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उत्तरप्रदेश के मुख्यमन्त्री ‘आदित्यनाथ योगी’ के नाम ‘आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय’ का मुक्त पत्र

महोदय!

उत्तरप्रदेश राज्य में जी रहे जनसामान्य का जीवन आज जितना आतंकपूर्ण है, उतना कभी नहीं रहा, यद्यपि उत्तरप्रदेश में जिस तिथि से समाजवादी और बहुजन समाज पार्टी की सरकारें गठित हुई थीं, तभी से जातिवादी विचार और व्यवहारधारा, भ्रष्टाचार तथा तरह-तरह के आपराधिक कृत्य सुस्पष्ट लक्षित होते रहे। आप को उत्तरप्रदेश की जनता ने इसलिए चुना कि आप एक योगी हैं और योगी विरागी और मोहमाया से सुदूर रहता है, जिस तरह से महाराजा भर्त्तृहरि ने वीतरागी रहकर प्रजा का संरक्षण करते हुए अपनी शासनपद्धति को उत्कर्ष पर पहुँचाया था। हमें भी आपसे वैसी ही आशा थी; किन्तु जिस भाँति आपके राज्य की सरकार अकल्पनीय-अप्रत्याशित निर्णय कर राज्य के नागरिकों को हतप्रभ और भयभीत करती आ रही है, वह किसी भी शासन की दीर्घायु पर प्रश्नचिह्न लगा देती है। आपने शासन में आने से पूर्व चुनावी सभा में जो-जो भरोसा दिलाये थे, वे आपके सत्तासीन होते ही कर्पूर की टिकिया की भाँति उड़ चुके हैं।

कहाँ है, आपकी समदर्शिता? कहाँ है, एक योगी-जैसा चरित्र, जो सर्वकल्याण का शंखनाद करता है। भूलिए मत, अहम्मन्यता का भाव-विचार ‘सर्वनाश’ की ओर ले जाता है। ‘नाथ-सम्प्रदाय’ के मूलभूत सिद्धान्त ‘प्रेय-श्रेय’, ‘योग-क्षेम’ वहन करने के प्रति आग्रहवान रहा है, जबकि आपका सिद्धान्त और आचरण “एकोहम् द्वितीयो नास्ति” का रहा है। आपमें योगी-तत्त्व कितना है, यह अज्ञात है; परन्तु यह अवश्य ज्ञात है कि आपका शासन अत्याचारियों को प्रश्रय देता आ रहा है।

उत्तरप्रदेश राज्य वर्तमान में अपराध का गढ़ बन चुका है। एक भी नागरिक, चाहे वह किसी भी स्तर का हो, कहीं से भी सुरक्षित नहीं है। राज्य में हमारे जिन शिक्षित विद्यार्थियों को विनियोजित किया जाना चाहिए और नैतिक और न्यायिक आधार पर जिनका अधिकार रहा है, उन्हें वर्षों से उनके अधिकार से वंचित रखा जा रहा है; एक बच्ची से लेकर वयोवृद्धा तक असुरक्षित हैं; शीलहरण और हत्या तो सामान्य घटना बन चुकी है, इसे राज्य के नागरिकों ने भली-भाँति देख लिया है और यह भी अनुभव कर लिया है कि आपके दल के साथ सम्बद्ध राजनेताओं के व्याभिचारिक और जघन्य कर्मों के सप्रमाण सार्वजनिक होने पर भी आप-द्वारा संचालित शासन की ओर से किस प्रकार से उनका संरक्षण किया जाता रहा है।

बिना आरोप के आपकी पुलिस किसी को भी उसके घर जाकर बिना कारण बताये अज्ञात ग़ैर-ज़मानती अपराध के अन्तर्गत बन्दी बना सकती है। आपकी यह चिन्तनधारा औचित्यपूर्ण न्यायिक प्रणाली के अन्तर्गत तर्कसंगत है क्या? आप उत्तरप्रदेश के ‘सरकार’ हैं तो इसका यह अर्थ नहीं कि आप जनता-द्वारा चयनित लोकतन्त्रीय प्रणाली में ‘अधिनायक’ (तानाशाह) का चरित्र प्रदर्शित कर सकते हैं।

निस्सन्देह, आप शाब्दिक योगी हैं, कार्मिक नहीं, अन्यथा समदर्शी होते। मुख्यमन्त्री किसी राज्य का ‘संरक्षक’ होता है, ‘विध्वंसक’ नहीं। बलप्रयोग कर शासन करनेवाला अल्पजीवी होता है; उसका पापकर्म उसपर प्रत्येक क्षण प्रभावी रहता है।

अयोध्या में लाखों-करोड़ों दीपक जलाकर निरर्थक हिन्दुत्व का पोषण करने के लिए दीपक, बाती, तैलादिक के लिए करोड़ों रुपये की धनराशि कहाँ से आपके पास आयी थी, इस पर विचार किया है? आपके शासनकाल में भौतिकता का प्रश्रय देने के लिए हमारे राज्य के लाखों वृक्ष काट डाले गये और आप मौन बने रहे!..? आप हिन्दुत्व के कैसे पोषक हैं, जो आदिकाल से ‘वृक्षदेव’-उपासना की अवधारणा को खण्डित करते हुए, वृक्ष पर वास करनेवाले देवधाम को भी उजड़वा दिया है?

अतिवाद के दीये की ज्योति दीर्घकालिक नहीं होती; भभक कर निष्प्रभ हो जाती है।

राज्य में बड़ी संख्या में समस्याएँ हैं, जिनके निराकरण की ओर से आपका शासन-प्रशासन उदासीन है। राज्यपाल, मुख्यमन्त्री, विधायकों, मन्त्रियों, महापौरों, प्रशासकीय अधिकारियों आदिक को वेतन-भत्ते के अतिरिक्त जो अन्य सुविधाएँ दी जा रही हैं, उन्हें घटाने के लिए शासन के संचालक क्यों नहीं विचार कर रहे हैं? उत्तरप्रदेश हिन्दी संस्थान, संस्कृत संस्थानम्, भाषा संस्थान, उर्दू संस्थान आदिक में जो प्रतिवर्ष करोड़ों रुपये के पुरस्कार “मैं तेरा-तू मेरा” के आधार पर बाँट दिये जाते हैं, उन्हें क्यों नहीं समाप्त किये जाते? वहाँ से जो सेवानिवृत्त हो चुके हैं, उन्हें वहाँ पर उनका सेवाविस्तार कर क्यों रखा गया है? उनके स्थान पर हमारे शिक्षित-सुशिक्षित विद्यार्थियों की नियुक्ति करने की दिशा में आपकी सरकार मौन क्यों बनी हुई है? उन संस्थानों में अयोग्य कर्मचारी कार्यरत हैं, उन्हें क्यों नहीं पदमुक्त किया जाता?

आक्रोशित मन की बातें बहुत हैं; फिर कभी लिखूँगा।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १६ अक्तूबर, २०२० ईसवी।)

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