संजय सिंह, सांसद, आप ने पेयजल एवं स्वच्छता मिशन पर उठाए सवाल! | IV24 News | Lucknow

ताकि गांव जिंदा रहें !

नरेन्द्र शुक्ल (शोध प्रमुख : नेहरू मेमोरियल म्यूज़ियम एण्ड लाइब्रेरी, दिल्ली)-

  • शहर, जिसने खराब समय में उन्हें बोझ की तरह फटक दिया था, अपने जबड़े साफ कर फिर आमंत्रित करेगा।
  • वो आएंगे, वो आने के लिए अभिशप्त हैं।
  • गांव और कस्बे मिलें और सोचें अपना भविष्य।
  • मनरेगा और अन्य सस्ती खैरातों से पीछा छुड़ाने की जुगत सोचें।

गाँव जाने वाले केवल वही नहीं हैं जिन्हें हम कुछ दिन से सड़कों पर देख रहे हैं। जरा अपने मन को टटोलिये। हर किसी के मन मे, जिसके जिसके पास अब भी अपना गांव है उनका मन नहीं हुआ था कि विपात्ति के समय गांव चले जाँय। और विश्वास कीजिए जो जो मौके का लाभ उठा सका, विशेषकर वो जिसके पास अपना साधन था, पहली फुरसत में सब गांव निकल गए। कुछ देर हो जाने के कारण नहीं जा पाए, और कुछ यह सोचकर नहीं गए कि यहां कुछ हुआ तो अस्पताल है बच जाएंगे। वहां तो और बुरी हालत होगी। बहरहाल उन सबके मन मे गांव पहुंचने की हूक जरूर थी। कारण की गांव है ही ऐसी जगह। मां के आंचल की तरह। हर विपात्ति में वह अपनी छांव में बुलाती है, आराम देती है। तो आँचल तो आँचल है, जैसे खाये अघायों का वैसे ही उन गरीबों का, जिनके पास आज कुछ नहीं है। ऐसे में मां के पास न जायँ तो कहां जायँ। आखिर न उनके पास गाड़ी है न बंगला है न बैंक बैलेंस। और रोक कौन रहा है? जिसके पास गाड़ी , बंगला, बैंक बैलेंस और तो और मां भी है। फिर भी सौतेली ही सही, उनकी तो बस एक वही सहारा है। जब वो घर मे दुत्कारे गए थे तो शहर आये थे। आज जब शहर ने उन्हें चूस चबाकर छोड़ दिया है तो फिर वहीं जा रहे हैं। जानते हैं, कुछ दिन बाद फिर वो वहां रहने नहीं पाएंगे। दुत्कार दिए जाएंगे। शहर, जिसने खराब समय मे उन्हें बोझ की तरह फटक दिया था, अपने जबड़े साफ कर फिर आमंत्रित करेगा। वो आएंगे। वो आने के लिए अभिशप्त हैं।

क्या ही ऐसा हो कि वो कभी न आएं। वो वहीं रह जाएं। घर वालों की हर दुत्कार सह कर भी। वो वहीं लड़ें, जैसे वो शहरों में लड़ते हैं दूसरों के लिए। इस बार अपने लिए लड़ें। गांव और कस्बे मिलें और सोचें अपना भविष्य। मनरेगा और अन्य सस्ती खैरातों से पीछा छुड़ाने की जुगत सोचें। सरकारें उनका सहयोग करें। हर हाथ आखिर काम ही तो चाहता है। दो दिन से जो सड़कों पर थे उनकी औसत मासिक आमदनी 5 से 15 हजार के बीच होगी। क्या देश का मानस इतना गया गुजरा है कि इन लोगों को इतने का भी रोजगार स्थानीय तौर पर उपलब्ध कराने की जुगत नहीं कर सकता।

भारत की आत्मा गांव में बसती है तो सच मानों दो दिन आत्मा रिसती रही। वो अब भी कराह रही है। शहर ने उससे पूछा है तुम कैसे मरना चाहते हो, बताओ तुम्हारी आखिरी इच्छा क्या है, तुम भूख से मरोगे या रोग से। पर चुनाव करते समय याद रखना, भूख से मरोगे तो अकेले मरोगे अगर रोग से मरोगे तो हमको साथ ले के मरोगे। उन्होंने इस बार भूख से मारना गवारा नहीं किया। भूचाल आ गया।

सब लोग ऐसे नहीं हैं। कुछ गरीबों ने शहर छोड़ने से मना कर दिया, उन्हें शहर के उन समर्पित लोगों पर विश्वास था कि वो उन्हें इस गाढ़े समय मे अकेला नहीं छोड़ेंगे। वो सरकार में भी थे, वो समाज में भी थे। वो हम भी हो सकते हैं, और आप भी। आज जो हमारे आसपास हैं, वो अगर बच गए तो समझो भारत की आत्मा बच गयी। गांव बच गए।