एक दिन यही आरक्षण देश का विभाजन करेगा!

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय
(प्रख्यात भाषाविद्-समीक्षक)

डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय


आरक्षण को बनाये रखने के ‘औचित्य’ की समीक्षा अब अपरिहार्य है। आरक्षण १० वर्षों के लिए था, फिर बिना इसकी समीक्षा किये क्यों बढ़ाया जाता रहा है?
ग़रीबी कुछ जातियों-वर्गों में है? अन्य जातियों में ग़रीब परिवार नहीं हैं?
योग्यता को ताक़ पर रखकर अयोग्यतर को आरक्षण क्यों? जिन्हें आरक्षण दिया जा रहा है, उनमें से क्या सभी को आरक्षण मिलना चाहिए?
आरक्षण के लाभार्थी सरकारी जातियों और वर्गों के करोड़ों लोग ऐसे हैं, जिन्हें आरक्षण की ज़रूरत नहीं, फिर उन्हें आरक्षण क्यों?
देश की शीर्षस्थ न्यायपालिका सरकारों से आरक्षण की स्थिति पर रिपोर्ट माँगती आ रही है; परन्तु बेईमान सरकारें मौन बनी रही हैं। नितान्त सत्तालोलुप वर्तमान सरकार भी जातियों और वर्गों की राजनीति करते हुए न्यायपालिका के प्रश्न पर चुप्पी साध रखी है। वर्तमान प्रधान मन्त्री नरेन्द्र मोदी अपनी चिर-परिचित शैली में दहाड़ते हैं, “भाइयो-बहनो-मितरो! ‘मेरी सरकार’ आरक्षण को हटायेगी नहीं; आरक्षण लागू रहेगा। आप लोग चिन्ता मत कीजिए, मेरे रहते ऐसा नहीं हो सकेगा।” इतना ही नहीं, दलितों के अदृश्य मसीहा डॉ० भीमरावअम्बेडकर के नाम में ‘राम’ जुड़वाकर, मानो अम्बेडकर को अपनी बौद्धिक सम्पदा बना ली हो।
स्मरणीय है कि १३ अप्रैल, २०१८ ई० को दिल्ली में ‘अम्बेडकर मेमोरियल’ का उद्घाटन करने के बाद नरेन्द्र मोदी ने कहा था : डॉ० भीमराव अम्बेडकर की ही प्रेरणा से मैं प्रधान मन्त्री बना हूँ।
आपको याद होगा, वर्ष २०१४ में आम चुनाव के समय यही नरेन्द्र मोदी खुले मंच से दहाड़ते थे : मैं ‘गधे’ से प्रेरणा लेता हूँ। तो क्या मोदी भाई बतायेंगे : आप ‘गधे’ की प्रेरणा से प्रधान मन्त्री बने हैं अथवा अम्बेडकर की प्रेरणा से?
इसे कहते हैं, स्वार्थ साधने के लिए किसी को भी ‘अपना बाप’ बना लो।
देश की सरकार को आरक्षण के प्रति इतनी ही आसक्ति है तो वह उत्तर दे :—
० संसद् और सेना में आरक्षण क्यों नहीं लागू किया जाता?
० मन्त्रिपरिषद् गठन करते समय आरक्षण लागू क्यों नहीं किया जाता?
० देश में उसी ‘विशेषाधिकार’ के साथ रहने के लिए (रोटी-कपड़ा-मकान) आरक्षण क्यों नहीं किया जाता?
० सरकारी जातियों और वर्गों के लिए देश में अलग से ‘आरक्षणस्तान’ नामक एक भूभाग का आबण्टन क्यों नहीं कर दिया जाता?
० जैसे तथाकथित दलित-साहित्य है : दलितों का, दलितों के लिए, दलितों के द्वारा; वैसे ही समानान्तर दलित-सरकार का गठन क्यों नहीं किया जाता? दलित-हस्पताल, दलित-शिक्षालय, दलित बाज़ार आदिक बनाकर राष्ट्र की मुख्य धारा से अलग क्यों नहीं कर दिया जाता?
देश की सरकार मात्र ‘सत्ता’ की राजनीति के कारण ‘भारतीय’ समाज को बाँट रही है; जाति और वर्ग-संघर्ष का वातावरण बना रही है, अर्थात् “फूट डालो और राजनीति करो” के विषाक्त परिदृश्य की रचना में लगी है।
आज इसी आरक्षण ने चमार, पासी, पटेल, कुर्मी इत्यादिक को ‘सिंह’ बना दिया है और क्षत्रियवंश के वास्तविक सपूत अपनी अस्मिता की रक्षा के लिए संघर्षरत हैं। ब्राह्मणों की उपजाति ‘शर्मा’ को भी सरकारी जातियों ने हथिया लिये हैं और बेचारे ब्राह्मण अपने ब्राह्मणत्व से भी हाथ धो बैठे हैं। ‘वर्मा’ उपजाति का अपहरण ‘कायस्थों’ से कर लिया गया है। ‘गुप्त, गुप्ता, जायसवाल’ का अधिकार सरकारी जातियों ने ‘वैश्य-समुदाय’ से छीन लिया है। इसी तरह से कई उपनाम हैं, जो अनधिकृत नामकरण-आरक्षण के चलते अपनी वास्तविक पहचान के लिए भटक रहे हैं।
अब बहुत हो चुका, देशवासियों को जाति-वर्ग, धर्म-सम्प्रदाय की संकीर्णताओं से पृथक् रहकर समरसता के साथ ‘सामाजिक न्याय’ की बात करनी होगी और भारतीय समाज से ‘जातिसूचक’ सारे शब्दों को समाप्त करने की पहल करनी होगी।

(सर्वाधिकार सुरक्षित : डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, इलाहाबाद; १७ अप्रैल, २०१८ ई०)

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