डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
बेचारा है, दिल तोड़ नहीं पाता,
बेचारा है, दिल छोड़ नहीं पाता।
नफ़रत क़रीने से सजा के रखता है,
बेचारा है, दिल जोड़ नहीं पाता।
हर सम्त लोग मुखौटे लगाये हैं बैठे,
बेचारा है, दिल मोड़ नहीं पाता।
वक़्त
हमने सोचा था,
चैन से कट जायेगा,
ज़िन्दगी का हर पल।
समय ने दस्तक दी।
एक अनजाने गह्वर में डाल दी गयीं
बटोरी हुईं सारी साँसें।
फ़ज़ा में उड़ दिये गये
बची-खुची ज़िन्दगी के पल-दो-पल।
मैं ठगा-सा देखता रह गया,
वक़्त की बाज़ीगरी!
कुछ शेर
मैंने धूनी बहुत रमाई है,
चोट भी बहुत खाई है।
चाह नहीं पूर्णमासी की,
हिस्से में अमावस आयी है।
ज़माने से हर बाज़ी जीती,
पर ख़ुद से मात खाई है।
वह निगोड़ी घोड़ी-सी चलती है,
बातों में उछाल लाके छलती है।
उस पे यक़ीं करना मुमकिन नहीं,
जनाब! आस्तीनों में वह पलती है।
(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, इलाहाबाद; २ फ़रवरी, २०१८ ई०)