एक अन्तर्द्वन्द्व ०—- ‘मन और काम’ की सत्ता और महत्ता 0

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
(प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक)

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय


मन चंचल है और चपल भी; बाँधने के लिए आगे बढ़ता हूँ तो अँगुलियाँ छिटक जाती हैं और मनभाव को एकाग्र करने की प्रक्रिया से सम्बद्ध होता हूँ तो उपालम्भ के स्वर मुखरित होते हैं। तो क्या मन वस्तुतः एक भटकाव है; प्रवंचना है? नहीं, मन साधना-पथ पर अग्रसर करने के लिए एक ‘हेतु’; निमित्तमात्र है। मैं कहीं अन्यथागामी तो नहीं हो रहा हूँ ?

कामदेव भी तो अस्थिर चित्तवाला है… तो क्या मन भी कामदेव-सा चरित्र जीनेवाला दैहिक होते हुए भी विदेह है; किन्तु यह क्या…! मुझे कामदेव स्थूल दिख रहा है और मन सूक्ष्म ….; पर कामदेव का रूपान्तरण तो मन से तन में किया जाता है। ऐसी कौन-सी प्रस्थिति है, जिसके कारण सकल लोक को अपने आकर्षणपाश में निबद्ध करनेवाला अदृश्य कामदेव रति से पराजित होकर ‘देहमय’ हो जाता है। उसके श्रमसीकर की मादक सुगन्धि में ऐसी कौन-सी विलक्षण ऊर्जा है, जो मन-प्राण को ऊर्जस्वित करते हुए ‘सम्भोग’ की प्रक्रिया से सम्पृक्त कर देता है? यहीं सहज प्रश्न उत्पन्न होता है :— रति नेपथ्य से बाहर किस दशा अथवा किन दशाओं में आती है? मन-तन की अवस्था को वह कैसे भाँप लेती है और उपयुक्त अवसर पाते ही देह पर एकाधिकार करते हुए, उद्दाम और मादक सम्मोहन का वितान तान देती है, जहाँ मात्र दो शरीर का सम्यक् मिलन होता है। पुन: अन्तर्द्वन्द्व के कपाट अनावृत्त होते हैं और जिज्ञासा प्रशमन के लिए व्यग्र हो उठती है :— कामदेव गौण है और मन प्रधान अथवा दोनों अन्योन्याश्रित हैं। हाँ, दोनों में एकरूपता है :– मन को बाँधा नहीं जाता और काम को भी। यह भी सत्य है कि कामदेव और रति की चाप एक साथ कर्ण-कुहरों में समाती है। निस्सन्देह, दोनों को साधा जा सकता है। जी नहीं, मात्र मन को नियन्त्रित कर हम ‘इन्द्रियजित’ कहला सकते हैं। तो क्या उद्दाम काम-वासना का निग्रह किया जा सकता है? हाँ, इसके लिए सात्त्विक साधना-पथ को प्रशस्त करना पड़ेगा। दुष्कर तो है ही; दुर्गम भी है; किन्तु असाध्य कदापि नहीं।

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