ब्लॉक कोथावां में वोटर लिस्टों की बिक्री के नाम पर हो रही अवैध वसूली

‘बेटी’ ने कुछ कहने के लिए ‘मौक़ा’ दे दिया

★ आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

२ अप्रैल, २०२१ ईसवी को मेरी बड़ी बेटी कंजिका ने अकस्मात् कहा था, “बाबू जी! जितना आपने ‘हिन्दी’ पर ध्यान दिया है उतना परिवार पर दिये रहते तो क्या बात थी।”

बेटी की कही हुई उपर्युक्त बात उस दिन से साये की तरह से मेरा पीछा करती आ रही है; क्योंकि उसमें उसकी ‘अबूझ’ पीड़ा है; अन्तर्मन की व्यथा-कथा है।

बाबू जी (पिता) के रूप में मुझे उसका एक उपालम्भ करनेवाली का रूप दिख रहा है, जिसमें उसके प्रश्नात्मक आभासी शब्द कुछ यों हैं– आपने ‘हिन्दी’ के लिए अपनी अवस्था की आहुति दे दी; किन्तु आपके हक़ में क्या आया?
इसमें कोई संदेह नहीं है कि ‘पृथ्वीनाथ पाण्डेय’ ने हिन्दी के लिए राष्ट्रीय-अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर हिन्दी के समर्थन में आक्रामक रूप से ताल ठोंका है; बिना किसी ‘चाह’ (बदले में कुछ मिल जाये।) के अपने तन-मन का शोषण किया है, उसके समकक्ष आज एक भी व्यक्ति नहीं दिखता। कछुए के सुरक्षित खोल को आप सभी ने देखा होगा। वह संकट दिखते ही खोल के भीतर घुस जाता है; परन्तु मैं सदा चट्टान की तरह से अडिग रहा हूँ। हिन्दी का एकाकी पक्षधर, विशेषत: शुद्ध हिन्दी-प्रयोग के प्रति अपनी परम-चरम निष्ठा के साथ कभी समझौता नहीं किया है; चन्द टुकड़ों को लेकर स्वयं को बेचा नहीं है; और मुझे इसके लिए स्वयं पर गर्व है।

मेरी बेटी का कहा हुआ एक-एक शब्द मुझे अतीतोन्मुख किये जा रहा है; क्योंकि उसने देखा है कि उसके बाबू जी वर्षों तक रात्रिप्रहर में सोये नहीं हैं और लगातार हिन्दी-सेवा करते रहे; शब्द-बीनते-चीन्हते रहे।

हिन्दी-अधिकारी, राजभाषा-अधिकारी, किसी भी स्तर का हिन्दी का अध्यापक इत्यादिक ने हिन्दी की सेवा नहीं की है और न ही कर रहे हैं; उन्हें तो एक केन्द्रविन्दु के पास लाकर पटक दिया जाता है और उसी के अन्तर्गत बँधी-बँधायी, बनी-बनायी शासकीय नीतियों के अन्तर्गत वे सभी अपनी नौकरी करते हुए पाये जाते हैं। दूसरे शब्दों में– सरकार की ग़ुलामी करते हुए “रँगे हाथों” देखे जाते हैं। ऐसा यदि नहीं रहता तो आज हमारी हिन्दी पूर्ण शुचिता के साथ उत्तुंग शिखर पर समासीन होती लक्षित होती।

मेरी बेटी की बात में ५०० प्रतिशत दम है और मेरी हिन्दी-निष्ठा १००० प्रतिशत बढ़कर रही है।

साहित्य के कबीर ने कहा था, “कबिरा खड़ा बाजार में, लिए लुकाठी हाथ। जो घर फूँके आपनौ चले हमारे साथ।।”

मैंने तो अपना घर फूँक दिया है, जबकि ख़ुद को ‘हिन्दीसेवक’, ‘हिन्दीगौरव’, ‘हिन्दीभाषाभूषण’ तथा वरीयताक्रम में सर्वोच्च उपाधियाँ हथियानेवाले, चरणपादुका चाट-चाटकर स्वयं को प्रकाण्ड विद्वान् और विदुषी घोषित करानेवालियों ने बिना किसी आत्मकेन्द्रित चाह के हिन्दी को लोकहितैषिणी बनाने के लिए कौन-सा काम किया है, जो आज रेखांकित हो रहा हो? ऐसे ही लोग नौकरी करते रहे; परन्तु मौलिक न बन सके; सेवानिवृत्त हुए तो आदर्शवाद बघारते रहे। मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं कि किसी भी वर्ज्य दीवार पर पदप्रहार कर, हिन्दी की सच्ची सेवा करनेवाला एक भी व्यक्ति मेरी लगभग ६१ वर्ष की अवस्था में नहीं दिखा/ मिला है। क्या यह ‘विडम्बना’ की श्रेणी में लानेवाला विषय नहीं है?

आज यदि मैं यह आह्वान करूँ कि पन्द्रह दिनों-बाद एक आयोजन होगा, जिसमें स्वयं को हिन्दी के सेवक-सेविका, भाषाविद्, व्याकरणाचार्य, हिन्दी की अध्यापक-अध्यापिका, हिन्दी-अधिकारी, राजभाषा-अधिकारी इत्यादिक कहनेवाले शुद्ध हिन्दी के प्रयोग के प्रति जन-जन को जागरूक करने के लिए ‘शिविर कार्यक्रम’ में सम्मिलित होने के लिए अपनी अनुमति दें तो अँगुलियों के पोरों पर गिनने-लायक़ ही हिन्दीसेवी दिखेंगे, वह भी कुछ समय के लिए; क्रमश: संख्याबल शिथिल होता नज़र आयेगा।

अभी तो यह एक चिनगारी है; धधकती विचार-प्रक्रिया से जब गुज़रूँगा तब ‘लंका-दहन’-सदृश दृश्य उभरेगा।

अपनी बेटी की मर्मस्पर्शी बात की अन्तर्निहित भावना का समादर करता हूँ।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ४ अप्रैल, २०२१ ईसवी।)

url and counting visits