‘डॉ पृथ्वीनाथ पाण्डेय की पाठशाला’ में ‘अरबी-फ़ारसी’ शब्दों का शुद्ध प्रयोग करना सीखें

आज हम लीक से हटकर उस मार्ग पर चलेंगे, जिस पर चलने का साहस हमारे ‘विद्वज्जन’ नहीं कर पाते हैं; और वह मार्ग है, ‘विलक्षण ज्ञानमार्ग’।

हम जब ‘अरबी-फ़ारसी’ भाषाओं पर दृष्टि निक्षेपित करते हैं तब हमें ज्ञात होता है कि ‘उर्दू’ कोई भाषा नहीं है। भाषा वह है, जिसकी अपनी ‘स्वतन्त्र लिपि’ और मूल भाषा भी हो। इस दृष्टि से उर्दू का वही स्थान है, जो ‘देवनागरी लिपि’ और ‘हिन्दीभाषा’ के अन्तर्गत ‘अवधी’, ‘ब्रज’, ‘भोजपुरी’, ‘बघेलखण्डी’, ‘बुन्देलखण्डी’ इत्यादिक का है। दूसरे शब्दों में— उर्दू एक बोली है।

यहाँ हम अरबी-भाषा के कुछ शब्दों पर विचार करते हैं :—-

ज़न— यह अरबी-भाषा का पुल्लिंग शब्द है और स्त्रीलिंग भी। अब आप सोच में पड़ गये– एक ही शब्द दोनों लिंगों से कैसे जुड़ा है? उत्तर सुस्पष्ट है। जब हम ‘ज़न’ का प्रयोग ‘पुल्लिंग’ में करेंगे तब उसका अर्थ ‘विचार, धारणा तथा ख़याल (यहाँ ‘ख़्याल’ का प्रयोग अशुद्ध है।) होगा और जब उसी ‘ज़न’ शब्द का प्रयोग ‘स्त्रीलिंग’ में करेंगे तब उसका अर्थ नारी, स्त्री, औरत होगा। जैसे ही हम ‘ज़न’ के ‘ज़’ से ‘नुक़्त:’/’नुक्ता’ हटाते हैं वैसे ही वह शब्द ‘जन’ के रूप में ‘संस्कृत-भाषा’ का पुल्लिंग, बहुवचन शब्द बन जाता है, जिसका अर्थ ‘लोग’ के रूप में प्रत्यक्ष होता है।
यहाँ हम अरबी-भाषा स्त्रीलिंग-शब्द ‘ज़न’ पर विचार करते हैं।

‘ज़न’ एकवचन का शब्द है, जिसका बहुवचन ‘ज़नान’ नहीं, ‘ज़नाँ’ है। स्त्री के लिए ‘ज़न’ और स्त्रियों के लिए ‘ज़नाँ’ का प्रयोग होता है। हमारे विद्वज्जन ज़नाना का अर्थ ‘स्त्री’ और ‘स्त्रियों का’ बताते हैं, जो कि ग़लत है। पहली बात, ‘जनाना’ कोई सार्थक शब्द नहीं है; दूसरी बात, शुद्ध शब्द है, ‘ज़नान:’, जो कि ‘ज़नाना’ के नाम से समाज में प्रचलित है तथा तीसरी बात, ‘ज़नान:’ (ज़नाना) का अर्थ है, ‘स्त्रियों-जैसे स्वभाववाला पुरुष’; अर्थात् क्लीव (हिजड़ा)।

अब एक अन्य शब्द को समझते हैं :—
ख़यालयह अरबी-भाषा का शब्द है। इस शब्द का अर्थ है, कल्पना, विचार, ध्यान, तख़ैयुल। हमारे विद्वज्जन ‘ख़याल’ के स्थान पर ‘ख़्याल’/’ख्याल’ का प्रयोग करते-कराते आ रहे हैं, जो कि ग़लत है। ‘ख्याल’ का प्रयोग ‘विशेष गान-पद्धति’ के अर्थ में किया जाता है। इस शब्द का प्रयोग ‘मज़ाक़’ के अर्थ में भी होता है।
उक्त ख़याल शब्द का बहुवचन ‘ख़यालात’ है। यहाँ भी ‘ख़्यालात’ का प्रयोग अशुद्ध है। ‘ख़्यालात’/’ख्यालात’ शब्द होता ही नहीं है।

साहिब-साहिबानयह अरबी-भाषा का पुल्लिंग शब्द है। शुद्ध शब्द ‘साहिब’ है, न कि ‘साहब’। साहिब का बहुवचन ‘साहिबान’ है।

जज़्ब:/जज़्बा— यह अरबी-भाषा का एकवचन का शब्द है। इसका बहुवचन ‘जज़्बे’/ ‘जज़्बात’ होता है; परन्तु हमारे विद्वज्जन प्राय: ‘जज़्बातें, जज़्बातों’ का प्रयोग करते हैं, जो कि अशुद्ध प्रयोग है। ऐसा इसलिए कि बहुवचन का पुन: ‘बहुवचन’ नहीं बनता।

शुद्ध शब्द ‘मुसल्मान’ और ‘मुस्लिम’ है। मुस्लिम शब्द का अर्थ है, ‘मुसल्मान पुरुष’। मुसल्मान स्त्री के लिए ‘मुस्लिम:’/’मुस्लिमा’ शब्द का प्रयोग होता है। इस प्रकार मुस्लिम (पुल्लिंग, एकवचन) का बहुवचन ‘मुस्लिमीन’ है और मुस्लिम:/मुस्लिमा (स्त्रीलिंग, एकवचन) का बहुवचन ‘मुस्लिमात’ है।

वारिदात— यह अरबी-भाषा, स्त्रीलिंग का एकवचन-शब्द है। हमारे समस्त विद्वज्जन इस शब्द के स्थान पर ‘वारदात’ शब्द का प्रयोग करते-कराते आ रहे हैं, जो कि अशुद्ध प्रयोग है। ‘वारिदात’ शब्द ही शुद्ध है, जिसका प्रयोग ‘घटना’, ‘वाक़िया’ (वाकया/वाक्या) का प्रयोग ग़लत है।) के अर्थ में किया जाता है।

जवाहिरातहमारे जानकारशास्त्रीगण ‘जवाहरात’ शब्द का प्रयोग करते-कराते हैं, जो कि ग़लत है; सही शब्द ‘जवाहिर'(अरबी-भाषा) है, जो ‘जौहर’ का बहुवचन है। इसका अर्थ है, ‘रत्नसमूह’। इसी से ‘जवाहिरात’ शब्द प्रचलित हुआ है, न कि ‘जवाहरात’ शब्द। शुद्धता की दृष्टि से जवाहिरात का भी प्रयोग ग़लत है; क्योंकि किसी भी बहुवचन शब्द का पुन: ‘बहुवचन’ नहीं बनता।

(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, इलाहाबाद; १९ जून, २०१८ ई०)

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