कोथावाँ प्रा०वि० का हाल, बच्चों को दूध और फल नहीं दे रहे जिम्मेदार

आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय का संदेश

मनुष्य का जीवन जीवधारी के कठोर साधना और सत्कर्म के परिणामस्वरूप प्राप्त होता है, जिसे ‘सर्वोत्तम योनि’ की संज्ञा प्राप्त है। ऐसे में, यदि मनुष्य साधनारहित होकर प्रतिकूल आचरण करता रहता है तो उसका संचित पुण्य क्षरण को प्राप्त होने लगता है। इस विचारबोध/विचार-बोध (‘बोधों’ का व्यवहार कभी नहीं होगा।) के आधार पर उसे मानवीय मूल्यों को आत्मसात् करना होगा, तभी उसकी मनुष्यता सार्थक होती प्रतीत होगी, जो कालान्तर में ‘प्रतीति’ (विश्वास) के विग्रह के रूप में लक्षित होगी, जो उसका अभिधेयार्थ (शब्द का नियत अर्थ) होगा और वाच्यार्थ (वाचक का अर्थ) भी। (अब यहाँ ‘भी’ के आगे ‘होगा’ का व्यवहार नहीं होगा; क्योंकि ‘और’ लगने से वह एक पूर्ण वाक्य का रूप ले लेता है।
(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २१ अगस्त, २०२१ ईसवी।)