ऋचा भारती पटेल क्या तुम ग़लत हो ?

राँची वाले जज साहब से डरो

राम वशिष्ठ (युवा चिन्तक व फिल्मकार) –

झारखंड की एक छात्रा ऋचा भारती पटेल ने फेसबुक पर एक पोस्ट डाली । पोस्ट की पुलिस में शिकायत हुई और छात्रा को जेल भेजा गया । मामला अदालत में गया तो जज साहब ने जमानत देने के लिए शर्त लगा दी कि कुरान की पांच प्रतियां बांटो और बांटने का सबूत दो । यह कैसा फैसला है ? आखिर कोई जज ऐसा फैसला कैसे दे सकता है ?

बहुत बार अदालत ने कुछ ऐसे फैसले सुनाये हैं जो लीक से हटकर थे लेकिन यह फैसला उस श्रेणी में शामिल नहीं किया जा सकता । यह दुस्साहस भरा हैं , यह गलत परम्परा को जन्म देने वाला हो सकता है । यह ठीक वैसा ही है जैसा सल्तनत काल में होता था कि या तो इस्लाम स्वीकार करो या भुगतो जजिया और मरो । यह फैसला नहीं फ़रमान है और फ़रमान सनक की हद तक भी हो सकते हैं । जज साहब जाने अनजाने इस्लाम के प्रचारक बन बैठे । अब कृपया इस लेख को अदालत की तौहीन नही समझना । ऐसी अदालतों की क्या तौहीन जो 90 के दशक के चारे घोटाले में अब भी सुनवाई कर रही हैं , जो पूर्व प्रधानमंत्री की हत्या के दोषियों को 20 साल तक ठीक से सजा मुकम्मल नहीं करा सकी थी । ऐसी अदालतों की क्या तौहीन जो एक केन्द्रीय मंत्री के हत्यारों को 37 साल बाद सजा सुनाती हैं , जो राम मंदिर विवाद को जानबूझकर लंबा खींच रही हैं । एक धर्मनिरपेक्ष देश में धार्मिक आधार पर पक्षपातपूर्ण फैसला करने वाली अदालतों की तौहीन क्या ? जो भी भर्त्सना होगी वो आंख खोलने के लिए ही होगी । यहां भी मैं यही कर रहा हूँ ।

अब इस सनकी फ़रमान के बाद अगर इसके आलोक में फैसले होने लगे तो क्या होगा ? फिर तीन तलाक और हलाला के खिलाफ लिखने पर रांची वाले जज साहब यह फैसला भी सुना सकते हैं कि जमानत की शर्त है तीन तलाक पीड़ित पांच मुस्लिम महिलाओं का हलाला तुम ही करो सबूत के साथ ( नोट – यह महिला विरोधी कमेंट या वाक्य नहीं है , यह अदालत के सनकी फ़रमान विरूद्ध हैं । ) इस्लाम के विपक्ष में कुछ लिखने पर रांची वाले जज साहब जमानत देने के लिए इस्लाम स्वीकार करने की कंडिशन लगा सकते हैं । तो जनाब धर्मनिरपेक्ष भारत में अगर रहना है तो रांची वाले जज साहब से डरना चाहिए आपको ।

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