प्रेम ही श्रद्धा है

प्रेम ही संवेदना है।
प्रेम ही साहस है।।
प्रेम ही श्रद्धा है।
प्रेम ही सद्वृत्ति है।।
प्रेम ही सद्भाव है।
प्रेम ही संबंध है।।
प्रेम ही मैत्री है।
प्रेम ही प्रवृत्ति है।।
प्रेम ही सहकार है।
प्रेम ही स्वीकार है।।
प्रेम ही सहजीविता है।
प्रेम ही सुसभ्यता है।।
प्रेम ही सहिष्णुता है।
प्रेम ही साहचर्य है।।
प्रेम ही सौंदर्य है।
प्रेम ही माधुर्य है।।
प्रेम ही उमंग है।
प्रेम ही तरंग है।।
प्रेम ही संगठन है।
प्रेम ही संघ है।।
प्रेम ही संयोग है।
प्रेम ही संगीत है।।
प्रेम ही नृत्य है।
प्रेम ही गीत है।।
प्रेम ही संगम है।
प्रेम ही निगम है।।
प्रेम ही विलय है।
प्रेम ही उदय है।।
प्रेम ही स्वरबद्धता है।
प्रेम ही लयबद्धता है।।
प्रेम ही उपासना है।
प्रेम ही आराधना है।।
प्रेम ही आकर्षण है।
प्रेम ही समर्पण है।।
प्रेम ही धारणा है।
प्रेम ही अहंशून्यता है।।
प्रेम ही भक्ति है।
प्रेम ही अनुरक्ति है।।
प्रेम ही अनुगमन है।
प्रेम ही अनुशासन है।।
प्रेम ही रसमयता है।
प्रेम ही मादकता है।।
प्रेम ही मस्ती है।
प्रेम ही स्वस्ति है।।
प्रेम ही ऊर्जा है।
प्रेम ही उत्कर्ष है।।
प्रेम ही आत्मीयता है।
प्रेम ही कर्तव्यपरायणता है।।
प्रेम ही उत्तरदायित्व है।
प्रेम ही देवत्व है।।
प्रेम ही सौम्यता है।
प्रेम ही दिव्यता है।।
प्रेम ही प्रबंधन है।
प्रेम ही व्यवस्थापन है।।
प्रेम ही प्रशासन है।
प्रेम ही प्राण है।।
प्रेम ही परिणय है।
प्रेम ही विवाह है।।
प्रेम ही भर्तृत्व है।
प्रेम ही पितृत्व है।।
प्रेम ही मातृत्व है।
प्रेम ही भ्रातृत्व है।।
प्रेम ही पुत्रत्व है।
प्रेम ही पुत्रित्व है।।
प्रेम ही परिवारत्व है।
प्रेम ही एकत्व है।।
प्रेम ही पूज्यत्व है।
प्रेम ही अनुचरत्व है।।
प्रेम ही अनुयायित्व है।
प्रेम ही शिष्यत्व है।।
प्रेम ही शिक्षकत्व है।
प्रेम ही चिकित्सत्व है।।
प्रेम ही रक्षकत्व है।
प्रेम ही पालकत्व है।।
प्रेम ही सेवकत्व है।
प्रेम ही आदरत्व है।।
प्रेम ही अमरत्व है।
प्रेम ही नित्यत्व है।।
प्रेम ही तृप्ति है।
प्रेम ही शांति है।।
प्रेम ही संसर्ग है।
प्रेम ही संस्पर्श है।।
प्रेम ही संपर्क है।
प्रेम ही मधुपर्क है।।
प्रेम ही सम्मेल है।
प्रेम ही खेल है।।
प्रेम ही क्रीड़ा है।
प्रेम ही प्रेरणा है।।
प्रेम ही सद्गुण है।
प्रेम ही सहवास है।।
प्रेम ही सत्कर्म है।
प्रेम ही सद्धर्म है।।
प्रेम ही सुरक्षा है।
प्रेम ही सम्मान है।।
प्रेम ही सुख है।
प्रेम ही उत्थान है।।
प्रेम ही दिव्यधर्म है।
प्रेम ही क्षत्रियत्व है।।
प्रेम ही धीरता है।
प्रेम ही वीरता है।।
प्रेम ही प्रतियोगिता है।
प्रेम ही स्पर्धा है।।
प्रेम ही रति है।
प्रेम ही राग है।।
प्रेम ही काव्य का मर्म है।
प्रेम ही परिवार का धर्म है।।
प्रेम में ही मानव स्वतंत्र है।
प्रेमं शरणं गच्छामि ही प्रेम का मन्त्र है॥

✍️?? (राम गुप्ता, स्वतन्त्र पत्रकार, नोएडा)