सामाजिक समरसता और विकास के बीच जननायक बन जाने वाले मोदी देश के विभाजक कैसे ?

राम वशिष्ठ (युवा फ़िल्मकार, चिन्तक / विचारक)-

कल यानी शुक्रवार 10 मई दोपहर में सभी सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर एक ख़बर वायरल हो रही थी और वो खबर प्रधानमंत्री मोदी से जुड़ी है । खबर थी कि टाइम मैगज़ीन ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर एक कवर स्टोरी की है जिसका शीर्षक है – India’s Divider in Chief मतलब भारत को विभाजित करने वालों का मुखिया । यह निश्चित ही एक प्रोपेगैंडा है और निन्दनीय है ।

सबसे पहले कांग्रेस पार्टी की आईटी सेल ने और फेसबुक , व्हाटसअप आदि पर सक्रिय ऐसे लोगों ने जिनके नाम मुस्लिम है या फिर हिन्दू नाम वाले ऐसे लोगों ने जिनके प्रोफ़ाइल पर उनको बौद्ध या प्रबुद्ध दर्शाया गया है , हाथों हाथ इसको लपका और शुरू हो गए । ऐसा ही प्रोपेगैंडा भारत में साल 2002 में भी हुआ था । उस समय India Today नामक पत्रिका ने Hero of the Hatred जिसका मतलब है ‘नफरत करने वालों का नायक’ के शीर्षक से मोदी पर कवर स्टोरी की थी । आज यह पत्रिका मोदी की शान में कसीदे करती हैं । टाइम मैगजीन ने भी साल 2016 में प्रधानमंत्री मोदी को पर्सन ऑफ द ईयर बताया था । लेकिन आज यह कवर स्टोरी है कि मोदी विभाजनकारी हैं । यह प्रोपेगैंडा इसीलिए भी है कि यह अंक 20 मई 2019 को प्रकाशित होना है और तब तक भारत में मतदान खत्म हो जाएगा तो दो दौर के मतदान से पहले ही इसका टीजर निकालकर मोदी के खिलाफ मुहिम चलाने की कोशिश की गई है ।

अब इस प्रोपेगैंडा की पड़ताल करना भी ज़रूरी है । सबसे पहले इस कवर स्टोरी को करने वाले पत्रकार के बारे में बात करते हैं । यह स्टोरी 39 वर्षीय पत्रकार आतिश तासीर ने की है । आतिश तासीर 27 नवंबर 1980 को ब्रिटेन में पैदा हुआ । भारतीय पत्रकार तवलीन सिंह आतिश की माँ हैं और पाकिस्तानी बिजनेसमैन सलमान तासीर पिता हैं । तवलीन सिंह और सलमान तासीर ने कभी विवाह नही किया वो लिव इन रिलेशनशिप में थे । तवलीन सिंह पहले गांधी परिवार की करीबी थी लेकिन बाद में वो भाजपा की समर्थक पत्रकार समझी जाने लगी और अभी भी उनको भाजपा समर्थक माना जाता है । आतिश के पिता सलमान तासीर 2007 में पाकिस्तान सरकार में केन्द्रीय मंत्री बने और एक साल बाद पाकिस्तानी पंजाब प्रांत के गवर्नर बने । साल 2011 में उनके सुरक्षा कर्मी ने गोली मारकर उनकी हत्या कर दी । आतिश की शुरूआती पढ़ाई दिल्ली में हुई बाद में अमेरिका में पढ़ाई की । आतिश स्वतंत्र पत्रकारिता करता है और साल 2011 में वॉल स्ट्रीट जर्नल में आतिश का एक लेख छपा था जिसका शीर्षक था Why my Father Hated India यानि मेरे पिता भारत से क्यों नफ़रत करते थे । इस लेख में आतिश ने अपने पिता की भारत से नफरत करने के कारणों को गिनाया था । इन सब से ऐसा प्रतीत होता है कि अपने पिता की तरह आतिश को भी भारत से नफरत है ।

बाद में कल शाम तक यह वायरल खबर सोशल मीडिया प्लेटफार्मों से गायब होने लगी और आतिश तासीर का विकीपीडिया पर पेज़ भी इनविजिबल कर दिया गया । शायद आतिश की सुरक्षा के कारण ऐसा किया गया है । लेकिन प्रोपेगैंडा तो हो चुका है । अब देखते हैं कि आतिश ने कितना सच लिखा है और कितना झूठ ।

मोदी साल 2001 से 2014 तक लगभग 13 वर्ष गुजरात के मुख्यमंत्री रहे और वर्तमान में पांच वर्ष से प्रधानमंत्री हैं । गुजरात के भुज में 2001 में आये विनाशकारी भूकंप से बेहाल गुजरात की कमान तब के मुख्यमंत्री केशुभाई पटेल को हटा कर उनको सौंपी गई । मोदी के कार्यकाल में 2002 के साम्प्रदायिक दंगे हुए । राज्य की मोदी सरकार पर दंगे में शामिल होने के आरोप भी लगे लेकिन किसी भी जांच में आरोपों की पुष्टि नहीं हो सकी । विनाशकारी भूकंप और दंगों से बदहाल गुजरात का मोदी ने ऐसा विकास किया कि गुजरात विकास मॉडल की चर्चाएं होने लगी । विकास के नाम पर मोदी राज्य में लगातार तीन चुनाव जीते और देश भर में लोकप्रिय हो गए । लेकिन नफरत करने वालों ने उनको नफ़रत फैलाने वाला कहना नही छोड़ा । जबकि 2002 से लेकर 2014 तक उनके मुख्यमंत्री काल में कोई भी साम्प्रदायिक दंगा नहीं हुआ केवल विकास हुआ ।

साल 2014 में भाजपा की पूर्ण बहुमत की सरकार में मोदी प्रधानमंत्री बने और इस कार्यकाल में भी देश में कोई साम्प्रदायिक दंगा नहीं हुआ । कुछ मॉब लिंचिंग की घटनाओं से इंकार नहीं किया जा सकता लेकिन मोदी विरोधियों ने दोहरा मापदंड अपनाते हुए उनको साम्प्रदायिक रंग देने की असफल कोशिश जरूर की । अखलाक पर , रोहित वेमुला पर , जुनैद पर जमकर हंगामा काटा जबकि डा0 नारंग , चंदन गुप्ता और बंगाल में हिन्दूवादी कार्यकर्ताओं की हत्या पर चुप्पी साधी गई ।

मोदी को कुछ तथाकथित मानवाधिकार कार्यकर्ताओं , सेक्युलर जमात और भांड किस्म के पत्रकारों ने जिस तरह से हमेशा टार्गेट किया है वो निराशाजनक है । जिन 2002 गुजरात दंगों के लिए मोदी पर हमला किया जाता है उन पर यह समझना चाहिए कि वो गोधरा की प्रतिक्रिया थी । यहां यह भी स्पष्ट करना चाहता हूँ कि मेरा मानना यह है कि 2002 गुजरात दंगे नहीं होने चाहिए थे किन्तु गोधरा भी नहीं होना चाहिए था । गुजरात के दंगे मानवता के विरूद्ध थे तो गोधरा भी मानवता के विरूद्ध कृत्य था और गुजरात 2002 – गोधरा ही क्यों प्रत्येक दंगा मानवता के विरूद्घ कृत्य है । लेकिन अखिलेश यादव के कार्यकाल में मुजफ्फरनगर के दंगों के कारण अखिलेश यादव को कभी ऐसे टार्गेट नहीं किया गया जैसे गुजरात के कारण मोदी को । कांग्रेस के कार्यकाल में कश्मीरी पंडितों को चुन चुनकर खुलेआम निशाना बनाने वाले , कांग्रेस के कार्यकाल में भागलपुर , मेरठ के दंगे होने पर , देश की आंतरिक स्थिरता को खतरा बने नक्सल के प्रारम्भ होने पर , पूर्वोत्तर और कश्मीर के अलगाववादीयों के पनपने पर कांग्रेस का कोई भी नेता देश तोड़ने वाला नहीं है लेकिन 2002 के बाद से मोदी ने जहां भी शासन किया वहां पर शांति बनाकर विकास करने वाला मोदी देश को विभाजित करने वाला हो गया ! कैसे ?

दरअसल यह सब सत्ता का खेल है और दुःखद यह कि लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहलाने वाला पत्रकारिता जगत, जिसे निष्पक्ष होना चाहिए वो निर्लज्जतापूर्वक इसमें शामिल हैं । वो पूर्वाग्रह से ग्रस्त होकर काम करता है ।

आखिर क्या मतलब है कि कांग्रेस के समर्थक व पत्रकार या तो कम्युनिस्ट विचारधारा के हैं या भाजपा व हिन्दुत्व के विरोधी ? जो सच है वो लिखा जाना चाहिए । अगर आप सच से आँखें फेरते हैं , अगर आप किसी की झूठी छवि गढ़ते हैं या किसी की छवि तथ्यों को तरोड़ मरोड़ कर धूमिल करते हैं तब आपको पत्रकार नहीं होना चाहिए । क्योंकि आप वास्तविक पत्रकार नहीं बल्कि चारण हैं । बेहतर होगा आप कविता करें और कल्पना का मनमर्जी प्रयोग कर अपने रहनुमाओं को खुश करके पुरस्कार पायें । अगर चारण हटें तो पत्र पत्रिकाएं कभी ऐसी कवर स्टोरी नहीं लिखेंगी जैसी टाइम पत्रिका ने 20 मई के अंक हेतु लिखी है ।

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