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सरकार ने केन्द्रीय परिव्यय (बजट) में आम जनता को ‘झुनझुना’ थमाया

आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

कोरोना के कुप्रभाव से देश का एक-एक व्यक्ति प्रभावित रहा है। वर्ष २०२१-२२ के परिव्यय (बजट) प्रस्तुत करने से पूर्व ऐसा लग रहा था कि 'न्यू इण्डिया की मोदी-सरकार' जनसामान्य की कठिनाइयों को समझते हुए लोकहित में परिव्यय प्रस्तुत करेगी, जबकि हुआ, इसके ठीक विपरीत। शुरू से ही उद्योगपतियों और व्यवसायियों पर मेहरबान इस सरकार का बेईमान नज़रीय:/नज़रीया इस परिव्यय में भी झलक रहा है। इस 'काग़ज़-रहित' (पेपरलेस) परिव्यय में जिन सामानों को सस्ता और महँगा किया गया है, उनसे सीधे व्यवसायियों को लाभ मिलेगा। सरकार वाहन के कल-पुर्जो पर १५ प्रतिशत तथा मोबाइल और चार्जर पर २.५ प्रतिशत के आयात शुल्क लगायेगी, जिससे सभी वाहनों के मूल्यों में अत्यधिक बढ़ोतरी कर दी जायेगी। उल्लेखनीय है कि इस परिव्यय में पूँजीगत व्यय के लिए.४.१२ करोड़ रुपये निर्धारित किये गये हैं। राजस्व घाटा का अनुमान.६.५ प्रतिशत लगाया गया है। ११ प्रतिशत वास्तविक जी०डी०पी० विकास माना जा रहा है। पिछले तीन महीनों में '- ७.५६ प्रतिशत' जी०डी०पी० रही है।
       
आयकर-दाताओं, विशेषत: मध्यम-वर्ग को प्रत्येक परिव्यय में 'आयकर-स्तर' की प्रतीक्षा रहती है; किन्तु वर्ष २०२१-२२ के परिव्यय को जान-समझकर निराश हुई है। यह सरकार किसी भी चीज़ की 'अर्थ' और 'परिभाषा' अपने सुविधानुसार बदलती आ रही है। इस परिव्यय में भी वित्तमन्त्री निर्मला सीतारमण ने 'वरिष्ठ नागरिक' की परिभाषा बदल दी है। उन्होंने कहा-- सीनियर सिटिजन को हम आयकर से मुक्त कर रहे हैं; परन्तु उसकी अवस्था ७५ वर्ष से ऊपर निर्धारित की है। अब प्रश्न है, ७५ वर्ष की अवस्थावाले शासकीय सेवकों की संख्या कितनी है? उन सेवकों में से कर-योग्य पेंशन-प्राप्त करनेवाले पचहत्तर वर्षीय लोग कितने हैं? ६० वर्ष और उससे ऊपर के नागरिक को 'वरिष्ठ नागरिक' कहा गया है। यह केवल देश को बेवकूफ़ बनाया गया है। 'प्रॉविडेण्ट फण्ड' से प्राप्त धनराशि के ब्याज पर सरकार की क्रूर दृष्टि पड़ चुकी है। अब सरकार २.५ लाख रुपये के ब्याज पर 'कर' लेगी।
      
कोरोना-काल में आम जनता परेशान है और सरकार भी; किन्तु सरकार अपनी परेशानी को आम जनता पर थोपती आ रही है; आम जनता को और 'घायल' कर रही है। इस परिव्यय से हमारे देश के करोड़ों शिक्षित बेरोज़गारों के लिए सरकार ने क्या-क्या व्यवस्था की है, साफ़ तौर पर कोई उत्तर नहीं मिल रहा है।
      
नरेन्द्र मोदी ने जब अपनी सरकार का गठन कराते समय शपथग्रहण किया था तब उन्होंने इस आशय की बात की थी :-- देश को बिकने नहीं देंगे; सरकारी कम्पनियों को बेचने नहीं देंगे और निजीकरण नहीं होने देंगे।
      
अब इस परिव्यय से तो यही लगने लगा है कि सरकारी कम्पनियाँ बेचने और निजीकरण के लिए सरकार इस परिव्यय में कमर कसती नज़र आ रही है। वायुयान-केन्द्र, बन्दरगाहों, रेल, पाँच राष्ट्रीय राजमार्ग, एन०टी०पी०सी०, सरकारी भूभाग, पुलों, सैनिक स्कूलों का निजीकरण तथा दो सरकारी बैंकों की बिक्री होना तय है। जिनका निजीकरण नहीं होगा, उनका विलय होगा या फिर उन्हें बेच दिया जायेगा; बन्द कर दिया जायेगा। देश के लघु वायुयान-केन्द्र बेचे जायेंगे। जीवन बीमा निगम से प्राप्त सरकारी आय को बेचा जायेगा। पुराने वाहनों को निरस्त कर दिया जायेगा और वाहन-उद्योग को सीधे लाभ दिलाया जायेगा, जबकि हर जगह पुराने वाहन इस्तेमाल होते आ रहे हैंं। एक प्रकार से बहुत महँगे नये वाहन को ख़रीदने में असमर्थ लोग की बड़ी संख्या है।
      
किसी भी परिव्यय में 'रक्षा' के लिए विशेष व्यवस्था की जाती है और उसे जानने के लिए देश की जनता और सैनिक-वर्ग उत्सुक रहते हैं; परन्तु अपने परिव्यय को प्रस्तुत करते हुए, निर्मला सीतारमण इस विषय पर मौन रहीं। रक्षा-परिव्यय को सार्वजनिक न करने के पीछे कथित मोदी-सरकार की कौन-सी विवशता और बाध्यता रही है, देश की जनता और हमारे सैनिक जानना चाहते हैं।
        
यदि ध्यानपूर्वक देखा जाये तो यह 'चुनावी परिव्यय' भी है। ऐसा इसलिए कि जिन राज्यों में निकट भविष्य में चुनाव होनेवाले हैं, उनके प्रति यह सरकार मेहरबान है, जबकि पिछले परिव्यय में उन राज्यों की खोज-ख़बर तक नहीं की गयी थी। तमिलनाडु (१ लाख करोड़  रुपये की लागत से ३५,००० कि० मी० सड़क-निर्माण) केरल (६५,००० करोड़ की लागत से १,१०० कि० मी० सड़क-निर्माण) असोम (अगले तीन वर्षों में १,३००  कि० मी० सड़क-निर्माण) राज्यों पर सरकारी मेहरबानी सुस्पष्ट दिख रही है; अन्य राज्यों की उपेक्षा क्यों की गयी है?  बंगाल में सड़क-निर्माण के लिए सर्वाधिक २५ हज़ार करोड़ रुपये आवण्टित किये गये हैं। 
      
राज्यों की स्वायत्तता पर हमला किया गया है। शराब पर केन्द्रीय कर क्यों? यह तो राज्य-सरकार का विषय है। अब मोदी-सरकार शराब से प्राप्त कर का लाभ लेगी और राज्य-सरकारें भी झुनझुना बजायेंगी।
     
'किसान सम्मान निधि' में कमी की गयी है; 'मनरेगा' की उपेक्षा की गयी है;  मटर, चने पर कर लगाये गये हैं। इस सरकार ने परिव्यय में पेट्रोल और डीज़ल पर क्रमश: २.५ और ४ प्रतिशत 'कृषि-कर' लगाये हैं। उसके पीछे सरकार का यह तर्क है कि किसानों के कल्याण के लिए ये कर लगाये गये हैं। कर लगे पेट्रोल-डीज़ल का उपयोग किसान भी करेगा और बढ़े हुए मूल्य का नियमत: भुगतान करेगा। इस प्रकार किसान से ही रुपये लेकर उसके लिए कल्याण की योजना बनाना मोदी-सरकार की कौन-सी बहादुरी है? किसान के हित में यदि काम करने को दिखाना ही था तो स्पष्ट तौर पर किसानों के कल्याण के लिए अलग से एक पारदर्शी 'प्रकोष्ठ' बनाया गया होता। किसान को ऋण के लिए १६.५ करोड़ रुपये की व्यवस्था कर तो दी गयी है; परन्तु ऋणप्रक्रिया इतनी जटिल रहती है कि लघु-सीमान्त किसान की एड़ियाँ घिस जाती हैं।
     
स्वास्थ्य पर सरकार मेहरबान है।  स्वास्थ्य-परिव्यय के लिए करोड़ों हज़ार रुपये आवण्टित किया गया है, जो छ: वर्षों में पूरा किया जायेगा; किन्तु शासकीय चिकित्सालयों की जो दशा और दिशा है, उससे यह नहीं लगता कि जनसामान्य निजी चिकित्सालयों से पीछा छुड़ा सकेगा।
     
अन्त में, प्रश्न है,  इस परिव्यय में जो सब्ज़बाग़ दिखाया गया है, उसे व्यावहारिक बनाने के लिए सरकार धनराशि कहाँ से लायेगी? ज़ाहिर है, बहुविध उपायों के द्वारा आम जनता का ख़ून चूसा जायेगा, जैसा कि पिछले छ: वर्षों से चूसा जाता रहा है।

(सर्वाधिकार सुरक्षित– आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १ फरवरी, २०२१ ईसवी।)