डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय की पाठशाला – दो : आरम्भ-प्रारम्भ-समारम्भ

किसी भी कार्य की प्रथम अवस्था का अनुष्ठान अथवा सम्पादन ‘आरम्भ’ है। दूसरे शब्दों में— कोई भी कार्य जब पहली बार किया जाता है तब उसे ‘आरम्भ’ कहा जाता है।
अब ‘आरम्भ’ शब्द-संरचना पर हम विचार करते हैं। ‘आरम्भ’ शब्द में ‘आ’ उपसर्ग है, जिसका अर्थ है, ‘अभिविधि’, ‘पर्यन्त’, ‘अवधि’ आदिक। ‘रम्भ्’ शब्द का अर्थ ‘शब्द’, ‘नाद’ (ध्वनि) है। ‘आरम्भ’ शब्द में दो प्रत्यय : ‘घञ्’ और ‘मुम्’ लगे हुए हैं।

अधिकतर अध्यापक और विद्यार्थी ‘आरम्भ’, ‘प्रारम्भ’ तथा ‘समारम्भ’ में अन्तर समझ नहीं पाते हैं और अनुपयुक्त प्रयोग कर देते हैं। यहाँ इन तीनों शब्दों में मात्र उपसर्गों का खेल है। आरम्भ में ‘आ’, प्रारम्भ में ‘प्र’ तथा समारम्भ में ‘सं’ उपसर्ग लगे हैं। ‘आ’ का अर्थ ऊपर बता दिया गया है। ‘प्र’ का अर्थ ‘प्रकृष्ट’ है और ‘सं’ का अर्थ ‘सम्यक्’; अर्थात् प्रकृष्ट (शुद्धता और विधि-विधान के साथ) रूप में और सम्यक् (सुन्दरता के साथ, सम्यक् दृष्टि का परिचय देते हुए, देख-भालकर) रूप में किये गये कार्य क्रमशः ‘प्रारम्भ’ और ‘समारम्भ’ कहलाते हैं


  • (सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ; २३ फरवरी, २०१७ ईसवी)
url and counting visits