सफ़र में ज़िंदगी और ज़िंदगी का सफ़र

सौन्दर्या नसीम-


देहरादून से मसूरी। एक सफ़र और। छोटा-सा। जो भी हो, सफ़र तो सफ़र! सफ़र में ज़िंदगी और ज़िंदगी का सफ़र। जैसे सफ़र ही हो गई हो मुकम्मल ज़िंदगी। काफ़ी नोक-झोंक के बाद तय हुआ कि आज ड्राइव अम्मी करेंगी और मैं रास्ते भर जो ख़याल आएँगे, लिखूँगी। मैंने वादा लिया कि कितनी भी धीमी चलो, घंटे भर से ज़्यादा नहीं लगना चाहिए। ऐसे ही मौक़ों पर अम्मी के चेहरे पर मुस्कुराहटों की बारिशें होती हैं।

जब से मसूरी से देहरादून आना हुआ है, तब से दुबारा हम वहाँ नहीं गए। अरसे बाद एक बार फिर उन गलियों से होकर गुज़रने की तमन्ना जाग उठी है। रस्किन बांड अंकल से मुलाक़ात की आरज़ू भी है। माज़ी भी क्या चीज़ है! आप लाख न चाहें, पर कभी भी ज़ेहन के किसी दरीचे पर आहिस्ता-से दस्तक देता है और जाने कितनी पहचानों की शक्ल ले बग़लगीर हो जाता है। ख़ैर…

गुज़रती हुई पहाड़ियाँ। तेज़ी से पीछे भागते-से दरख़्त। परिंदे कुछ वक़्त पीछा-से करते लगते हैं, पर जैसे थककर पीछे छूट जाते हैं। फूलों की वादियाँ। आम लदी डालियाँ। बेशुमार इनसानी निशानियाँ। राजपुर रोड के इर्दगिर्द हर्रावाला, चौक टॉवर, वज़ीरे आला का दफ़्तरे मोअत्मिदी, राज प्लाज़ा, दिलाराम बाज़ार, वर्ल्ड इंटीग्रिटी सेंटर, कई सारे शिव मंदिर, शिवालिक प्वॉइंट, फुट हिल्स गार्डन—और फिर, लाइब्रेरी रोड से आगे कोर्ट रोड। पलक झपकते सब ओझल! क्या सचमुच पीछे छूट जाते हैं वे, या सफ़री ज़ेह्नीयत की गिरफ़्त में फँसे हम ही आगे बढ़ जाने का गुमान पाले कहीं बहुत पीछे रह जाते हैं? तेज़ रफ़्तार गाड़ियों में बैठकर कहीं-से-कहीं पहुँच जाना सचमुच आगे बढ़ जाना है या ज़िंदगी की कई सारी चीज़ों से पीछे रह जाना?

मालूम नहीं इस कायनात का सच क्या है! हम कहाँ हैं, हमारे होने का सबब कहाँ इंतज़ार कर रहा है हमारा, कौन बता पाया है आज तक? कुछ समझने के सफ़र पर, तो कुछ समझाने के सफ़र पर। दानिस्तगी का सफ़र कहाँ थमने का नाम लेता है? आप जितनी चीज़ों से पार पाने का जतन करते हैं, दानिशमंदी के बरअक्स कहीं ज़्यादा शक्लें दावते-मुक़ाबला लिए खड़ी दिखाई देती हैं। साँसों की डोर थमने तक मालूम नहीं कौन किस सफ़र को कितना तय कर पाया? एक क़ौम का सफ़र कयामत तक जन्नत और जहन्नुम के इंतज़ार में। दावरे मशहर के रूबरू हाथ बाँधे एक नए ख़ुशनुमा सफ़र की मिन्नतें लिए। दूसरी क़ौम का सफ़र इंतकाल के बाद स्वर्ग या नर्क की क़िस्मत तय करते यमराज के द्वार तक।

सवालों का क्या, दिमाग़ के दरवाज़े बंद न हों तो वे ज़ेहन में नुमायाँ होते ही हैं। खुला आसमान हो या धरती का कोई कोना, निगाह जहाँ तक जाती है, लगता तो है कि हमारा होना बेमक़सद नहीं, लेकिन क्या मौत के बाद कोई और ज़िंदगी शक्ल लेती है? कोई और सफ़र शुरू होता है या कहीं कुछ नहीं, एकदम सन्नाटा!! सन्नाटे के भी क्या मायने, अगर कोई महसूस करने वाला न हो! बुतपरस्त कुछ दावा करते हैं और बुतशिकन कुछ और, हालाँकि कोई महीन-सी डोर सबके ही आरपार जाती-सी लगती है। आस्तिक के बयान पर मुतमइन हुआ जाए या विज्ञान की बिना पर अपने सच होने का दम भरते नास्तिक की दानिशमंदी पर। विज्ञान भी क्या वही है, जिसकी माहिती साइंसदान बाँटते फिरते हैं या इस विज्ञान के पार भी किसी और विज्ञान का कोई अजूबा-सा सफ़र शुरू हो जाता है। एलियन की तलाश का सफ़र जारी है। अभी हम उनकी दुनिया की मनमर्ज़ी शक्लें गढ़ते हैं, हो-न-हो किसी दिन वह सच भी नुमूदार हो जाए कि हमारी धरती का विज्ञान शीर्षासन करता नज़र आए। वाज़-ए-वाइज़ की तल्क़ीनी मशक़्क़तें दीबाचा के आगे कहाँ बढ़ पाती हैं! ख़याली बज़्म की तमाम आराइशें, ज़ीनते बज़्म के इंतज़ामात इनसानी सुकून के किसी सफ़र को मनमुआफ़िक़ अंजाम तक कहाँ ले जा पाते हैं! रंज पैहम आहोज़ारी कब रुक सके हैं!

ज़िंदगियाँ क्या वहीं हैं, जो हम अपने इर्दगिर्द देखते हैं या इससे ज़्यादा चेहरे कायनात की परदेदारी के पाबंद हैं? क्या ऐसा नहीं लगता कि पूरी कायनात ही मुसलसल सफ़र पर है! सूरज, चाँद, सितारे सचमुच बेजान हैं या किसी मंज़िल की तलाश में भटक रहे हैं हमारी तरह। जिनकी कोई शक्ल नहीं, वे भी किसी-न-किसी सफ़र पर। हवाएँ जैसे रोज़ पास से गुज़रती हैं और किसी नए सफ़र की कोई दास्तान सुना जाती हैं। ख़यालों, जज़्बातों का सफ़र तो चौबीसों घंटे ही। नींद के आग़ोश में भी उनका सफ़र कहाँ थमता है! ख़्वाबों की शक्ल ले नुमूदार हो उठते हैं।

अफ़ग़ानिस्तान से हिंदुस्तान तक के सफ़र में जाने कितने क़िस्से कानों के रास्ते ज़ेहन में समाते चले गए हैं। अम्मी की इस्लाम की तालीम और अब्बू की ज़ुबान से रामायण-महाभारत के जाने कितने बयान। ऐसे वालिदैन सबको मिलें, जो मज़हबी हों तो भी मोहब्बत के, इनसानियत के सफ़र पर अपनी संतानों को ले चलें।

अम्मी कर्बला की शहादत सुनाते हुए अक्सर जज़्बाती हो जाती हैं। एक सफ़र वह भी था क़ौम की इज़्ज़त के लिए। तवारीख़ी माहिर इसे जंग का नाम देते हैं, पर कैसी जंग? एक तरफ़ यज़ीद की बड़ी-सी फ़ौज और दूसरी तरफ़ हज़रत मुहम्मद के सबसे छोटे नवासे इमाम हुसैन के क़ाफ़िले के महज़ 72 लोग। जिस यज़ीद के प्यासे लोगों को चंद रोज़ पहले हुसैन ने इनसानियत की नज़ीर पेश करते हुए पानी पिलाया, उसी बर्बर, बदचलन यज़ीद ने इक़्तिदार की भूख में नहर पर क़ब्ज़ा जमा लिया और हुसैन के क़ाफ़िले को घेर कर उसे दो बूँद पानी से भी महरूम कर दिया। सुलूके बद की हद देखिए! बेरहमी से पूरा क़ाफ़िला क़त्ल कर दिया गया, हालाँकि जंग न चाहते हुए भी इमाम के चाहने वाले बारी-बारी से आगे आए और बहादुरी से लड़कर शहीद हुए। नन्हे बच्चों तक को नहीं बख़्शा यज़ीद ने। 10 मोहर्रम को हुसैन के एक बेटे जैनुलआबदीन बुरी तरह बीमार थे, पर हुसैन दोपहर की नमाज़ के बाद यज़ीद की फ़ौज के आगे गए और शहादत दी। इमाम हुसैन के परिवार की औरतों को गिरफ़्तार कर लिया गया और उन पर बेइंतिहा जुल्म ढाए गए। बीमारी के चलते जैनुलआबदीन बच गए, वरना मुहम्मद साहब की पीढ़ी भी आगे न चलती।

ज़िंदगी कहाँ से कहाँ ले जाती है! कोई इनसानियत के सफ़र पर तो कोई हैवानियत के। यह भी अजब है कि इमाम हुसैन को हिंदुस्तान से बेपनाह मुहब्बत थी। एक जनाब सैयद इब्न हुसैन नक़वी जी ने रिसर्च करके लिखा है—‘‘हज़रत इमाम हुसैन दुनियाए इनसानियत में मुहसिने आज़म हैं। उन्होंने तेरह सौ साल पहले अपनी ख़ुश्क ज़ुबान से, जो तीन रोज़ से बग़ैर पानी के तड़प रही थी, अपने पुर नूर दहान से इब्ने साद से कहा था–अगर तू मेरे दीगर शरायत को तस्लीम न करे तो, कम-अज़-कम मुझे इस बात की इजाज़त दे दे कि मैं ईराक़ छोड़कर हिंदुस्तान चला जाऊँ।’’ ग़ौर करने की बात यह है कि इमाम हुसैन को हिंदुस्तान की हवाओं में मुहब्बत की कौन-सी ख़ुशबू महसूस हुई थी कि उन्होंने किसी और मुल्क के बजाय ख़ुसूसीयात से हिंदुस्तान का नाम लिया था!

काश, इमाम हुसैन उस सफ़र पर निकल पड़ते और ईतान-ए-हिंदुस्तान हुआ होता तो शायद इस्लाम की जो धारा यहाँ से निकलती, वह दहशतगर्दी की नहीं, दुनिया में मोहब्बत का दर्या बहा रही होती।

अब्बू हम दोनों बहनों को हिंदुस्तान के क़िस्से अक्सर सुनाया करते थे। एक दफ़ा बुख़ार से तपते मेरे माथे पर ठंडे पानी की पट्टियाँ बदलते-बदलते महाभारत का एक क़िस्सा सुनाया था। हिंदुस्तान आने के बाद वह क़िस्सा किसी रिसाले में दिख गया तो ज़ेहन के परदे पर बार-बार अब भी आ ही जाता है। शहंशाह युधिष्ठिर की हुकूमत थी। एक किसान ने अरसे से पड़ी अपनी ज़मीन दूसरे किसान को बेच दी। दूसरे किसान ने पहली दफ़ा उस पर हल चलाया। कुछ देर बाद कोई चीज़ हल के फाल से टकराई। किसान ने उसे बाहर निकाला तो बंद मुँह के एक बरतन में बेशक़ीमती सोने के ज़ेवरात (या सिक्के) निकले। किसान ने खेत जोतना बंद कर दिया और ज़ेवरात लेकर पहले वाले किसान के घर पहुँचा। उसने कहा—‘‘जनाब यह आपकी अमानत है, इसे आप सँभालें।’ पहला वाला किसान बोला—‘‘भाई, मैंने तो ज़मीन बेच दी, अब उसमें से जो भी निकले, उस पर आपका हक़ है।’’ दूसरे किसान ने जिरह की कि मैंने तो सिर्फ़ ज़मीन ख़रीदी थी, इसलिए ज़ेवरात पर तो आपका ही हक़ बनता है। मुआमला नहीं सुलटा तो दोनों शहंशाह युधिष्ठिर के दरबार में पहुँचे और बोले कि जहाँपनाह, हम इसे अपने पास नहीं रख सकते, पाप का काम होगा, इसे बराहे नवाज़िश आप सरकारी ख़ज़ाने के हवाले करें। मुश्किल यह पैदा हुई कि ईमानदारी के मजस्समे युधिष्ठिर को भी इस तरह की दौलत को क़बूल करना जायज़ नहीं लगा। पहले उन्होंने कोशिश की कि दोनों किसानों में इसे बाँट दिया जाय, पर वे किसी क़ीमत पर तैयार न हुए तो आख़िर में फ़ैसला लिया गया कि इस दौलत को किसी ग़रीब लड़की की शादी में ख़र्च कर दिया जाय ताकि उसका घर बस सके। काश, दुनिया ऐसी ही हो!

हिंदुस्तान के ऐसे तमाम क़िस्से मैंने सुने हैं कि पहले के ज़माने में चलती राह में किसी को कोई क़ीमती चीज़ मिल जाए तो वह उसे हाथ नहीं लगाता था और जिसका सामान खोया हो, वह उस रास्ते पर ढूँढ़ते हुए वापस गुज़रे तो उसे अपना सामान मिल भी जाता था। यह तहज़ीबों का सफ़र, सभ्यताओं का सफ़र है। हम कहाँ से चले थे और कहाँ आ गए हैं अब!

अम्मी ने गाड़ी रोक दी। हम मसूरी के स्टैंड पर थे। कविता की दो शक्लें और कुछ फुटकर मज़्मून लैपटाप की स्क्रीन पर नुमूदार थे। घड़ी पर निगाह गई तो अम्मी को घूरा—यह क्या, पूरे दो घंटे!! अम्मी हँस पड़ीं—‘‘बेवकूफ़ लड़की, अगर मैं दो घंटे न लगाती तो तू कुछ भी न लिख पाती। आँखों से आसमान में उड़ते परिंदे निहारोगी और उँगलियाँ लैपटाप के कीबोर्ड पर। एक साथ कई-कई काम मत किया कर!’’ इस तरह आपस में तू-तू, मैं-मैं करते हुए हम पहाड़ों की मलिका की उन गलियों में दाख़िल हो गए, जहाँ से म्युनिसिपल गार्डन, लंढोर बाज़ार, गन हिल, कैंपटी फॉल, संतरा देवी मंदिर, मसूरी झील, लेक मिस्ट, धनोल्टी, झड़ीपानी फॉल जैसी जगहों के लिए एक सफ़र और शुरू होना था। कुछ उन जगहों का भी, जहाँ से नीचे की तरफ़ नज़रे इनायत कीजिए तो मौत मुस्कुराती हुई नज़र आती है और किसी को नहीं पता होता कि इसके बाद कौन-सा नया सफ़र शुरू होगा, जिसकी कि हमसफ़र होगी सिर्फ़ मौत!!!

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