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भारत हुए इन परिवर्तनों की वजह से सफल हो रहा क्वाड

शांतनु त्रिपाठी :

15 मार्च, नई दिल्ली। क्वाड्रीलेटरल सिक्योरिटी डायलॉग यानी क्वाड के राष्ट्राध्यक्षों का पहला वर्चुअल शिखर सम्मेलन 12 मार्च को संपन्न हुआ। इस दौरान भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, जापान के प्रधानमंत्री योशिहिदे सुगा, आस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री स्कॉट मारिसन और अमेरिका राष्ट्रपति जो बाइडन ने एक मेगा वैक्सीन ड्राइव शुरू करने का निर्णय लिया, जिसके तहत भारत में बड़ी मात्रा में कोरोना की वैक्सीन का उत्पादन किया जाएगा। इस वैक्सीन की सप्लाई हिंद-प्रशांत क्षेत्र में की जाएगी। बड़ी मात्रा में होने वाले इस वैक्सीन उत्पादन के लिए अमेरिका और जापान भारतीय कंपनियों को वित्तीय सहायता देंगे। जबकि इस कोशिश में आस्ट्रेलिया लॉजिस्टिकल सपोर्ट देगा। क्वाड के नेताओं की इस पहल को चीन की टीका कूटनीति के जवाब के तौर पर देखा जा रहा है और इसकी चर्चा दुनिया भर में हो रही है। यहां विचार करने वाली बात यह है कि ऐसा क्या हुआ कि 2004 से कल्पना के समुद्र में गोते लगा रहा यह चतुष्कोणी गठबंधन अचानक से बीते कुछ वर्षों में अपने पूर्ण स्वरूप को प्राप्त कर लेता है। गाहे-बगाहे इस गठबंधन को मजबूत करने की बात करने वाले जापान, अमेरिका और आस्ट्रेलिया खासे सक्रिय हो जाते हैं। इसको समझने के लिए हमें पिछले कुछ वर्षों में दुनिया और खासकर भारत में हुए परिवर्तनों पर नजर डालनी होगी, क्योंकि इतिहास के झरोखे से ही भविष्य की झलक मिलती है।

26 दिसंबर 2004 को हिंद महासागर में जोरदार सुनामी आई, जिसमें करीब 2,30,000 लोगों की मौत हो गई और लाखों लोग घायल हो गए। श्रीलंका के तत्कालीन राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे ने भारत से मानवीय सहायता की मदद मांगी। इसके साथ ही अमेरिका में भारतीय राजदूत रोनेन सेन से अमेरिकी सरकार पूछ रही थी, कि भारत इस सुनामी के बाद चीज़ों को संभालने में किस तरह और कितनी मदद कर सकता है, क्योंकि सुनामी ने दक्षिण-पूर्व एशिया को भारी नुकसान पहुंचाया था। राजपक्षे के कॉल के 12 घंटे के भीतर भारतीय नेवी के हेलिकॉप्टर्स राहत सामग्री के साथ श्रीलंका में थे। इसके बाद दो भारतीय नौसैनिक जहाज श्रीलंका के गाले, ट्रिनकोमाली पहुंचे और 3 माले पहुंचे। आईएनएस खुखरी और आईएनएस निरूपक को हॉस्पिटल में बदल दिया गया और करीब 24 घंटे में इंडोनेशिया भेजा गया। सुनामी का सबसे बुरा प्रभाव इंडोनेशिया पर पड़ा था। इस हालात का मुकाबला करने के लिए 32 भारतीय जहाज़ और करीब 5500 सैनिक शामिल थे। इसके बाद 29 दिसंबर 2004 को अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने घोषणा कि की भारत, जापान, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका मिलकर एक अंतर्राष्ट्रीय गठबंधन बनाएंगे। एक कोर ग्रुप जिसका उद्देश्य सुनामी में पानी में फंसे लोगों को बचाने, राहत पहुंचाने, बेघर लोगों के पुनर्वास, बिजली, कनेक्टिविटी और बंदरगाहों को बहाल करने के लिए काम करेगी। मिशन खत्म हुआ तो इस गठबंधन का एक नया ढांचा, क्वाड सामने आया, लेकिन इस रफ्तार काफी धीमी थी।

2007 आने तक चीन का प्रभाव बढ़ने लगा था और वह दुनिया के कारखाने के तौर पर स्थापित हो होने के साथ ही वैश्विक सप्लाई चेन की अपरिहार्य जरूरत बन गया था। जिसके बिना किसी भी देश के लिए सरवाइव कर पाना कठिन था। सही मायने में कहा जाए तो चीन उपभोक्तवादी संस्कृति का अफीम बन गया था। जिसकी जरूरत दुनिया के सभी देशों को थी। ऐसी स्थिति में चीन के खिलाफ संगठन बनाना अपने आप में बड़ी चुनौती थी। 2008 आते-आते ऑस्ट्रेलिया, चीन के दवाब में पीछे हटने लगा। वहीं अमेरिका को लगा कि चीन को नाराज करने से यूनाइटेड नेशंस में ईरान के खिलाफ प्रतिबंध लगाने और नार्थ कोरिया पर छह देशों के जारी वार्ता सहित कई बड़े रणनीतिक प्रयासों में दिक्कत आ सकती है। ऐसे में क्वाड को लेकर मामला ठंडे बस्ते में चला गया। साल 2017 तक यह स्थिति हो गई कि चीन के प्रभुत्व को कम करना क्वाड गठबंधन के लिए चुनौती बन गया। चीन की विस्तारवादी नीतियों के काट के लिए चारों देश फिर एक साथ आए। इस बार एजेंडा था कि हिंद-प्रशांत महासागर के रूट्स पर किसी भी देश के प्रभाव को मुक्त करना। इसके बाद से यह क्वाड देश लगातार बैठकें कर रहे हैं अब तक क्वाड देशों की 8 बैठकें हो चुकी हैं। क्वाड के लिए वर्ष 2020 सबसे अहम रहा, क्योंकि वैश्विक महामारी कोविड-19 के कारण दुनिया में कई परिवर्तन हुए। यह साल ऐसा रहा जिसमें भारत ने न सिर्फ को खुद को आत्मनिर्भर बनाने की ओर अग्रसित किया, बल्कि नए वैश्विक कारखाने के तौर पर दुनिया के सामने खुद को प्रस्तुत करने में सफल भी रहा। भारत यह करने में कैसे सफल रहा इसको हम कुछ उदाहरणों के जरिए समझ सकते हैं।

पहले उदाहरण के तौर पर हम भारत की पीपीई निर्माण को ले सकते हैं। कोरोना महामारी ने जब एक के बाद एक देशों को अपनी चपेट में लेना शुरू किया तो दुनिया के तमाम महामारी विशेषज्ञों ने यह भविष्यवाणी की कि भारत में स्थिति सबसे खराब होने वाली है। ऐसा होता भी, क्योंकि महामारी की शुरुआत में भारत में पीपीई किट निर्माण शून्य था। दुनिया के तमाम देश यहां तक की विकसित देश भी चीन से सुरक्षित पीपीई किट की आपूर्ति के लिए हाथ-पांव मार रहे थे। ऐसे में भारत ने बहुत कम समय में विश्व स्तरीय विनिर्माण क्षमता विकसित कर अपनी जरूरतों को पूरा किया, बल्कि पीपीई किट का निर्यात भी शुरू कर दिया। आज भारत की क्षमता एक दिन में लगभग दस लाख पीपीई किट उत्पादन की है। यही नहीं वेंटिलेटर, एचसीक्यू दवा और अन्य आवश्यक आपूर्ति के मामलों की स्थिति भी ऐसी ही है।

दूसरे उदाहरण के रूप में हम भारत की वैक्सीन उत्पादन क्षमता को देख सकते हैं। आज जब विकसित देश अपनी घरेलू आबादी के लिए सुरक्षित टीकों की खोज कर रहे हैं, तब भारत घरेलू स्तर पर निर्मित टीकों के माध्यम से दुनिया का सबसे बड़ा टीकाकरण अभियान चला रहा है। यही नहीं पड़ोसी और पार्टनर देशों के लिए वैक्सीन मैत्री अभियान चलाकर भारत ने उन्हें मुफ्त में टीकों की सप्लाई भी की है। इसके साथ ही कई जरूरतमंद देशों को भारत लाखों टीके निर्यात भी कर रहा है। कनाडा से पाकिस्तान और कैरेबियाई द्वीप से ब्राजील तक के देशों के लिए मेड इन इंडिया का टीका संजीवनी बनकर उभरा है। जिसका नतीजा रहा कि अमेरिका डेवलपमेंट फाइनेंस कोऑपरेशन के माध्यम से भारतीय दवा निर्माता बायलॉजिकल-ई को साल 2022 के आखिर तक एक अरब कोविड-19 टीकों का उत्पादन करने के लिए आर्थिक सहायता देने जा रहा है। इसकी घोषणा क्वाड सम्मेलन के बाद व्हाइट हाउस की तरफ से जारी एक दस्तावेज में की गई। तीसरे उदाहरण के तौर पर हम भारत की सीरिंज उत्पादन क्षमता को ले सकते हैं। जब न्यूयॉर्क टाइम्स ने अपनी रिपोर्ट में लिखा कि बिना सीरिंज के टीके बेकार हैं, तो दुनिया में हड़बड़ी मच गई। इस वैश्विक आपाधापी में एक बार फिर भारत और हिंदुस्तान सीरिंज एंड मेडिकल डिवाइसेस एवं अन्य मैन्युफैक्चरर्स उभरकर दुनिया के सामने आए। वर्तमान में हिंदुस्तान सीरिंज की विनिर्माण क्षमता एक मिनट में लगभग 6,000 सीरिंज है।

चौथा उदाहणर भारत का हाई-एंड मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर है, जिसका आज दुनिया लोहा मान रही है। इसमें सबसे महत्वपूर्ण भूमिका प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सरकार द्वारा शुरू की गई पीएलआई मैन्युफैक्चरिंग स्कीम ने निभाई है। जिसका नतीजा है कि चीन से अपना व्यवसाय समेट रही विश्व की शीर्ष कंपनियों ने भारत में निवेश की रुचि दिखाई है। यही नहीं 22 कंपनियों ने भारत में निवेश कर भी दिया है, जिसमें मोबाइल बनाने वाली कंपनी एपल और सैमसंग शामिल हैं। अगले पांच वर्षों में इस स्कीम के तहत भारत की मैन्युफैक्चरिंग क्षमता 150 बिलियन डालर तक पहुंच जाएगी, इससे हमारी निर्यात क्षमता में 100 बिलियन डॉलर की बढ़ोतरी होगी। पांचवें और अंतिम उदाहण भारत का चौथी पीढ़ी के फाइटर जेट कार्यक्रम की सफलता है, जिसने दुनिया का ध्यान भारत की ओर खींचा। इसमें भारतीय वायु सेना द्वारा 83 तेजस जेट निर्माण का आर्डर देना सबसे बड़ा कारक बनकर सामने आया है। बहुत कम देशों के पास ऐसे उच्च तकनीक वाले स्वदेशी लड़ाकू विमानों को बनाने की क्षमता है। यह सफलता भारत को एक वैश्विक विनिर्माण गंतव्य के रूप में उभारने में मील का पत्थर साबित होगी।

लेखक, स्वतन्त्र पत्रकार हैं

शान्तनु त्रिपाठी (स्वतंत्र पत्रकार)