जगत् के कण-कण में हैं राम, हृदय के प्रांगण में हैं राम

आरती जायसवाल-


हम जय श्रीराम इसलिए कहते हैं।
जगत् के कण-कण में हैं राम,
हृदय के प्रांगण में हैं राम।

राम मात्र नाम नहीं अर्थ हैं,ज्ञान और विज्ञान हैं।
र, अ और म इन तीनों अक्षरों से राम बनता है।
यहाँ
‘र’अग्निवाचक है,(प्रकाश)
‘अ’ बीजमंत्र है,भानुवाचक
‘म’ का अर्थ है मैं का ज्ञान।
‘र’ अग्निबीज है जिसके उच्चारण से हमारे भीतर के दोष जलकर नष्ट होते हैं,
‘अ’ भानुबीज है सूर्य के प्रकाश की भाँति हमारे भीतर की अज्ञानता का अंधकार दूर करता है,
‘म’ चन्द्र बीज है चन्द्र अमृतमयी शीतलता का कारक है जो हमारे क्रोध और अहंकार का नाश कर हमारे भीतर ज्ञान और भक्ति का संचार करता है।
श्री राम नाम में
रेफ,रेफ का अकार,दीर्घाकार,हलमकार और मकार का अकार -ये पञ्च पदार्थ हैं ।
इनके बिना एक भी मंत्र,ऋचा व सूत्र नहीं बनते वेदों में जितने भी वर्ण शब्द और स्वर हैं वे सब राम नाम से ही उत्पन्न होते हैं।
राम नाम वेदप्राण है।
‘रा’ का अर्थ है आभा और ‘म’ का अर्थ है मैं
राम का तात्पर्य है स्वयं को स्वयं के भीतर प्रकाश का ज्ञान होना
हृदय में कलुषता का अन्त और प्रकाश का उद्भव
होना ।
समस्त सनातन धर्मावालम्बियों के लिए श्रीराम ईश्वर हैं जिनका जन्म इस पृथ्वी पर 7560 ईसा पूर्व अर्थात् 9500 वर्ष पूर्व हुआ।
श्री राम नाम के तीनों पदों ‘र’ ‘अ’ ‘म’
अग्नि सूर्य और चन्द्रमा तीनों के गुणों को प्रदर्शित करता श्रीराम नाम सत् चित् और आनन्द तीनों को मिलाकर हमारे जीवन में सच्चिदानन्द स्वरूप है ।
ईश्वर के अन्य नाम उनके कुछ गुणों को प्रदर्शित करते हैं किन्तु;राम नाम सम्पूर्णता को प्रदर्शित करता है।
‘र’ सत्,’अ’चित् और ‘म’आनन्द ।
व्याकरण शास्त्र के अनुसार राम से ही ओम अर्थात् ॐ उत्पन्न होता है।
सन्धि के अनुसार ओम का ‘ओ’ अः के विसर्ग का अक्षरीकृत रूप का परिवर्तन मात्र है।
इस विसर्ग के दो रूप होते हैं एक तो यह किसी अक्षर के साथ ो हो जाता है या फिर र होता है।यदि विसर्ग का रूपान्तरण ो न करके र कर दिया जाए तो
अ र म ही ओम (ॐ)का दूसरा स्वरूप होगा और इन अक्षरों के विपर्यय से राम स्वतः बन जाएगा इस दृष्टि से राम हरि हर मय भी हैं।

राम मात्र एक नाम नहीं मन्त्र है मनुष्य की ईश्वर और सृष्टि में आस्था का प्रतीक है ।
स्वयं के ज्ञान का प्रतीक है।
वस्तुतः हिन्दू समाज को कर्तव्यथगामी मर्यादापुरुषोत्तम श्रीराम को व्यापक रूप से समझनें और उन्हें जीवन में उतारने की नितान्त आवश्यकता है।
जीवन के विभिन्न क्षणों में विभिन्न भावों को प्रदर्शित करता है श्रीराम का उच्चारण:—–
राम-राम (अविश्वसनीय)
हे राम! (शोक )
हाय-राम! (विस्मय)
जय राम जी की (अभिवादन)
जय श्रीराम!(शक्तिबोधक,विजयघोष)

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