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पी० जी० टी० हिन्दी-परीक्षा के नाम पर परीक्षार्थियों के साथ क्रूर मज़ाक़!..?

★आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
(भाषाविज्ञानी और समीक्षक), प्रयागराज।

उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा सेवा चयन बोर्ड द्वारा प्रवक्ता की परीक्षा पिछले १७ अगस्त को करायी गयी थी, जिसमें हिन्दी-विषय के प्रश्नपत्र के ९० प्रतिशत प्रश्न और उनके विकल्प में प्रयुक्त किये गये शब्द, वाक्यविन्यास, दिये गये विकल्प में मूल तथ्य, व्याकरण, भाषाविज्ञानादिक की दृष्टि से पूर्णत: अशुद्ध हैं। दु:ख तो इस बात का है कि ऐसी महत्त्वपूर्ण परीक्षाओं में उन लोग को प्रश्नपत्र तैयार करने का दायित्व सौंपा जाता है, जिन्हें न तो भाषा-व्याकरण-विज्ञान की समझ होती है और न ही साहित्य की। इन सभी प्रश्नों को कहीं-न-कहीं से संकलित किया गया है, अन्यथा प्रश्न की शैली कैसी होनी चाहिए; विरामचिह्नों का, विशेषत: योजक और उद्धरणचिह्नों का कहाँ-किस रूप में व्यवहार होता है, इनकी समझ तो होती ही। निस्सन्देह, ऐसे प्राश्निक को कठघरे में खड़े करने की आवश्यकता है। ऐसे चिह्नोंवाले सभी प्रश्न और विकल्प अशुद्ध हैं। मैं एक सिरे से इस प्रश्नपत्र से जुड़े सभी लोग को खुली चुनौती देता हूँ।

अब यहाँ सम्बद्ध प्राश्निक के विद्यार्थीघातक कृत्य प्रस्तुत हैं :–
प्रश्न १ ही अशुद्ध है; क्योंकि उसमें ‘बरवै नामिका’ के कवि का नाम पूछा गया है, जबकि रहीम की रचना का नाम ‘बरवै नायिका’ है। प्रश्न २ में ‘उत्तररामचरित’ अंकित है, जबकि भवभूति की मूल पुस्तक का नाम ‘उत्तररामचरितम्’ है। प्रश्न ४ है– “एक में उपसर्ग का प्रयोग है” यह प्रश्न ही भ्रामक है। यहाँ होगा– निम्नलिखित में से किसमें उपसर्ग का प्रयोग हुआ है? प्रश्न १२ के विकल्प का कोई उत्तर सही नहीं है। प्रश्न है– ‘छोटी हल्की गोल और किनारेदार थाली दिखाओ’ इस वाक्य में दो अल्प विराम और एक पूर्ण विराम के चिह्न लगेंगे, जो कि विकल्प में है ही नहीं। दूसरा तथ्य विशेषण-शब्द ‘हलकी’ है, न कि ‘हल्की’। इसके लिए ‘ज्ञानमण्डल लि०’ आदिक के कोश देखे जा सकते हैं। प्रश्न १३ में ‘हिन्दी में मुक्त छंद के प्रवर्तक कवि ‘है’ के स्थान पर ‘हैं’ का प्रयोग होगा। प्रश्न १८ का प्रश्न ही ग़लत है; क्योंकि दण्डी की मूल पुस्तक ‘दशकुमारचरितम्’ है, न कि ‘चरित’। प्रश्न १९ का वाक्यविन्यास अशुद्ध है; क्योंकि कविता ‘रची’ जाती है, ‘लिखी’ नहीं जाती। प्रश्न ४० का प्रश्न ही ग़लत है। अमीर ख़ुसरो की रचना है– “ज़े-हाले मिस्कीं मकुन तग़ाफ़ुल दुराय नैनाँ बनाए बतियाँ।” प्रश्नपत्र में इसे तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत किया गया है। प्रश्न ५५ में ‘प्रकाशन काल’ के स्थान पर ‘प्रकाशनकाल’/’प्रकाशन-काल’ होगा। ‘प्रकाशन काल’ का कोई अर्थ नहीं होता। प्रश्न ५६ में ‘एतराज’ का अर्थ पूछा गया है, जबकि ‘एतराज’ कोई शब्द ही नहीं है; सही शब्द ‘ए’तिराज़’/’एतिराज़’ है, जो कि अरबी-भाषा का शब्द है। प्रश्न ५८ में प्रयुक्त ‘एक वचन’ अशुद्ध है; शुद्ध ‘एकवचन’ है। प्रश्न ५९ में ‘नई (शुद्ध नयी) कविता से सम्बन्धित प्रश्न के ‘ए’ विकल्प में ‘बोधों’ के स्थान पर ‘बोध’ और ‘सी’ विकल्प में ‘अधिकांश’ के स्थान पर ‘अधिकतर’ होगा। प्रश्न ६० में ‘आँखें बिछाना’ के विकल्प में ‘प्रायश्चित’ के स्थान पर ‘प्रायश्चित्त’ होगा; क्योंकि ‘प्रायश्चित’ निरर्थक शब्द है। प्रश्न ७५ में ‘पुरस्कर्ता’ के स्थान पर ‘पुरस्कर्त्ता’ होगा। प्रश्न ९६ में राजेश जोशी की पुस्तक का नाम ‘एक दिन बोलेंगे ‘पेड़’ को ‘पेंड़’ बताया गया है। प्रश्न १२५ में पन्त की रचना का नाम ‘ज्योत्सना’ बताया गया है, जबकि वह रचना ‘ज्योत्स्ना’ है।

इनके अतिरिक्त ‘अन्य’ अशुद्धियाँ भी हैं। अब प्रश्न है, परीक्षा-आयोजन करनेवाले अधिकारी कर्त्तव्यविहीन हो चुके हैं क्या? वे सभी एक सिरे दण्डित किये जाने के योग्य हैं। क्या उत्तरप्रदेश के मुख्यमन्त्री इसके प्रति कोई ठोस क़दम उठायेंगे?

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १९ अगस्त, २०२१ ईसवी।)

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