संजय सिंह, सांसद, आप ने पेयजल एवं स्वच्छता मिशन पर उठाए सवाल! | IV24 News | Lucknow

लोक-विरुद्ध होता सत्ता-प्रतिष्ठान

आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

———————–ज्वलन्त विषय——————

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

इतिहास से सीख न लेने पर महान् शक्ति भी पराजित होती रही है। एक शक्तिसम्पन्न व्यक्ति जब ‘बलप्रयोग’ करते हुए, अतिरेकता की ओर बढ़ता है तब उसकी बुद्धि किस समय पलटी खा जाये, अज्ञात रहता है। अकेले शकुनि ने धर्मराज कहलानेवाले ‘युधिष्ठिर’ की मति अपने अनुकूल कर दी थी और ‘निरीह,’ बनने के लिए ‘बाध्य’ कर दिया था। पिछले ७५ वर्षों का इतिहास बताता है कि जिस किसी ने भी ‘लोकमानस’ की भावनाओं के साथ बलप्रयोग किया है; जिस किसी ने भी मर्यादा की वर्ज्य सीमा का अतिक्रमण किया है अथवा करने का प्रयास किया है; जिस किसी ने ‘खण्डित राष्ट्र’ की कल्पना की है, निस्सन्देह, उसकी दुर्गति हुई है और इतिहास ने उसे एक ऐसे गह्वर में धकेल दिया गया है, जहाँ से उसके कर्तृत्व का कृष्णपक्ष उसके चेहरे और चरित्र के कालुष्य की कलंक-कथा सुनाता हुआ-सा परिलक्षित होता है।

आज एक ऐसा लोकतन्त्रीय परिदृश्य सामने आ चुका है, जो भारतीय राजनीति के इतिहास के अध्याय में पहली बार ‘सर्वाधिक घिनौना और ‘कोढ़ी’ अध्याय के रूप में जुड़ चुका है। देश की जनता को कुपोषण और महँगी शिक्षा की आग में झुलसाया जा रहा है। देश की औसत जनता किस प्रकार अपना जीवन-यापन कर रही है, इसके प्रति ‘न्यू इण्डिया की मोदी-सरकार’ को कोई चिन्ता नहीं है। यही कारण है कि आज महँगाई सुरसा के मुख की तरह बढ़ती जा रही है और सरकारी प्रवक्ता इसे अपनी सरकार की ‘उपलब्धि’ बताकर निर्लज्जता का प्रदर्शन करते आ रहे हैं।

अटल बिहारी वाजपेयी जब देश के प्रधान मन्त्री थे तब भी ‘राष्ट्रीय जनतान्त्रिक गठबन्धन’ था; किन्तु तब उन्होंने ‘राष्ट्रीय सरकार’ गठन करने की इच्छा व्यक्त की थी; अधिकतर विपक्षी दल उनसे सहमत भी थे; वे सबको विश्वास में लेकर कोई निर्णय करते थे; उनकी कार्यशैली में अपेक्षाकृत अधिक पारदर्शिता थी; उनका कार्यकाल साम्प्रदायिक सद्भावना से ओत-प्रोत था। यह भी सत्य है कि उनसे भी राष्ट्रहित में कई अज्ञात-ज्ञात भूलें हुई थीं, जिनके परिणाम-प्रभाव को देश की जनता भोगने के लिए विवश है। चूँकि अब वे इस असार संसार से विदा हो चुके हैं अत: यहाँ उन्हें नेपथ्य में डालना उचित है; परन्तु निष्पक्ष इतिहास ने कभी किसी को क्षमा नहीं किया है।

व्यामोह की स्थिति है कि पिछले सात वर्षों में वर्तमान सरकार की आधारमूलक कोई उपलब्धि दृष्टिगत नहीं हो पा रही है। भौतिक हवाई उड़ाने तो बहुत दिखती हैं; परन्तु देश की जनता को कई मूलभूत आवश्यकताओं के साथ जो उड़ान जोड़ सके, आज उसकी महती आवश्यकता है। आज जो हमें देश की ‘विदेश और रक्षानीति’ दिख रही है, वह कई दशकों के प्रयासों का परिणाम है, न कि मात्र सात वर्षों में किसी नेता की एक-के-बाद-एक विदेश-यात्राओं के कारण।

हमारे पूर्ववर्ती सभी प्रधानमन्त्रियों का देश को प्रगतिगामी करने में योगदान अवश्य रहा है। किसान बीज का वपन कर, इस दुनिया से चला जाता है और वह बीज जब अंकुरण का श्रेय प्राप्त करते हुए, फलों से आच्छादित हो जाता है तब उसका सारा श्रेय उक्त कृषक के परिवार का तत्कालीन मुखिया ले लेता है; अक्षरश: वही स्थिति आज देश की राजनीति की भी है। शिलान्यास किसी ने कराया; निर्माण किसी ने कराया; परन्तु उद्घाटन कर सारा श्रेय किसी और ने बटोर लिया। यहाँ अन्तर इतना है कि कृषक की सन्तान यह अवश्य बताता है कि अमुक वृक्ष उसके पिता, बाबा-दादा के समय का है, जबकि राजनीति इतनी बीभत्स और निर्लज्ज हो चुकी है कि अपने पूर्ववर्तियों के सुकर्मों को अपने नाम पंजीकृत करा लेती है।

पिछले सात वर्षों में देश का वर्तमान राजनैतिक नेतृत्व ‘हिन्दू’, ‘हिन्दुत्व’, ‘गो’, ‘मुसलमान’, दलित’, ‘मन्दिर’— इन्हीं विषयों में उलझ और सिमट कर रह गया है। ऐसा इसलिए कि वर्तमान सत्ताधारी दल के पास समग्र राष्ट्र को प्रतिबिम्बित करनेवाला कोई दृष्टिबोध नहीं है। वर्तमान नेतृत्व ने पिछली सरकारों की सभी नकारात्मक ऊर्जा को बुद्धि-चातुर्य से अपनी ओर खींचकर और कुछ स्वार्थपरक प्रवृत्तियों को विकसित कर, जो वातावरण सर्जित किया है, वह देश के स्वास्थ्य को बहुविध प्रभावित कर रहा है।

सत्ता की साम्प्रतिक राजनीति राष्ट्र को ‘अपंग’ और ‘दिव्यांग’ बनाने की दिशा में अग्रसर है। ऐसा इसलिए कि हमारा शिक्षित और अभियोग्य युवावर्ग को शिक्षा, परीक्षा तथा सेवा की दिशाहीन नीतियों के कुचक्र में फँसाकर पीसने की तैयारी कर ली गयी है। कभी उसे पकौड़े बेचने की ओर प्रवृत्त किया जाता है तो कभी बजबजाते नालों के पास गुमटी खोलकर और ईंधन के लिए उस महादुर्गन्धयुक्त नाले में पाइप लगाकर उससे ईंधन खींचकर चाय पकाने के लिए प्रेरित किया जाता है। ऐसा यदि किसी देश का प्रधानमन्त्री रोज़गार के रूप में इसे एक विकल्प बनाकर प्रस्तुत करता है तो उसे बौद्धिक और मानसिक स्तर पर किसी ‘दिवालिये’ से कम नहीं समझा जायेगा। इससे अधिक विडम्बना और क्या हो सकती है कि सत्ता-प्रतिष्ठान का प्रमुख देश की जनता की भावना-भाण्डार में सेंध लगाने के लिए स्वयं को ‘जनता का चौकीदार’ कहे और अपने कुण्ठित-लुण्ठित आचरण से जन-जीवन को अस्त-व्यस्त और त्रस्त-पस्त कर दे।

वास्तव में, सत्ता-प्रतिष्ठान का जन-जीवन की संवेदना के प्रति कहीं-कोई सहानुभूति नहीं है। अँगरेज़ों ने भारतीयों की नीति और नीयत तथा मानवजन्य शिथिलताओं का पर्याप्त अध्ययन और परिशीलन किया था। यही कारण था कि तत्कालीन क्रान्तिधर्मिमों के गुप्त स्थानों और प्रतिदिन परिवर्त्तित होती उनकी समय-सत्य नीतियों का रहस्योद्घाटन अपने ही देश के अर्थ-लोलुप ग़ुलाम ही किया करते थे। अँगरेज़ दो टुकड़े फेंक देते थे और जानवर से भी बदतर वे राष्ट्रद्रोही दुम हिलाते हुए, उनके प्रति समर्पित हो जाते थे।

आज का राजनैतिक परिदृश्य उससे पृथक् नहीं है; फिर ग़ुलाम ही ‘ग़ुलाम’ की मानसिकता को अधिक प्रभावकारी ढंग से ग्रहण करता है। हिन्दू एक बृहद् वटवृक्ष की भाँति है, जिसकी सुदृढ़ शाखाएँ विविध रूपों में हैं; वहीं सत्ता-प्रतिष्ठान में एक ऐसा निर्मम लकड़हारा बैठा हुआ है, जो अपने शातिर दिमाग़ से उक्त प्रकार के कई वृक्षों को धराशायी करता आ रहा है। उसके पास विभिन्न प्रकार की कुल्हाड़ियाँ हैं— ‘हिन्दू-मुसलमानों के मध्य घृणा का वातावरण बनानेवाली कुल्हाड़ी’, ‘आरक्षण-प्रति-आरक्षण’ से एक वर्ग को दूसरे वर्ग से काट-छाँटकर अलग करनेवाली कुल्हाड़ी’, ‘दलित को एक विशेष प्रकार के मोहक आसन’ बनाकर और उसके माध्यम से अन्य जातियों में ज़ह्र भरनेवाली कुल्हाड़ी’, ‘अवसर को भाँपकर पिछड़े वर्ग के सामने ‘आरक्षण’ का टुकड़ा फेंककर उन्हें अपने पक्ष में करनेवाली कुल्हाड़ी’ तथा समय-समय पर अन्य राष्ट्रद्रोहात्मक कृत्य करनेवाली कुल्हाड़ियाँ। वहीं देश के विपक्षी दल आपस में ही कट मरने की स्थिति में दिखते आ रहे हैं। देश का लोकतन्त्र किंकर्त्तव्यविमूढ़-सा’ हो गया है।

यह भी सत्य है कि कोई डराकर-धमकाकर, अधिनायक का अतिरेकी रूप दिखाकर, लोकतन्त्र में टिक नहीं सका है। श्रीमती इन्दिरा गांधी-जैसी नेत्री के चमत्कारपूर्ण प्रभाव को भी मतदाताओं ने बिखेर कर रख दिया था और भी कई उलट-फेर कर देश के मतदाता सन्देश देते आ रहे हैं। ऐसे में, ‘राष्ट्रीय जनतान्त्रिक गठबन्धन’ को बाहर का रास्ता दिखाने से देश के मतदाता चूकेंगे नहीं। वर्ष २०१४ और वर्ष २०१९ के चुनावी परिदृश्य से बिलकुल हटकर आगामी चुनावी परिदृश्य होगा, इसके संकेत आने शुरू हो चुके हैं। “दूर के ढोल सुहावने होते हैं” के अन्दाज़ में वर्ष २०१४ और वर्ष २०१९ में मात्र उस ढोल की ध्वनि के प्रति अनुपम आकर्षण था। अब, जब वह ढोल लोकतन्त्र के रंगमंच पर लाया गया और उसे बजाया गया तब वह बेहद बेसुरा निकला और “ढोल में पोल” को सार्थक कर गया।

प्रश्न उठता है, नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में देश के नागरिकों के किन हितों का पोषण हो रहा है? स्वास्थ्य, आहार, शिक्षा तथा नियोजन के क्षेत्रों में सरकार चलानेवालों ने क्या किये हैं? अपने आश्वासनों और घोषणाओं में से कोई भी ऐसा विषय है, जिसे मोदी ने पूर्ण किया हो? जिन विषयों को लेकर वे सत्तासम्राट् बने हैं, उन सभी विषयों को विस्मृत कर गये हैं? महँगाई देश की जनता की कमर तोड़ रही है; परन्तु देश का शासक ‘किंकर्त्तव्यविमूढ़’ बना हुआ है?..!

सच तो यह है कि ‘नरेन्द्र दामोदर मोदी’ के चेहरे और नाम से देश की जनता का अब मोहभंग होना आरम्भ हो चुका है और पर्द: के पीछे से ‘विकल्प’ आने की तैयारी में है; ठीक उसी तरह से जिस तरह से किसी वस्तुनिष्ठ प्रश्न के अन्तर्गत दिये गये चार विकल्पों में से एक ही विकल्प सर्वाधिक उपयुक्त होता है; जैसे— पहला विकल्प :– इनमें से कोई नहीं।

दूसरा विकल्प तभी बन सकेगा जब देश के सभी विपक्षी दल उक्त प्रकार की एकपक्षीय दृष्टि से स्वयं को पृथक् कर समदर्शिता का परिचय देंगे। वहीं देश के सुशिक्षितों का वह वर्ग, जो देश की राजनीति को स्वस्थ दिशा देने के प्रति जागरूक है, उसे एक नयी दृष्टि की चमक के साथ आगे आना होगा। इसके लिए अभी से जनमानस की कठिनाइयों, अभावों तथा अन्य अनियमितताओं के साथ स्वयं को जोड़ना होगा, ताकि स्वस्थ और बहुजनमत के साथ देश के जन-जन की आह-संवेदना में सत्ता की सुखमय भागीदारी हो सके। अब समय ‘परिवर्त्तन’ का है, जिसे ‘बहुमत’ के साथ स्वीकार करना, प्रत्येक भारतीय का परम कर्त्तव्य बन जाता है।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १८ अगस्त, २०२१ ईसवी।)
यायावर भाषक-संख्या : ९९१९०२३८७०
prithwinathpandey@gmail. com