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डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय की पाठशाला में ‘विराम चिह्नों का प्रयोग’

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
(प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक)

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय-


वाक्य में स्पष्टता लाने के लिए, अर्थात् भाव का अर्थ प्रकट करने के लिए विराम चिह्नों का प्रयोग अनिवार्य माना गया है। किसी भी विराम चिह्न की स्वतन्त्र सत्ता नहीं होती।
नीचे दिये गये कुछ उदाहरणों को देखा-समझा-परखा जा सकता है :—–
१- रोको मत जाने दो।
२- रोको मत, जाने दो।
३- रोको, मत जाने दो।
पहला वाक्य ‘अस्पष्ट’ वाक्य है। दूसरे शब्दों में– यह अनुशासनविहीन वाक्य है।
दूसरा ‘स्पष्ट’ वाक्य है।
तीसरा ‘स्पष्ट’ वाक्य है।
ज्ञातव्य है कि दूसरे-तीसरे वाक्यों में शब्द एक ही है परन्तु विराम चिह्न के अलग-अलग शब्दों में लगने के कारण वाक्य का अर्थ-परिवर्त्तन हो जाता है। ये दोनों ही वाक्य ‘अर्थ-परिवर्त्तित’ वाक्य भी कहलाते हैं।
अब इन वाक्यों को देखें :—
१- मलखानसिंह तोमर गये।
२- मलखानसिंह तो, मर गये।
अब इन वाक्यों को भी देखें :—-
१- रिश्वत लेना, देना मना है।
२- रिश्वत लेना-देना मना है।
पहले वाक्य में रिश्वत ‘लेने’ किन्तु ‘न देने’ की बात कही गयी है।
दूसरे वाक्य में रिश्वत ‘लेने और देने’की बात कही गयी है।

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