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पत्रकार और समाचार-चैनलकर्मी अपना दु:खड़ा कहाँ जाकर रोयें?

आचार्य पं॰ पृथ्वीनाथ पाण्डेय

‘मुक्त मीडिया’ का ‘आज’ का सम्पादकीय

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

कोरोना के विषाणु का प्रभाव इतना अधिक बलशाली और तीक्ष्ण दिख रहा है कि वह जीते खा रहा है और मरते भी। इस समय देश के कई समाचारपत्र और समाचार-चैनल-प्रतिष्ठानों से स्वयं को पत्रकार, एंकर, संवाददाता आदिक कहकर सीना तानकर हेकड़ी दिखानेवाले और कुछ सीधे-सादे मीडियाकर्मियों की नौकरियाँ जा चुकी हैं। इस तरह से हज़ारों लोग को ‘कोरोना-संक्रमणकाल’ को ‘मीडिया-संक्रमणकाल’ का नाम बताकर सीधे और टेढ़े हथकण्डे अपनाते हुए बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है और देश का मीडिया-तन्त्र ‘अनुलोम-विलोम’ कर रहा है; अपने ही व्यवसाय के साथ जुड़े पत्रकारों के साथ किये गये और किये जा रहे अन्याय के विरुद्ध तनकर खड़े होने की ताक़त मीडिया-तन्त्र में नौकरी कर रहे एक भी व्यक्ति के पैरों में नहीं है; क्योंकि वे सभी बनिया की नौकरी कर रहे हैं और बनिया भी जानता है कि जिन्हें वह आज २०-२५ हज़ार रुपये या फिर ५०-७६ हज़ार प्रतिमाह दे रहा है, उन्हें हटा देने पर उनसे कहीं अधिक योग्य अभ्यर्थी मात्र १० से २५ हज़ार रुपये की तनख़्वाह पर ‘घुटनों के बल रेंगते हुए’ मिल जायेंगे।

देश के बड़े समाचारपत्र-प्रतिष्ठानों में से एक प्रतिष्ठान ने सादे काग़ज़ पर ‘नियमित रूप से अस्वस्थ’ रहने का सन्दर्भ देकर आवेदनपत्र लिखवाते हुए, प्रकारान्तर से स्थायी रूप से अपने यहाँ के कुछ पत्रकारों की ‘सेवा’ समाप्त कर दी है।

अब प्रश्न है, पत्रकारों के लिए गठित प्रेस परिषद्, प्रेस क्लब पत्रकारिता संघटन आदिक संघटन-संस्था किस बिल में घुस गये हैं, जबकि उनका गठन पत्रकार-कल्याण के लिए किया गया है? सच तो यह है कि पत्रकार-संघटन के सभी अधिकारी अब ‘नेता’ बन गये हैं। एक सिरे से सभी अपने लिए जी रहे हैं; दूसरों के लिए ‘अवकाश’ कहाँ!
धिक्कार है!

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २३ जून, २०२० ईसवी)

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