ब्लॉक कोथावां में वोटर लिस्टों की बिक्री के नाम पर हो रही अवैध वसूली

देश की समाचार-चैनलों और समाचारपत्र-पत्रिकाओं का नंगा सच!

— आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

‘भाषा-परिष्कार-समिति’
केन्द्रीय कार्यालय, इलाहाबाद!

अब अनिवार्य हो गया है, देश के मीडिया-तन्त्र (मुद्रित-वैद्युत) में प्रत्येक स्तर पर काम करनेवाले-वालियों संवाददाताओं, समाचारलेखकों, समाचारवाचकों, सम्पादकों, प्रधान सम्पादकों, प्रूफ़-संशोधकों उद्घोषकों, सूत्रधारों आदिक के लिए ‘मीडिया-पाठशाला’ आरम्भ करने-कराने की, अन्यथा तथ्य, तर्क, कथ्य, प्रस्तुति आदिक-स्तर पर भारतीय समाज के बचे-खुचे भाषिक संस्कार को यह मीडिया-तन्त्र निगल जायेगा।

सच तो यह है कि मीडिया के लगभग ९० प्रतिशत लोग भाषा-संस्कार से रहित हैं और जो मुट्ठीभर ‘सहित’ हैं, उनमें से अधिकतर अपने मालिकों की ग़ुलामी करते दिख रहे हैं और कुछ अँगुलियों के पोरों पर ही हैं, जो समन्वय-सामंजस्य के आधार पर यथाशक्य ‘बेहतर’ करने की दिशा में प्रयत्नशील हैं।

भाषा के साथ बलप्रयोग करनेवालों का ‘भाषिक अस्मिता’ और ‘भाषिक अभिमान’ ”पानी-पानी” हो चुका है। वे अपने और अपने परिवार की ख़ातिर समझौता करके जी रहे हैं। उनसे जब प्रश्न किया जाता है,” ग़लतियाँ सुधारिए” तब उत्तर मिलता है, “हमारा ध्यान ग़लतियों को सुधारने पर नहीं है, बल्कि किसी तरह से समाचार पाठकों तक पहुँच जाये, इस पर हम ज़ोर देते हैं।”

यही कारण है कि हमारी भाषा के साथ बलप्रयोग करते हुए, मीडियाकर्मी “रँगे हाथों” प्रतिपल पकड़े जा रहे हैं; परन्तु इस विषय की रखवाली करने और भाषिक उच्छृंखल चेहरों को दण्डित करने की न कोई प्रथा रही है और न ही आज कोई व्यवस्था है। तो ऐसे में, मीडिया के ऐसे अपराधी लोग को खुले साँड़/साँढ़ की तरह शब्द-जगत् में छोड़ देना क्या औचित्यपूर्ण है? निस्सन्देह, यह गम्भीर और शोचनीय प्रश्न यहाँ हमने “डंके की चोट पे” देश के लगभग सभी प्रमुख समाचारपत्रों और समाचार-चैनलों के ‘छोटे से बड़ों’ कर्मियों का चुनौतीपूर्ण आह्वान किया है। साहस हो तो हमसे आँखें मिलाकर संवाद कीजिए; ‘भाषा के न्यायालय’ में हम आप सभी को ला रहे हैं।

देश के समस्त ‘वास्तविक’ प्रबुद्धजन! आप सभी इस ‘न्यायालय’ में ‘न्यायाधीश’ की भूमिका में हैं; पारदर्शिता का परिचय देना होगा।

तो आइए! यथोचित आसन ग्रहण कीजिए।

१- NDTV इंडिया : मृतकों के परिजनों को १० लाख मिलेंगे।
टिप्पणी– परिजनों अशुद्ध शब्द है, शुद्ध है, परिजन। ज्ञातव्य है कि परिजन के स्थान पर ‘स्वजन’ होगा; क्योंकि ‘स्व’ का अर्थ है, ‘अपना’ और ‘जन’ का ‘लोग’ अर्थात् पारिवारिक सदस्य। शुद्ध शब्द परिजन है, न कि परिजनों। जन बहुवचन का शब्द है। जन में नाते-रिश्तेदार, नौकर-चाकर भी सम्मिलित हैं।

२- आज तक : मारे गये लोगों के परिजनों को ₹ 10 लाख देने का एलान
टिप्पणी : यहाँ भी ‘परिजन’ का प्रयोग उपयुक्त नहीं है।

३- न्यूज़ 24 : ० मारे गये लोगों के परिजनों को मिलेगा 10 लाख का मुआवजा
० मुआवजे का ऐलान
टिप्पणी : ‘परिजन’ (कृपया ऊपर देखें।)
‘ऐलान’ का प्रयोग ग़लत है, सही शब्द है, ‘एलान’।

४- NEWS NATION : घायलों को 2 लाख मुआवज़े का ऐलान
टिप्पणी : ऐलान की जगह ‘एलान’ होता है।

५- INDIA TV :
० अभिषेक उपाध्याय (संवाददाता) ने सुनाया था : बस पंचर हो गयी। लगभग २ से ढाई घण्टे हो गये; टायर बदला गया। बस का पंचर बना।
दिखाया जाता रहा : “2 किमी का सफर 200 गोलियां”
टिप्पणी : अभिषेक उपाध्याय नाम का संवाददाता ‘हड़बड़िया’ संवाददाता है। वह जब भी संवाद सुनाता है तब उसके अंग-प्रत्यंग झटके खाते रहते हैं। उसे यह नहीं मालूम कि सही शब्द ‘पंक्चर’ है, ‘पंचर’ नहीं; वहीं ‘INDIA TV’ के उस संवाददाता की समझ इतनी भी नहीं है कि न तो बस पंक्चर होती है और न ही टायर पंक्चर होता है; पंक्चर होती है, ‘ट्यूब’।

इसी चैनल का एक अन्य संवाददाता बता रहा था कि आतंकियों ने न जाने कितनी गोलियाँ चलायी थीं।
उसी समय उक्त चैनल पर दिखाया जा रहा था— 2 किमी का सफ़र 200 गोलियाँ।

किसी भी समाचार को अतिरंजित कर प्रस्तुत करने का औचित्य क्या है? इस चैनल के मुखिया रजत शर्मा बता सकते हैं— घटना के समय कथित चैनल ‘INDIA TV’ का कौन-सा संवाद-सूत्र आतंकियों के साथ-साथ चलते हुए, हथियारों से निकल रही गोलियों की संख्या गिन रहा था?

६- ABP न्यूज़ : मारे गये सभी यात्री गुजरात और महाराष्ट्र के थे।
टिप्पणी : बताया जा रहा है— मारे गये लोग में से पाँच लोग गुजरात और दो लोग महाराष्ट्र के थे तब ऐसे में, ‘मारे गये सभी यात्री’ का प्रयोग उचित और उपयुक्त नहीं है।

समाचार-चैनलों को ‘कसाईख़ाना बनानेवाले लोग! होश को बरक़रार रखिए लटके-झटके दिखाकर देशवासियों को बरगलाइए मत! आप सभी कितने पानी में हैं, देशवासियों को अन्दाज़ा मिल चुका है।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; ११ जुलाई, २०२० ईसवी)

url and counting visits