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डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय की पाठशाला में जायसी का ‘पद्मावत’ : एक अनुशीलन

‘पद्मावत’ महाकाव्य भारतीय परिभाषा के अन्तर्गत नहीं आता। उसे एक बृहद् खण्ड काव्य कहा जा सकता है। ऐसा इसलिए कि उसमें कथा की धारा सर्गों में विभाजित न होकर, अविच्छिन्न रूप में प्रवहमान है, उसे चरित्र-प्रधान खण्ड काव्य भी नहीं कह सकते। पात्रों की रूपरेखाएँ विशेष स्पष्ट नहीं हैं। उसमें मात्र कथारस कवि का लक्ष्य है, यद्यपि सम्पूर्ण ग्रन्थ की कथा पर उसने बाद में ‘रूपक’ का आरोपण कर दिया है। यद्यपि उसे ‘रूपकात्मक कथाकाव्य’ कहा जा सकता है तथापि रूपक से पृथक् भी पद्मावत की कथा की स्वतन्त्र सत्ता बनी रहेगी।

‘पद्मावत’ की कथा मूलत: रत्नसेन और पद्मावती की प्रणयकथा है; परन्तु कथा के उत्तरार्द्ध में अल्लाउद्दीन का चित्तौड़-आक्रमण, उसकी पद्मिनी (पद्मावती) के प्रति आसक्ति तथा रत्नसेन के मृत्यूपरान्त पद्मावती के जौहर की गाथा दोहा-चौपाईबद्ध है।

मलिक मुहम्मद जायसी ने अपनी कथा को लोककण्ठ से ग्रहण किया है और जिसप्रकार उसे प्राप्त किया है, लगभग उसी प्रकार उसे काव्य का रूप दे दिया है। इससे कथा-सौष्ठव की रक्षा नहीं हो सकी है। वास्तव में, रत्नसेन-पद्मावती और पद्मावती-अल्लाउद्दीन की दो अलग-अलग कथाएँ एक ही कथासूत्र में गूँथ दी गयी हैं।

कथा में पारमार्थिक संकेत करने के लिए जायसी को विप्रलम्भ की अतीव तीव्र व्यंजना करनी पड़ी है। पद्मावत में स्थान-स्थान पर वैराग्यवर्द्धक उक्तियाँ मिलती हैं, जिनसे ‘शान्त रस’ का आभास होता है। वैसे रूपक के भीतर से भी शान्त रस की ही प्रतिष्ठा होती है।

जायसी में संयम नहीं दिखता। यही कारण है कि वे जिस विषय को उठाते हैं, उसका इतना सांगोपांग इतिवृत्तात्मक वर्णन करते हैं कि पाठक ऊब जाता है। हाटबाट, साधु-संन्यासी, पनिहारी, वेश्या, मालिन, गंधी-पण्डित, नाच-कूदवाले, चिरहटे, पाखण्डी, नट,चेटक, कलाविशारद, ठग, व्यापारी, हाथी-घोड़े; संक्षेप में, सारा संसार मानो ‘पद्मावत’ में प्रवेश कर गया हो।

वस्तुत: ‘पद्मावत’ कृति मध्ययुग की साधना समन्वय-प्रवृत्ति की महादेन है।

(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय,प्रयागराज; २० नवम्बर, २०१९ ईसवी)

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