डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय की पाठशाला में जानिए वाक्य-विन्यास

भाषाविद्-समीक्षक डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

आज ‘गुरु पूर्णिमा’ है।
★ आषाढ़-मास की ‘पूर्णिमा’ को ‘गुरु पूर्णिमा’ की संज्ञा दी गयी है। इस सारस्वत पर्व पर ‘गुरुस्मरण’ का विधान है।

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय की पाठशाला

हिन्दी-व्याकरण का नियम
वाक्य-विन्यास :-

किसी भी वाक्य की रचना करते समय सबसे पहले ‘कर्त्ता’, उसके बाद ‘कर्म’ तथा अन्त में ‘क्रिया’ (अकर्मक अथवा सकर्मक) का प्रयोग किया जाता है। उदाहरण के लिए— मनीषा विद्यालय जाती है।

विद्यार्थी यदि ऐसा लिखता है :– ‘विद्यालय जाती है मनीषा’ अथवा ‘जाती है विद्यालय मनीषा।’ अथवा ‘है जाती विद्यालय मनीषा।’ अथवा ‘विद्यालय है जाती मनीषा। अथवा उक्त नियम के विपरीत कोई भी वाक्य तो उसका वाक्य शुद्ध और उपयुक्त नहीं माना जायेगा। यह विषय अलग है कि हमारे समाचारपत्रों में समाचार, लेखादिक के शीर्षक भाव और अर्थ की दृष्टि से सन्तुलित नहीं दिखते; क्योंकि वहाँ कार्यरत पत्रकारों को सही ढंग से समझानेवाला कोई नहीं है; अब व्याकरण-असम्मत वैसा शीर्षक लिखने की एक कुत्सित प्रथा-सी चल पड़ी है; समूचा मीडियाजगत् उससे ग्रस्त और शिक्षाजगत् त्रस्त। हमारा ‘मुक्त मीडिया’ (सोसल मीडिया) भी उससे दुष्प्रभावित है।
उदाहरणार्थ– प्रणाम गुरुदेव।

यह वाक्यांश शुद्ध नहीं है; क्योंकि इसमें कर्त्ता-शब्द आरम्भ में है ही नहीं और क्रिया भी अलक्षित है, इसीलिए इसे वाक्यांश कहा गया है। इसका शुद्ध रूप बनेगा :– गुरुदेव! प्रणाम करता हूँ। (इसमें कर्म ‘आपको’ छुपा हुआ है, जो प्रयोगस्तर पर प्रकट हो जाता है।)

‘देवनागरी लिपि’ और ‘हिन्दीभाषा’ को इसीलिए ‘वैज्ञानिक’ कहा जाता है। विश्व की ऐसी कोई भाषा उतनी अनुशासित नहीं है जितनी अपनी ‘हिन्दीभाषा’।
………. तस्मै श्री गुरवे नम:।

(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १६ जुलाई, २०१९ ईसवी)

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