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भारत के प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी का ‘इतिहास-बोध’ समझिए!

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
(प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक)

३ मई, २०१८ ई० को कर्नाटक-राज्य में अपने चुनावी भाषणों में स्थान-स्थान पर जिस तरह से, जिन शब्दों, तथ्यों का भारत के प्रधान मन्त्री नरेन्द्र मोदी ने उद्घाटन किया था, उनसे अब तक का इतिहास असत्य दिखने लगता है; किन्तु सिद्ध नहीं होता।
पहले आप नरेन्द्र मोदी का शब्दश: भाषण को समझिए; फिर तय कीजिए : नरेन्द्र मोदी को ‘भारत के इतिहास’ की कितनी समझ है। नरेन्द्र मोदी ने कहा था :——
एक :–
“१९४८ में पाक से युद्ध जीता, फील्ड मार्शल जनरल थिमय्या जी के नेतृत्व में; लेकिन उस पराक्रम के बाद कश्मीर को बचानेवाले जनरल थिमय्या का उस समय के प्रधानमन्त्री नेहरू और उस समय के रक्षामन्त्री कृष्णा मेनन ने बार-बार अपमान किया था और इसी के कारण जनरल थिमय्या को अपने पद से सम्मान के खातिर इस्तीफ़ा देना पड़ा था। मैं कर्नाटक की नयी पीढ़ी को बताना चाहता हूँ।”
दो :–
“फील्ड मार्शल करियप्पा १९६२ भारत और चीन घटना आज भी इतिहास में दर्ज़ है और उनके साथ, जनरल करियप्पा के साथ क्या व्यवहार किया गया था।”
अब नरेन्द्र मोदी के भाषण और झूठ के बीच की दूरी को क्रमश: समझिए :—–
एक :—
वर्ष १९४८ में थिमय्या जनरल नहीं थे; जनरल रॉय बुशर थे। थिमय्या वर्ष १९५७ में जनरल नियुक्त किये गये थे और वर्ष १९६१ तक पद पर बने रहे। इतना ही नहीं, तब कृष्णा मेनन रक्षामन्त्री नहीं थे; अपितु सरदार बलदेव सिंह थे। के० एस० थिमय्या का अपमान नहीं किया गया था; बल्कि सम्मान किया गया था। थिमय्या को राष्ट्र की सेवा के लिए ‘पद्मभूषण’ से सम्मानित किया गया था।
थिमैया ने इस्तीफ़ा नहीं दिया था; प्रत्युत इस्तीफ़ा देने की इच्छा व्यक्त की थी।
दो :—
करियप्पा की ‘प्रथम कमाण्डर-इन-चीफ़’ के पद पर नियुक्ति नेहरू-शासनकाल में किया गया था। नेहरू-करियप्पा के मध्य मतभेद वर्ष १९५१ में हुआ था। करियप्पा वर्ष १९५३ में सेवानिवृत्त हुए थे।
ऐसे में, यदि किसी देश का प्रधान मन्त्री अर्थहीन बातें करता है; अपने उथले इतिहास-ज्ञान से अपने देश की जनता को भ्रमित करता है तो इससे अधिक उसके लिए लज्जा की बात और क्या हो सकती है।
(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, इलाहाबाद; १० मई, २०१८ ई०)
तो क्या उत्तरप्रदेश के सत्ताधारियों की आँख का पानी मर गया है?.!
— डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
उत्तरप्रदेश के मुख्यमन्त्री-शिक्षामन्त्री!
ये अभ्यर्थी आपसे ‘नौकरी’ की भीख नहीं माँग रहे हैं; अपितु न्यायालय-प्रदत्त अपना अधिकार माँग रहे हैं और आपके शासन में कार्यरत सम्बद्ध मन्त्री, प्रशासनिक अधिकारी आदिक न्यायालय के आदेश की अवमानना कर रहे हैं, जिसमें मुख्यमन्त्री का भी योगदान है।
युद्धस्तर पर इन अभ्यर्थियों का आन्दोलन जारी है; ठीक उसी तरह, जिस तरह ग़ुलामी के दिनों में क्रान्तिधर्मियों ने यह स्वर निनादित कर दिया था :– आज़ादी लेकर हम रहेंगे; और लेकर दिखा दिया था।
ये भी किसी की सन्तान हैं; आँखों के तारा हैं। इन सभी की करुण और दारुण दशा देखकर अब तक पाषाण भी पिघल जाता; तो क्या आप लोग पाषाण से भी अधिक कठोर हैं।
वाह! ‘जयश्री राम’ का उद्घोष करनेवालो- ‘रामराज’ का शंखनाद करनेवालो! राम ने स्वयं के लिए नहीं; प्रत्युत अपनी प्रजा के लिए शासन किया था। कहा जाता है कि रामराज में सभी सुखी थे; परन्तु आपके ‘हिन्दूराज’ में लाखों बेटी-बेटे भुखमरी के कगार पर आ गये हैं। विरोधस्वरूप राजधानी लखनऊ में कई महीने से अपना उचित अधिकार पाने के लिए भूखे-प्यासे और तरह-तरह के अभाव में रहकर ये अभ्यर्थी अपनी न्यायोचित माँग को लेकर आन्दोलनरत हैं।
आप वास्तव में, यदि योगी हैं तो योगि-हृदय का परिचय देते हुए, इन अभ्यर्थियों के शिष्टमण्डल/प्रतिनिधिमण्डल के साथ सौजन्यपूर्ण वातावरण में संवाद कीजिए और ऐसा कोई निष्कर्ष निकालिए कि वे सभी अभ्यर्थी सेवारत होकर बेरोज़गारी के दंश से मुक्त हो जायें; अन्यथा जब-जब क्रान्ति हुई है, उसके मूल में ‘युवाशक्ति’ ही रही है।
इत्यलम्।