श्री रामचरितमानस मे मातृशक्ति की अवधारणा

◆ इस आयोजन-पट्ट मे कई प्रकार की ताथ्यिक-शाब्दिक अशुद्धियाँ दिख रही हैं, जिन्हें टंकण करनेवाले (ऑपरेटर) का दोष बताया गया है तथा आयोजक-मण्डल ने संशोधित कराकर पुन: प्रेषित करने का आश्वासन दिया है, इसलिए हम उस पर अभी कोई टिप्पणी नहीं करेंगे।

◆ ‘श्री रामचरितमानस मे मातृशक्ति की अवधारणा’ विषय निश्चित रूप से अर्थगाम्भीर्य लिये हुए है। हम यदि उक्त ग्रन्थ से ‘मातृशक्ति’ का विलोप कर देते हैं तो उस ग्रन्थ का अस्तित्व ही समाप्त हो जाता है और तुलसीदास का जनकाव्यत्व भी। सातों काण्डों मे नारियों का चरित्र सत्, रज एवं तम की प्रतिष्ठा करता हुआ, संलक्षित होता है। नारी-पात्रों मे से सौन्दर्य-सम्पन्न पात्र का चयन कर पाना, अद्भुत बोध का ही द्योतक कहलायेगा। यही कारण है कि रामाश्रयी शाखा के प्रवर्तक के रूप मे विश्रुत काव्यशिल्पी गोस्वामी तुलसीदास ने सम्पूर्ण ‘मानस’ मे जिस नारी को ‘परम सुन्दरी’ कहा है, वह हमारे श्रोता और दर्शक-वर्ग के लिए हतप्रभ कर देनेवाला होगा। हम आगामी १२ दिसम्बर को उसका भी सकारण उद्घाटन करेंगे।

उक्त आयोजन मे हमारी भी एक भूमिका है। हम उपर्युक्त विषय का सांगोपांग और आद्यन्त विश्लेषण करना चाहेंगे; उसका परिशीलनात्मक निरूपण कर, बोधी श्रोता और दर्शकवृन्द के सम्मुख एक अभिनव चिन्तनशैली को प्रकाशित भी करना चाहेंगे।

यहाँ यह भी प्रश्न है, हमारे लिए व्याख्यानहेतु कितनी अवधि निर्धारित की गयी है? विषय-विस्तार और महत्ता की दृष्टि से न्यूनतम १ घण्टा तो चाहिए ही; किन्तु आयोजन-अनुशासन का भी महत्त्व है।

अन्त मे, ‘श्री रामचरितमानस’ मे जहाँ से ‘मातृशक्ति की अवधारणा’ का बीज-वपन होता है, वहाँ की डेढ़ चौपाइयों से अपनी विचार-प्रक्रिया का समापन करता हूँ :―
“माता पुनि बोली सो मति डोली, तजहुँ तात यह रूपा।
कीजै सिसुलीला अति प्रिय सीला, यह सुख परम अनूपा।।”
फिर क्या था!
“सुनि बचन सुजाना रोदन ठाना, होइ बालक सूरभूपा।”

(सर्वाधिकार सुरक्षित― आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ८ दिसम्बर, २०२३ ईसवी।)