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‘सर्जनपीठ’, प्रयागराज का सक्रिय आन्तर्जालिक राष्ट्रीय बौद्धिक परिसंवाद-कार्यक्रम सम्पन्न


★ कोरोना-काल में फ़ीस लेने का कोई औचित्य नहीं

इन दिनों कोरोना से सम्पूर्ण जनजीवन दुष्प्रभावित हो चुका है। शिक्षणसंस्थानों में अध्ययन- अध्यापन स्थगित है। माता-पिता और अभिभावक कोरोना की मार से असहाय-से दिख रहे हैं। ऐसी स्थिति में शिक्षालय में बच्चों से शुल्क न लिया जाये, यह हमारे समाज का प्रमुख विषय बन चुका है। इस विषय की गम्भीरता को समझते हुए, ‘सर्जनपीठ’, प्रयागराज के तत्त्वावधान में ‘पढ़ाई नहीं तो फ़ीस नहीं’ विषयक एक आन्तर्जालिक राष्ट्रीय बौद्धिक परिसंवाद का आयोजन प्रयागराज में ७ अगस्त को किया गया था, जिसमें देश के अनेक प्रबुद्धजन की सार्थक सहभागिता रही।

रमाशंकर श्रीवास्तव
वरिष्ठ पत्रकार और विचारक

आयोजन की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ पत्रकार और विचारक रमाशंकर श्रीवास्तव ने कहा, “निजी स्कूलों में कोरोना-काल में विद्यार्थियों को बिना स्कूल में शिक्षा प्राप्त किये पूरी फीस चुकानी पड़ रही है, जबकि स्कूल की तरफ़ से उन्हें पढ़ाने के लिए आन लाइन व्यवस्था की गयी है, जिसका उन्हें अभ्यास नहीं है। हमारे यहाँ नेटवर्क की व्यवस्था कैसी रहती है, यह किसी से छिपा नहीं है। ऐसी स्थिति में, पढ़ाई की स्थिति का सहजता से अनुमान लगाया जा सकता है। दूसरी तरफ़, जिनके पास कम्प्यूटर, लैपटॉप अथवा अच्छे स्तर का मोबाइल भी नहीं है, उनके पढ़ाई पर असर पड़ रहा है अथवा उसे व्यवस्थित करने के लिए उनके अभिभावकों को अलग से आर्थिक भार सहन करना पड़ रहा है। स्कूल-व्यस्थापन से शिक्षकों एवं सम्बन्धित अन्य कर्मचारियों को समय पर पूरा वेतन नहीं मिल रहा है। कुछ जगहों पर आधी तो कुछ को मिल ही नहीं रहा है।”

कृष्ण नारायण पाठक
विचारक-चिन्तक

बंगलुरु से चिन्तक, विचारक तथा समाजशास्त्री कृष्ण नारायण पाठक का मत है, “नेटशिक्षण सम्पन्न शैक्षणिक संस्थान शिक्षण भी जारी रखें और सक्षम अभिभावकों की सहमति से शुल्क भी प्राप्त करें। जो बच्चे किसी कारणवश अक्षमता व्यक्त करें, उनसे न संस्थान को शुल्क वसूलने का अधिकार हो और न ही वे संस्थान उन बच्चों का कथमपि अहित कर सकें, इसे सरकार सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी निभाये । शिक्षा जैसे परम आवश्यक अधिकार से कोई भी भावी नागरिक (छात्र-छात्राएँ) बुद्धिकौशल से वंचित न रहने पायें, यह भी अनिवार्यतः सरकार सुनिश्चित करे। भौतिक सत्यापन करते हुए ग्राम्यांचल और शहरी क्षेत्रों में इकाइयाँ बनाकर, सभी इच्छुकों को शिक्षण की सुरक्षित व्यवस्था बनाकर, व्यापक नीति द्वारा सरकार सुनिश्चित करे । अध्यापन में सक्षम लोग को इस काम में लगाकर, उन्हें भी अत्यावश्यक आवश्यकताओं की संपूर्ति-हेतु मानदेय उपलब्ध कराये और सभी छात्रों को शिक्षण की सुविधा भी । प्राथमिकता के आधार पर, इस कार्य-हेतु सरकार धन की व्यवस्था कराये और किसी भी सूरत में इच्छुक बच्चे पढ़ाई से वंचित न रहें, इसका विशेष ध्यान रहे।”

आचार्य पं॰ पृथ्वीनाथ पाण्डेय
परिसंवाद-आयोजक

परिसंवाद-आयोजक आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय ने कहा, “देश के अधिकतर निजी शिक्षण-संस्थाएँ ‘लूटतन्त्र’-पद्धति पर कार्य कर रही हैं। हमारी ऋषिपरम्परा में निश्शुल्क विद्यादान की व्यवस्था थी, तब ज्ञानगंगा का प्रवाह होता था और भारत जगद्गुरु कहलाता था। आज की विद्या एक ‘उत्पाद’ बनकर रह गयी है और विद्यालय ‘उत्पादक’ बन चुके हैं। यही कारण है कि आज के शिक्षणतन्त्र में कोरोना के विपदा-प्रभाव को देखते हुए, बच्चों के प्रति ‘करुणा’ जाग्रत् नहीं हो पा रही है। आज विद्यार्थियों और अभिभावकों के प्रति विराट और विशाल हृदय का परिचय देकर शिक्षणतन्त्र अपनी महत्ता सिद्ध कर सकते हैं।”

डॉ० अरुणप्रकाश पाण्डेय
वरिष्ठ पत्रकार

दिल्ली से वरिष्ठ पत्रकार और विचारक डॉ० अरुण प्रकाश पाण्डेय की मान्यता है, “भारत में शिक्षा की जो प्रचलित प्रणाली है, हमारी तैयारी उसी के अनुरूप है। किसी भी नयी प्रणाली (ऑनलाइन कक्षा) के लिए हम संसाधन और मनोवैज्ञानिक दृष्टि तैयार नहीं हैं। स्कूली पाठ्यक्रमों की संरचना भी दूरस्थ शिक्षा के अनुरूप नहीं है और न ही शिक्षकों को इस तरह का कोई प्रशिक्षण दिया गया है, इसलिए ऑनलाइन कक्षाएँ पूरी तरीक़े से अप्रासंगिक और अतार्किक हैं, साथ ही अभिभावकों को उलझाये रखने का एक ज़रिया मात्र हैं। स्कूल ऑनलाइन कक्षाएँ सिर्फ़ इसलिए संचालित कर रहे हैं, ताकि वे नियमित रूप से फीस वसूलने का जायज आधार तैयार कर सकें। विद्यालयों के व्यवहार से स्पष्ट है कि उनकी शिक्षा के प्रति कोई प्रतिबद्धता नहीं है, बल्कि वे सिर्फ़ फीस वसूलने के लिए ऑनलाइन कक्षा का प्रपंच कर रहे हैं।

राजश्री यादव
शिक्षिका और साहित्यकार

आगरा से शिक्षिका और साहित्यकार राजश्री यादव के अनुसार, “आर्थिक स्थिति बिगड़ चुकी है। ऐसे में देश के सभी शिक्षण संस्थाओं ने माता-पिता पर फीस के लिए दबाब बनाना शुरू कर दिया है । कई जगह इसका विरोध भी किया गया कि ‘पढ़ाई नहीं तो फीस नहीं’। अन्ततः, शिक्षणसंस्थाओं-द्वारा ऑन-लाइन पढ़ाने की प्रक्रिया शुरू की गयी है। हमारे यहाँ बेसिक शिक्षा विभाग ने एक तरफ एक फरमान जारी कर दिया है कि जब तक कोरोना के चलते परिस्थितियाँ सामान्य नहीं हो जातीं तब तक सभी शिक्षकों को व्हाट्सएप ग्रुप बनाकर बच्चों को रोज शिक्षणकार्य कराया जाये।

दूसरी तरफ़ विद्यालय में नामांकित सभी छात्र -छात्राओं के माता -पिता का बैंक खाता संख्या और बच्चों की आधारकार्ड संख्या माँगी जा रही है । अब सरकार से कोई यह पूछे कि आप जिस बच्चे के माता-पिता, जो कि मजदूर हैं और जिनके खाते में आप 370 रुपये आर्थिक मदद और क़रीब 5 से 7 किलोग्राम चावल दे रहे हैं, क्या उनके पास स्मार्टफोन और मोबाइल डाटा उपलब्ध होगा, जिससे वे अपने बच्चों को ऑनलाइन क्लासेस के तहत पढ़ा सकें? इधर,अध्यापकों पर तलवार लटका दी जाती है कि यदि कोई शिक्षक बच्चों को व्हाट्सएप ग्रुप से जोड़कर शिक्षण कार्य नहीं करायेगा तो उस पर विभागीय कार्रवाही की जायेगी अब विचारणीय प्रश्न है– क्या यथार्थ में यह सम्भव है, जिनके पास खाने के लिए पैसे नहीं हैं, वे ‘स्मार्टफोन’ कैसे ख़रीद सकेंगे?

डॉ० प्रदीप चित्रांशी
साहित्यकार

हैदराबाद से साहित्यकार डॉ० प्रदीप चित्रांशी ने विशिष्ट अतिथि के रूप में कहा,” ऑनलाइन शिक्षा-व्यवस्था के तहत निजी शिक्षण संस्थानों के द्वारा भारतीय अभिभावक दोहरी मार झेल रहे हैं। बच्चों को बिना विद्यालय भेजे ही शिक्षाशुल्क जमा कर रहे हैं तो दूसरी ओर, इंटरनेट के शुल्क का भार भी वहन कर रहे हैं, साथ ही अभिभावकों की एक बड़ी संख्या है, जिन्होंने किश्त पर या कर्ज लेकर एंड्रायड मोबाइल खरीदा है। सच तो यह भी है कि कोरोना महामारी में कुछ अभिभावक नौकरी से हाथ धो बैठे हैं तो कुछ आधे-तिहाई पगार पर किसी तरह परिवार का ख़र्च चला रहे हैं। अभिभावकों की इस आर्थिक परेशानी से जहाँ सरकार ने अपना पल्ला झाड़ लिया है, वहीं विपक्षी दल भी मौन साधे हुए हैं। ऐसे में, उन अभिभावकों को, जिनके पास इंटरनेट की सुविधा नहीं है या इंटरनेट का भार वहन नहीं कर सकते, उन्हें खुद ही आगे आकर कहना पड़ेगा कि विद्यालय अपने-अपने विद्यार्थियों के घर पर फ्री इंटरनेट की व्यवस्था करे वर्ना पढ़ाई नहीं तो फीस नहीं।”

प्रो० सुरेशचन्द्र द्विवेदी

इलाहाबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय में पूर्व-अँगरेजी- विभागाध्यक्ष प्रो० सुरेशचन्द्र द्विवेदी ने कहा, “सरकार की ग़लत नीतियों के कारण आज सभी की आर्थित स्थिति डाँवाडोल है। माता-पिता अपनी व्यक्तिगत परेशानियों में उलझे हुए हैं। ऐसे में विद्यालयों की ओर से एक अतिरिक्त आर्थिक बोझ उनके लिए असह्य हो चुका है।”

घनश्याम अवस्थी
साहित्यकार

गोंडा से साहित्यकार घनश्याम अवस्थी ने बताया, “अब लाॅकडाउन के दौरान समाज के अधिसंख्य परिवारों की कमाई प्रतिकूलत: प्रभावित है, ऐसे में भी शैक्षिक संस्थानों द्वारा विद्यार्थियों के अभिभावकों से पूरी फ़ीस लेना अनुचित है, जबकि कक्षाएँ संचालित नहीं होने से विद्युत-खपत समेत कई व्ययभार से ये संस्थान कुछ हद तक मुक्त भी हैं। पूरी फ़ीस वसूली की यह मंशा, उनमें संवेदनशीलता के ह्रास का परिचायक है।”

अशोक कुमार पाण्डेय
अधिवक्ता

बलिया से अधिवक्ता अशोक कुमार पाण्डेय की मान्यता है कि अधिकांश प्राइवेट स्कूल लूट की संस्था हैं। बहुत ही सुनियोजित ढंग से लोकसेवक और प्राइवेट स्कूलों के प्रबंधकों ने सरकारी स्कूलों की व्यवस्था को हतोत्साहित कर दिया है और अभिभावक सामाजिक दबाव में प्राइवेट स्कूल की व्यवस्था को अपना रहे हैं। वर्तमान परिस्थिति में मेरा यह सुझाव है कि वे अभिभावक जो सरकारी सेवा में हैं और सहजतापूर्वक फीस दे सकते हैं, वे वस्तुस्थिति को समझते हुए स्वेच्छा से फ़ीस दे सकते हैं। और हाँ, जो विद्यालय फीस ले रहे हैं, वे अभिभावकों के पैसों से अपने कर्मचारियों का वेतन-भुगतान करें।”

डॉ० सरिता सिंह परिहार,
शिक्षिका

प्रयागराज से शिक्षिका डॉ० सरिता सिंह परिहार का विचार है, “ऑनलाइन शिक्षा वर्तमान संकट की घड़ी में ‘मजबूरी में जरूरी’ तो हो सकता है; पर गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का विकल्प बिलकुल नहीं हो सकता। औसत बुद्धि के बच्चे जब आनलाइन कक्षा से ऊब जाते हैं तब मोबाइल से ही गेम खेलने लग जाते हैं, जिससे अधिकतर अभिभावक इससे अनजान ही रहते हैं। कक्षाओं से कुशाग्र बुद्धि बालकों की पढ़ाई के प्रति औसतन में रुचि स्थिर तो है; लेकिन कभी-कभी उनकी भी बुद्धि यायावरी हो जाती है। विद्यालयों द्वारा निर्धारित सम्पूर्ण शुल्क लिया जाना सर्वथा अनुचित है; क्योंकि प्रबन्धतंत्र पढ़ाई के नाम पर मात्र औपचारिकता का प्रदर्शन करवा रहा है। पिछड़े तबके के पास स्मार्टफोन, कम्प्यूटर, डेटा आदि नहीं हैं, इसलिए वे ऑनलाइन के लाभ से वंचित रह जायेंगे। स्मार्टफोन, कम्प्यूटर, डेटा आदि की लागत और क्लास रूम शिक्षा की लागत का अंतर अगर देखें तो समझ आ जायेगा कि इसी तर्क का इस्तेमाल कर दलित-पिछड़े तबके को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा से बाहर किया जा रहा है। प्रबन्धतंत्र अपने शिक्षकों को वेतन और भी अन्य मदों का अनिवार्य खर्च बताकर अभिभावकों से शुल्क की वसूली कर रहा है; परन्तु अंदर की बात तो ये है कि कुछ शिक्षकों को चौथाई तो किसी को आधा तो किसी को मात्र नौकरी में बने रहने का हवाला देकर काम ले रहा है।”