कोथावाँ प्रा०वि० का हाल, बच्चों को दूध और फल नहीं दे रहे जिम्मेदार

आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय का संदेश

नदी अपनी स्वाभाविक गति में (‘गति से’ अशुद्ध है।) बहती रहती है। एक ढेला फेंकने के बाद कुछ क्षण तक जलान्दोलन बना रहता है, तदनन्तर वह अपनी पूर्व-गति पुन: प्राप्त कर लेती है। वह ढेले के मारक प्रहार को शिक्षित करना चाहती है– पहले अपनी सामर्थ्य को तोलो, फिर बोलो और भेद जिया का खोलो। नदी न जाने कितने चक्रवात और नाना विभीषिका को अपने वक्षप्रान्त (सीना) पर झेलती आ रही है और उनके प्रभाव से इतना कठोर बन चुकी है कि उस पर सारी आपदा हलकी (‘हल्की’ अशुद्ध शब्द है।) जान पड़ती है; परन्तु वही नदी जब कराल (भयंकर) काल के ललाट पर अपना रौद्र हस्ताक्षर करती है तब ‘विकराल परिदृश्य’ से स्थावर-जंगम कम्पायमान हो उठता है और इहलोक दोलायमान, इसलिए ‘नदी’ की सात्त्विकता के साथ कोई ऐसा कृत्य नहीं करना चाहिए, कि न तो पश्चात्ताप के लिए अन्तराल मिल सके और न ही प्रायश्चित्त के लिए अवकाश। (‘पश्चाताप’ और ‘प्रायश्चित’ शब्द अशुद्ध हैं।)

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; २८ अगस्त, २०२१ ईसवी।)