहज संभव है। अपनी स्वतंत्रता का आदर करते हुए, उसके विकास के लिए मानसिक- कायिक-वाचिक प्रयास करना ही लोकधर्म है। इसके विपरीत, यदि कोई अपनी स्वतंत्रता के प्रति  निषेधात्मक कार्य करता है तो वह अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने के समान होता है। इससे देश का शक्तिबोध और सौंदर्यबोध कुंठित होता है, परिणामतः राष्ट्र का विकास अवरुद्ध होता है। अनुशासन कर्त्तव्यपालन, श्रम- विवेक नियंत्रित अधिकार प्रयोग आदि के द्वारा स्वतंत्रता-संरक्षण में अप्रतिम योगदान किया जा सकता है। यही हमारा लोकधर्म है।"

“सत्ता से बढ़कर राष्ट्रीयता नहीं दिखती”
आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
(आयोजक, भाषाविज्ञानी, प्रयागराज)

“आज देश मे चतुर्दिक् जिस प्रकार का वातावरण लक्षित हो रहा है, उससे अत्युत्तम यह रहता, हम घोषित रूप से आज भी पराधीन रहते। जिधर देखो उधर असमाधान की हवा चल रही है। व्यक्ति, परिवार, समाज, राज्य तथा देश मे भाँति-भाँति की वर्जना-रेखाएँ खींच दी गयी हैं। ‘यह तुम्हारा-वह हमारा’ की जो दीवारें खड़ी कर दी गयी हैं, उन्हें देखकर स्वतन्त्रता हमे धिक्कारती आ रही है :– क्या स्वतन्त्रता सेनानियों ने यों ही कहकर अपने सीने पर गोलियाँ खायी थीं, “कर चले हम फ़िदा जान-ओ-तन साथियो! अब तुम्हारे हवाले वतन साथियो?” जो हमारे रक्षक कहे गये हैं, वही हमारे लिए भक्षक के रूप मे सिद्ध होते आ रहे हैं। अत्याचार, अनाचार, कदाचार अपने चरम पर दिख रहे हैं; “जिसकी लाठी उसकी भैंस” हर पल चरितार्थ हो रही है; व्यवस्था सिर झुकाकर चलने का आदेश करती है और जैसे ही सिर झुकता है, लगता है, मानो किसी ने बलभर प्रहार कर उस सिर को हमेशा के लिए झुका दिया हो। सर्वहारावर्ग अपने दबे-कुचले स्वाभिमान को सीने से लगाये स्वतन्त्रता को कोसता दिख रहा है। यहीं पर रेखांकित होती दिखने लगती है :– सत्ता की राजनीति से बढ़कर ‘राष्ट्रीयता’ नहीं है; क्योंकि हमारे यहाँ ‘समाज’ के स्थान पर क्षुद्र और गर्हित ‘स्वार्थ’ की आराधना की जाती है।”

“हम भारतीय स्वतन्त्रताबोध से सदैव अनभिज्ञ रहे हैं”
● राघवेन्द्र त्रिपाठी ‘राघव’
(वरिष्ठ पत्रकार, हरदोई, उत्तरप्रदेश)

"स्वतन्त्रता की भावना हमे ऊर्जस्वित कर देती है। ऊर्जा से लबरेज़ हम अनुशासन को नज़रअंदाज़ कर, अनेक विचारधाराओं मे से किसी के दास बन जाते हैं। जाने-अनजाने हम स्वतन्त्रता की बेड़ियों मे जकड़े हुए व्यवस्था की ग़ुलामी करने लगते हैं। हम भारतीय स्वतन्त्रताबोध से सदैव अनभिज्ञ रहे हैं और हमारी इसी आदत ने ज्ञान-विज्ञान की उर्वर धरा को बाँझ बना डाला है। हम भारत के लोग राजनीतिक क्रीतदास बनकर स्वतन्त्रता की महत्ता को खण्ड-खण्ड कर, अपने हन्ता का यशोगान कर रहे हैं। हमारी स्वतन्त्रता ग़लत को सही साबित करने मे उलझ गयी है और ग़लत स्वयं को सही साबित कर स्वतन्त्रता की देवी और विधि-विधान को पदच्युत कर, स्वयम्भू बनकर स्वतन्त्रता का भक्षण कर रहा है। स्वतन्त्रता का पहला और प्रमुख उसूल है कि सभी को समान अधिकार मिले; दुर्भाग्य! हमारे यहाँ तो ऐसा नहीं है। स्वतन्त्रता का दूसरा नियम है कि दूसरे की स्वतन्त्रता का अतिक्रमण न हो; दुर्भाग्य! दूसरे की स्वतन्त्रता का अतिक्रमण किये बिना राजनीति की इमारत ही नहीं बनती। ऐसे मे, स्वतन्त्रताबोध विचारशील व्यक्ति को जाल मे फँसी मछली बना देता है और वह मछली इस इन्तज़ार मे है कि कब उसे कोई निगल ले। देश जब तक राजनीति की बेड़ियों से आज़ाद नहीं होता, स्वतन्त्रता अधूरी है; यह मृगमरीचिका से अधिक कुछ नहीं।"

“स्वतन्त्रता मे मर्यादा, चरित्र एवं समर्पण का अभाव है”
● विनायक राजहंस
(वरिष्ठ पत्रकार, लखनऊ, उत्तरप्रदेश)

 "कहने को तो हम 76 साल पहले अँगरेज़ों से आज़ाद हो गये थे; लेकिन बहुत-से ऐसे मसले अभी हैं, जिनसे आज़ाद होना बाक़ी है। देश की जनता आज भी भ्रष्ट, पतित और बेईमान राजनेताओं और अधिकारियों के जाल मे फँसी हुई है। वह न तो आज़ादी से जी पा रही है और न ही स्वतंत्र रूप से साँस ले पा रही है। आज के राजनेता सिर्फ़ सत्ता के लिए काम करते हैं। उन्हें जनता के हित से कोई सरोकार नहीं। साधन-संसाधनों तक सभी की पहुँच नहीं हो पा रही। इस जुगाड़-तंत्र में जो आगे खड़ा है, वही आगे बढ़ता जा रहा है। पिछड़े और पीछे हो रहे हैं। वहीं आज की युवापीढ़ी स्वतंत्रता को स्वच्छंदता के रूप मे ले रही है। स्वतंत्रता के मायने तभी हैं जब स्वतंत्रता में मर्यादा, चरित्र एवं समर्पण का भाव हो। आज राष्ट्रीयता का अर्थ भी खोता जा रहा है। राष्ट्रीयता की भावना हृदय मे रखने की नहीं, प्रदर्शन की वस्तु बना दी गयी है। ऐसे मे, वह दिन दूर नहीं, जब हमे आज़ादी की दूसरी लड़ाई भी लड़नी पड़ सकती है।"