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मैं अपनों से हुआ पराजित, अपनी ही हल्दीघाटी में” : अशोक सनेही

कविसम्मेलन और मुशायरा सम्पन्न

‘साहित्यांजलि प्रज्योदि’ की ओर से सारस्वत भवन, लूकरगंज, प्रयागराज में ‘प्रकृति से पराप्रकृति की ओर’ नामक समारोह के अन्तर्गत नगर के प्रमुख कवि और शाइरों ने अपनी रचनाओं का पाठ किया और सुनाया।

पं० राकेश मालवीय ‘मुस्कान‘ ने सुनाया, “गोमुख से निकली हैं गंगा, अविरल, चंचल, धवलित गंगा।”

‘फ़रमूद’ इलाहाबादी ने सुनाया, “बाढ़ आये या कहीं सूखा पड़े, दनदनादनदन कुल्हाड़ी है तो है।”

रुस्तम इलाहाबादी ने सुनाया, “बरबादी तो तय थी मेरी, तुम होते तो क्या कर लेते?”

मुख्य अतिथि अनवार अब्बास ने सुनाया, “नृत्य बालाओं के घुँघरू की झनक है जीवन, टूटनेवाली लड़ी, टूटने तक है जीवन।।”

संयोजक डॉ० प्रदीप चित्रांशी ने पढ़ा, “जब से शहरी पाँव को, मिला गाँव में ठाँव।
बरगद महुआ नीम की, लुप्त हो गई छाँव।।’

समारोह के अध्यक्ष आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने पढ़ा, “हद से ज़िद्दी है बेवा का चूल्हा, मुफ़्लिसी में अब वह खाती ही नहीं।

नायाब बलियावी की ग़ज़ल थी, “कचरे से तन को किया तुमने मैला, गंगा स्वयं नहाने कहाँ जाये।”

संचालक डॉ० रवि मिश्र ने पढ़ा, “उसने फूल नहीं भेजे हैं, न प्यार जताया करती है। मेरी आँखें जब नम होती हैं, वो सागर हो जाया करती है।”

असलम ‘आदिल’ इलाहाबादी ने ग़ज़ल पेश की, “दौरे तरके उलफ़त को आइए भुलाया जाये, मुसकुरा के दिल से आज फिर मिलाया जाये।”

अशोक सनेही ने सुनाया, “झुका नहीं चाहे मैं टूटा, सब प्रण आज मिले माटी में। मैं अपनों से हुआ पराजित, अपनी ही हल्दीघाटी में।”

डॉ० रामलखन चौरसिया ‘वागीश’ ने दोहा सुनाया, “अस्ल सियासत के हुए, दंगा और फ़साद। चले मज़हबी आग में, बारूदी उन्माद।।”

एस०पी० श्रीवास्तव ने सुनाया, “क्या वजूद इंसान का, देता पेड़ सबूत। जिसकी जितनी हैं जड़ें, वह उतना मज़बूत।।”

केशव सक्सेना ने पढ़ा, “युगों-युगों से जाने कितनी बार मैं जीवन को जिया और मरा हूँ, जैसा हुआ कर्मों का लेखा, वैसा ही पुनर्जन्म पाया हूँ।”

प्रेमनारायण सेन की रचना थी, “प्रेम की पराकाष्ठा में आँसू बहाना कायरता है।” इस आयोजन में ज्योति चित्रांशी की विशेष भूमिका रही।

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