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उत्तरप्रदेश अब ‘बेलगाम प्रदेश’ हो चुका है; क्यों?

आचार्य पं॰ पृथ्वीनाथ पाण्डेय

‘मुक्त मीडिया’ का ‘आज’ का सम्पादकीय

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

समाजवादी पार्टी जब तक सत्ता में बनी रही तब तक उत्तरप्रदेश गर्दिश में रहा, तब तरह-तरह के अपराधों के सामने तत्कालीन सरकार करबद्ध मुद्रा में दिखती रही; क्योंकि निवर्तमान मुख्यमन्त्री के मन्त्री, उनकी पार्टी के सांसद, विधायक तथा छुटभय्ये नेता अपराधों को अंजाम देकर ‘खुले साँढ़’ की तरह से बेख़ौफ़ घूमा करते थे और सत्तामोह के चलते अखिलेश लाचार दिखते थे; ठीक वैसी ही स्थिति बहुमत के साथ सरकार का गठन करनेवाले योगी आदित्यनाथ की बन चुकी है। राज्य की जनता ने क्या सोचकर भारतीय जनता पार्टी को सत्ता सौंपी थी और उसे परिणाम में क्या-क्या देखने को मिल रहा है; ठीक उसी तरह, जिस तरह तब ‘साँपनाथ’ और अब ‘नागनाथ’। ‘भयमुक्त’ और ‘अपराधमुक्त’ राज्य बनाने की घोषणा करनेवाले मुख्यमन्त्री योगी आदित्यनाथ की इस दिशा में कहीं-कोई पहल नहीं दिख रही है?

अपराधियों के भय से यहाँ का नागरिक आक्रान्त है। आये-दिन दो साल की बच्चियों से लेकर अधेड़ महिलाओं के साथ “डंके की चोट पर” बलात्कार कर, उनकी हत्याएँ कर दी जा रही हैं और प्रतिक्रियास्वरूप ‘रिकॉर्डेड’ कथन प्रस्तुत कर दिया जाता है— अपराधी को उनके किये का कठोर दण्ड मिलेगा; या तो वे सुधर जायेंगे या फिर उत्तरप्रदेश से बाहर हो जायेंगे। निष्ठावान् अधिकारियों की हत्या कर, उसे ‘आत्महत्या’ का रूप दे दिया जा रहा है।

उक्त कथन करनेवालों के मुँह पर तमाचा तब पड़ता है, जब दूसरे दिन उससे भी अधिक भयावह घटना को सीना तानकर अंजाम देते हुए, अपराधी बाहर निकल आते हैं। हाल की कुछ घटनाएँ– कानपुर में दबंगई के साथ आठ पुलिसकर्मियों की हत्या, होलागढ़, इलाहाबाद में एक ही परिवार के चार सदस्यों की हत्या, मनियर (बलिया) की महिला अधिकारी की हत्या/आत्महत्या, अपहरण का प्रकरण और फ़िरौती का अनसुलझा रहस्य, जामो थाना, अमेठी के पुलिस की अपराधियों के साथ साँठ-गाँठ होने का कारण न्याय न मिलने के कारण मुख्यमन्त्री-कार्यालय के सामने माँ-बेटी को स्वयं जला लेना, देवरिया के ज़िला हस्पताल में रिश्वत न देने पर छ: साल का बालक ‘स्ट्रेचर’ पर लेटे हुए पिता का उपचार कराने के स्ट्रेचर को अपने मासूम हाथों से धक्का देना, आज ग़ाजियाबाद में सरे आम हत्या, रायबरेली के गदागंज थानान्तर्गत एक सेवानिवृत्त सैनिक को वहाँ के दबंग किस तरह से यातना दिये थे,– बताती हैं कि उत्तरप्रदेश की सरकार जनहित के प्रति संवेदनशील नहीं है।

ज्ञात तो यह भी हुआ है कि आतंकी विकास दुबे के साथ उत्तरप्रदेश के वर्तमान ग्यारह मन्त्रियों, भारतीय जनता पार्टी, समाजवादी पार्टी तथा बहुजन समाज पार्टी के विधायक, सांसदों आदिक तरह-तरह के राजनेताओं, की मलकिन पूर्व-मन्त्रियों ज़िलाधिकारियों तथा बड़े स्तर के पुलिस-अधिकारियों, विद्युत्-विभाग, नगरनिगम, आयकर-विभाग आदिक की विशालकाय मछलियाँ जुड़ी हुई थीं। इस सच को सामने क्यों नहीं लाया जा रहा है?

ईमानदार अधिकारी जब किसी अपराधी को पकड़ते हैं तब शासन की ओर से उनपर दबाव डलवाकर, उसे छुड़वा लिया जाता है और वह ईमानदार अधिकारी अपनी निष्ठा को कोसने लगता है। ऐसे में, कर्त्तव्यपरायण अधिकारियों का मनोबल कौन क्षीण कर रहा है? क्या आगे चलकर उस अधिकारी को भ्रष्ट बनने के लिए दुष्प्रेरित नहीं किया जा रहा है? इस प्रश्न पर अन्तत:, विचार करने का दायित्व किस पर है?

इस सन्दर्भ में गत वर्ष सहारनपुर में की गयी सामूहिक हत्या की ओर नज़रें दौड़ाना प्रासंगिक हो जाता है। वहाँ ‘बहुजन समाज पार्टी बनाम भारतीय जनता पार्टी के घृणित वर्चस्व’ का प्रदर्शन था। उस अमानवीय जातीय संघर्षण के लिए वे दोनों ही दल ज़िम्मादार थे; किन्तु गाज़ गिरा दी गयी, पुलिस और ज़िला-प्रशासन पर। गुनहगारों में भारतीय जनता पार्टी के तथाकथित नेताओं के नाम जब आये तब विरोधस्वरूप पुलिस-अधिकारी के आवास में दरिन्दे घुस आये और उनके बीवी-बच्चों के साथ बदसलूकी करने लगे। उस घटिया नेता के भड़काने पर पार्टी के लोग तोड़फोड़ कर, अपने ही सरकार को कठघरे में ला खड़ा किये थे; फलस्वरूप उस पुलिस-अधिकारी का तबादला कर दिया गया। उसके बाद सहारनपुर का रक्तरंजित उपद्रव थमा नहीं और एक-के-बाद-एक अधिकारियों का स्थानान्तरण होता रहा। वैसे आई०पी०एस० के स्थानान्तरण के मामले में उत्तरप्रदेश ‘अनोखा प्रदेश’ बन चुका है।

उत्तरप्रदेश के अपराधशास्त्र का अध्याय यहीं पर समाप्त नहीं होता है। रिश्वतख़ोरी, भ्रष्टाचार तथा अन्य अनियमितताओं पर कोई अंकुश नहीं दिख रहा है। आप किसी भी विभाग में पहुँच जाइए। भले ही आपका साफ़-सुथरा काम हो, फिर भी बिना चढ़ावा के आपकी फाइल आगे की ओर एक से०मीं० भी सरक नहीं सकती। यहाँ तक की ऋण लेने के मामले में अधिकतर बैंकों के मैनेजर अपना ‘कमीशन’ चाहते हैं। ग्रामीण इलाक़ों में तो और भी बुरी स्थिति है। तहसील, कचहरी, थाना— ये सब अपने-अपने तरीक़े से जनता को त्रस्त और पस्त करके रिश्वत वसूल कर ही लेते हैं।

अब ज़रा राज्य की जनता के लिए बनाये गये स्वास्थ्य-केन्द्रों और सरकारी हस्पतालों की कार्यप्रणाली को समझने का प्रयास करें। हस्पतालों में रोगियों के लिए नि:शुल्क दवाओं और जाँच की सुविधाएँ पाने के लिए डॉक्टरों के सामने गिड़गिड़ाना पड़ता है; कुछ को मिल पाती हैं; अधिकतर को अपने रुपये ख़र्च करने पड़ते हैं। डॉक्टर नियम को ठेंगा दिखाते हुए, साफ़ शब्दों में कह देता है— ये-ये दवाएँ यहाँ नहीं है; आपको बाहर से मँगानी पड़ेंगी। दरअस्ल, सरकारी हस्पतालों की दवाएँ, सुइयाँ, रुइ-पट्टी, प्लास्टर के सामान आदिक बाहर दुकानों में बेचवा दिये जाते हैं। यहाँ तक कि जाँच की मशीनें ख़राब करा दी जाती हैं। प्रत्येक डॉक्टर की पैथालॉजिकल क्लीनिकों में अपनी ‘सेटिंग’ रहती है, जो एक सादे काग़ज़ के टुकड़े पर जाँच कराने के लिए लिखकर उसी पैथालॉजिस्ट की क्लीनिक में भेजता है, जहाँ से उस डॉक्टर को हर माह कमीशन मिलता है। राज्य के प्रत्येक ज़िले में सरकारी डॉक्टर, कम्पाउण्डर, पैथोलॉजिस्ट, एम्बुलेंस आदिक ‘प्राइवेट’ हस्पतालों में “डंके की चोट पर” काम करते हैं। निजी हॉस्पिटलों के मालिकों और सरकारी एम्बुलेंस-चालकों के साथ अघोषित क़रार होता है, जो अवैध रूप में रोगियों और उनके परिवारवालों को सरकारी एम्बुलेंस में बैठाकर निजी हस्पतालों तक पहुँचाते हैं और जब गम्भीर रूप में बीमार व्यक्ति के स्वजन सरकारी हस्पतालों में अपने मरीज को ले जाने के लिए सरकारी एम्बुलेंस की माँग करते हैं तब उनसे बहाना बनाकर प्रकारान्तर से मना कर दिया जाता है। यही कारण है कि पिछले दिनों हमने ऐसे भी मंज़र देखे थे, जिसमें असहाय-निरुपाय व्यक्ति सरकारी एम्बुलेंस के अभाव में अपनी पत्नी का शव चादर में बाँधकर और साइकिल के पीछे फँसाकर लिये जा रहा था।

अब राज्य के ज़िलों में प्रशासन करनेवाले कमीश्नर, डी०एम०, ए०डी०एम०, एस०डी०एम० आदिक की कार्यशैली पर विचार करते हैं। उनमें से अधिकतर बेईमान और भ्रष्ट हैं। वे प्राय: निर्धारित समय पर अपने-अपने कार्यालय से ग़ायब रहते हैं। उन पर कहीं-कोई नियन्त्रण नहीं। उनके पास शिकायती पत्रों, अन्य काग़ज़ात आदिक का अवलोकन कर, समुचित दिशा-निर्देश, निर्णय करने का अवकाश नहीं है। ऐसी हज़ारों फाइलें अवलोकन किये जाने की प्रतीक्षा में वर्षों से कमीश्नरों, डी०एम० से लेकर नीचे के सभी अधिकारियों के कार्यालयों में धूल चाट रही हैं; परन्तु उन पर दृष्टि-अनुलेपन करने के लिए उन साहिबों के पास अवकाश तक नहीं है। ऐसे में, सहज ही प्रश्न उठता है— प्रतिदिन वे अधिकारी कौन-कौन-सा काम करते हैं?
उससे हम जब नीचे उतरते हैं तब हमें तहसीलों, कस्बों, विकास-खण्डों, ग्रामपंचायतों, ज़िला स्वास्थ्य-केन्द्रों आदिक में वहाँ की जनता का मानसिक और आर्थिक शोषण खुले आम किया जाता हुआ दिखता है। ऐसा वातावरण बना दिया जाता है कि अपने काम कराने के लिए आया हुआ व्यक्ति ‘चाण्डाल-चौकड़ी’ के जाल में फँसकर कसमसाने लगता है। ऐसे में, वह रिश्वत देकर गला छुड़ाने के लिए बाध्य हो जाता है।

थाना, चौकी, आई०जी०, डी०आई०जी०, एस०एस०पी० तथा एस०पी० कार्यालयों, थाना-कोतवाली, चौकी, यातायात-विभागों के सामान्य कर्मचारियों से लेकर उच्चपदस्थ अधिकारियों की कार्यशैली का निरीक्षण सन्दिग्ध दिखता है। उत्तरप्रदेश का एक सामान्य-सा पुलिस बन्दूक और सीटी लेकर आने-जानेवाले ट्रकचालकों से बेख़ौफ़ अवैध वसूली करता है; परन्तु उसके उस आपराधिक कृत्य को कोई नहीं देखना चाहता।

बिजली-विभाग— मीटर रीडर से लेकर प्रमुख अधिशासी अभियन्ता तक की दैनिक ‘कार्य रिपोर्ट’ बनायी जाये तो आय से अधिक सम्पत्ति का प्रकरण सामने आ जायेगा। एक मीटर रीडर अपने इलाक़े में प्रति घर से प्रतिमाह १०० से २०० रुपये लेता है और मनचाही बिजली-उपभोग करने के लिए ‘हरी झण्डी’ दिखा देता है। एक जे०ई० प्रतिमाह लाखों रुपये अवैध रूप में कमाता है। ऐसे में, मुख्य अधिशासी अभियन्ता की प्रतिदिन की कमाई कितनी होगी, समझा जा सकता है।
नगर निगम, नगर पालिका, नगर महापालिका, जलकर-विभाग के एक चपरासी से लेकर उच्चपदस्थ अधिकारियों के ‘गड़बड़झाले’ किसी से छुपे नहीं हैं। वे सब निरंकुश होकर सरकार की आँखों में धूल झोंक रहे हैं और सरकार आत्म मुग्ध होकर झोंकवा रही है।

सभी विकास प्राधिकरण के कर्मचारी, अधिकारी आदिक राज्य के नागरिकों को लूट रहे हैं और सरकारी ख़ज़ाने में सेंध लगा कर अकूत सम्पत्ति के स्वामी बने बैठे हैं।

अब आइए, राज्य की शिक्षा-व्यवस्था पर एक नज़र डालते हैं :–
उत्तरप्रदेश में इस समय १,३६६ प्राथमिक पाठशालाओं के भवन ऐसे हैं, जो जर्जर अवस्था में हैं। उन पाठशालाओं में पढ़ानेवाले अध्यापकों में से अधिकतर अध्यापक ऐसे हैं, जो विद्यार्थियों को अज्ञान का पाठ पढ़ा रहे हैं। हज़ारों पाठशालाओं में विद्यार्थियों को निश्शुल्क दी जानेवाली पुस्तकें अभी तक नहीं दी गयी हैं। नियमत: प्रत्येक विद्यार्थी को दी जानेवाली दो युनिफॉर्म में से, हज़ारों की संख्या में ऐसी पाठशालाएँ हैं, जहाँ के विद्यार्थियों को, अभी तक मात्र एक युनिफॉर्म दिया गया है; अर्थात् प्रशासन के लोग रुपये खा-पी-पचा गये।

शिक्षामित्र के नाम पर कितने योग्य लोग का चयन किया गया है? माध्यमिक, हाईस्कूल, इण्टर, स्नातक- परास्नातक स्तर पर शिक्षालयों, शिक्षार्थियों तथा शिक्षकों की गतिविधियों का निरीक्षण-परीक्षण कराने के लिए कोई भी व्यवस्था नहीं है। राज्य के विद्यालयों में ‘उत्तरप्रदेश माध्यमिक शिक्षा परिषद्’ (यू०पी० बोर्ड) द्वारा आयोजित हाईस्कूल और इण्टर मीडिएट परीक्षाओं के समय जिस तरह के बीभत्स, भ्रष्ट, निरंकुश तथा अवैध दृश्य हमने देखे थे, उनसे सुस्पष्ट हो चुका है कि ‘उत्तरप्रदेश माध्यमिक शिक्षा परिषद्’ के अधिकारियों की पारदर्शिता के साथ परीक्षाएँ करा लेने की बिलकुल सामर्थ्य नहीं है। महाविद्यालयों-विश्वविद्यालयों में प्राय: प्रत्येक विभाग में शिक्षकों का अभाव-ही-अभाव है, जिसके कारण अध्ययन-अध्यापन के नाम पर मात्र ‘खानापूर्ति’ करवा ली जाती है और सरकार भी इसे समझती है; परन्तु नयी नियुक्तियाँ करने से बिचकती आ रही है, जैसा कि पूर्व की सरकारों का आचरण रहा है। कुकुरमुत्तों की तरह से शिक्षा-क्षेत्र को बदनाम करनेवाले महाविद्यालय, प्राविधिक शिक्षण-संस्थान हज़ारों की संख्या में संचालित किये जा रहे हैं।

और अब, हम एक ऐसे सामाजिक अपराध की ओर अपनी दृष्टि निक्षेपित करेंगे, जिसके कारण एक समूची पीढ़ी बरबादी के कगार पर खड़ी हुई है। हमारा संकेत ‘सुरापान’ की ओर है। उत्तरप्रदेश में आये-दिन ज़ह्रीली शराब पीकर लोग मर रहे हैं। राज्य में किशोर और युवा-वर्गों में से एक बड़ी संख्या उनकी है, जो नशे के कुप्रभाव में बरबाद हो रहे हैं; परन्तु सरकार की इच्छाशक्ति शिथिल पड़ चुकी है। वह अपना ख़ज़ाना भरने की चाह में राज्य की शराबी जनता की ज़िन्दगी दाँव पर लगा चुकी है; साथ ही ‘और शराबी’ पैदा करने के लिए ‘सरकारी शराब’ की दुकानों को खुली छूट दे रखी है। धर्म-कर्म से सात्त्विक होने का दावा करनेवाला जो मुख्य मन्त्री अपने राज्य की जनता को तामसिक वृत्ति के गह्वर में धकेलने के लिए कृत-संकल्प हो तो उसका हेयात्मक पक्ष विचारणीय तो है ही; प्रथम दृष्ट्या आपराधिक भी है।
वास्तव में, जीवन के हर क्षेत्र में उत्तरप्रदेश का बुरी तरह से क्षरण हुआ है; परन्तु आश्चर्य है, ज़मीन पर कोई ठोस क़दम उठता हुआ नहीं दिख रहा है।

(सर्वाधिकार सुरक्षित— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २१ जुलाई, २०२० ईसवी)

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