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डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय की पाठशाला – गोष्ठी-संगोष्ठी, चर्चा-परिचर्चा, वार्त्ता, संवाद-परिसंवाद

‘गोष्ठी’ संस्कृत का स्त्रीलिंग संज्ञा-शब्द है। इस शब्द की रचना ‘गोष्ठ’ शब्द से हुई है। ‘गोष्ठ’ संस्कृत-भाषा का ‘पुल्लिंग’ (पुंलिंग) शब्द है। ‘गो’ शब्द में ‘स्था’ धातु है, जिसका अर्थ ‘ठहरना’ है। इस धातु के मिलने और ‘क’ का संयोग होने से ‘गोष्ठ’ शब्द का अस्तित्व उभरता है। इस प्रकार ‘गोष्ठ’ शब्द का अर्थ हुआ, परामर्श, सलाह, मन्त्रणा, मशविरा आदिक। ‘गोष्ठ शब्द में जैसे ही ‘ङीष्’ प्रत्यय जुड़ता है, ‘गोष्ठी’ शब्द का सर्जन हो जाता है।

‘गोष्ठी’ का अर्थ है :— मित्रमण्डली अथवा शुभचिन्तकों अथवा परिचितों का समुदाय। इसकी परिभाषा है :– ऐसी बैठक, जिसमें किसी भी विषय पर विचार-विमर्श करने के लिए औपचारिक रूप में मित्रमण्डल अथवा किसी संस्था के सदस्यगण भाग लेते हैं, ‘गोष्ठी’ कहलाती है।
सामान्यत: साहित्यजगत् में एक शब्द प्रचलित है, ‘कविगोष्ठी’। इसका आयोजन जिस रूप में किया जाता है, वह ‘कविगोष्ठी’ के चरित्र के अनुरूप नहीं होता। वह एक प्रकार का ‘काव्यपाठ आयोजन’ होता है; उसे ‘कवि-सम्मेलन’ भी कह सकते हैं। ‘कविगोष्ठी’ उसे कहते हैं, जिसमें कविगण कवि और काव्य से सम्बन्धित किसी विषय पर मन्त्रणा करते हैं; विचार-विमर्श तथा चर्चा-परिचर्चा करते हैं।

‘संगोष्ठी’ भी स्त्रीलिंग-शब्द है। ‘गोष्ठी’ शब्द के पूर्व में उपसर्ग के रूप में ‘सं’ (सम्) लगा हुआ है, जो गोष्ठी शब्द से ‘संगोष्ठी’ शब्द को उसकी अर्थ, अवधारण तथा परिभाषा की दृष्टि से अलग करता है। गोष्ठी की तरह से यह भी औपचारिक रूप में आयोजित किया जाता है किन्तु इसका विस्तार और महत्त्व अपेक्षाकृत अधिक रहता है। यहाँ पर ‘सं’ का अर्थ ‘सम्यकरूपेण’ है; अर्थात् जिस गोष्ठी में विषय का निर्धारण पूर्व में किया गया हो ; समय-प्रबन्धन हो तथा विधि-विधानपूर्वक उसका संयोजन-सञ्चालन हो, वह ‘संगोष्ठी’ कहलाती है। उदाहरण के लिए : राष्ट्रीय-अन्तरराष्ट्रीय संगोष्ठी इत्यादिक।

चर्चा’ संस्कृत का स्त्रीलिंग-शब्द है। यह ‘चर्च्’ धातु का शब्द है, जिसका अर्थ ‘चर्चा करना’ है। इसके साथ कई प्रत्यय जुड़े हुए हैं। वे प्रत्यय हैं :— ‘णिच्’, ‘अङ्’ तथा ‘टाप्’।

‘चर्चा’ का अर्थ है :—- वार्त्तालाप। किसी विषय अथवा किसी व्यक्ति पर किया जानेवाला वार्त्तालाप ‘चर्चा’ कहलाती है

‘परिचर्चा’ शब्द भी संस्कृत-भाषा का स्त्रीलिंग-शब्द है। ‘चर्चा’ शब्द में ‘परि’ नामक उपसर्ग के लग जाने से इसका महत्त्व अत्यधिक दिखने लगता है ‘परि’ शब्द का अर्थ है, ‘चारों ओर’। संस्कृत में इसे ‘परितः’ कहा गया है। जिस विषय पर समग्र में चर्चा की जाती है; अर्थात् जिस विषय पर सांगोपांग सामूहिक विचार किया जाता है; प्रश्न-प्रतिप्रश्न तथा उत्तर-प्रत्युत्तर किये जाते हैं, उसे ‘परिचर्चा’ कहा जाता है।

वस्तुतः चर्चा-परिचर्चा अधिक अन्तरंग और व्यक्तिगत प्रतिक्रियाओं पर आधारित होती हैं। इसमें पारस्परिक विचारों का आदान-प्रदान प्रमुख होता है, अतः यहाँ धारावाहिकता भंग हो जाती है।

‘वार्त्ता’ (‘वार्ता’ अशुद्ध शब्द है।) संस्कृत-भाषा का स्त्रीलिंग, संज्ञा-शब्द है। इसका अर्थ है :– बातचीत, समाचार। वह कथन, जो किसी को किसी विषय का बोध कराने के लिए किया जाये, ‘वार्त्ता’ कहलाती है। दस-बीस जन अथवा किसी जनसमूह के मध्य अपने विचार प्रकट करना, ‘वार्त्ता’ है। इसमें भाषण की औपचारिकता नहीं रहती। वार्त्ता प्रश्नोत्तरी पर आधारित हो सकती है अथवा उसके कई विषय हो सकते हैं। वार्त्ता में धारावाहिकता बनी रहती है।

‘संवाद’ (‘सम्वाद’ अशुद्ध है।) संस्कृत-भाषा का पुल्लिंग- संज्ञा-शब्द है | ‘संवाद’ शब्द में ‘सं’ (सम्यकरूपेण) उपसर्ग है। ‘वाद’ का अर्थ ‘विचार’ है; ‘मत’ है; ‘संवाद’ का अर्थ है :– कथोपकथन, वार्त्तालाप। दो अथवा दो से अधिक मनुष्यों के मध्य किया जानेवाला वार्त्तालाप ‘संवाद’ कहलाता है। संवाद को किसी सामान्य वार्त्ता के रूप में ग्रहण नहीं किया जाता। इसके अन्तर्गत ‘कथन-उपकथन’ का समावेश रहता है, इसीलिए संवाद का एक अन्य नाम, जो साहित्यिक है, ‘कथोपकथन’ कहलाता है।
‘प्रतिसंवाद’ में विषय का विवेचन कुछ व्यापक हो जाता है। जब यह किसी विषय-विशेष पर केन्द्रित हो जाता है तब ‘परिसंवाद’ कहलाता है। इसमें वस्तुनिष्ठता बनी रहती है। इस शब्द में ‘संवाद’ के पूर्व में ‘प्रति’ उपसर्ग लगा हुआ है। यहाँ ‘प्रति’ का अर्थ ‘विरुद्ध’ और ‘बदले में’ है। इसका अर्थ यह हुआ कि किसी संवाद के उत्तर में की गयी अभिव्यक्ति ‘प्रतिसंवाद’ कहलाता है। दूसरे शब्दों में :– संवाद के बदले में किया गया ‘संवाद’ ‘प्रतिसंवाद’ है। यह उसी तरह से है, जिस तरह से ‘प्रश्न-प्रतिप्रश्न’ है।
(प्रकाशन-प्रक्रिया में कृति : ‘आइए! शुद्ध हिन्दी लिखें : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय’ से साभार)
(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, इलाहाबाद ; ७ मार्च, २०१८ ईसवी)
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