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‘सर्जनपीठ’, प्रयागराज का ‘ऑन-लाइन राष्ट्रीय बौद्धिक परिसंवाद समारोह’ सम्पन्न

उत्तरप्रदेश में अपराध की गोद में खेलती-कूदती राजनीति

इधर, कुछ वर्षों से उत्तरप्रदेश में गुण्डा-तत्त्वों को राजनीतिक और पुलिस-संरक्षण मिलने के कारण जनसमान्य का जीना दूभर हो गया है। ऐसे में, आपराधिक तत्त्वों से निबटने के लिए कैसी रणनीति हो, इस पर ‘सर्जनपीठ’, प्रयागराज की ओर से ८ जुलाई को ‘ऑन-लाइन राष्ट्रीय बौद्धिक परिसंवाद समारोह’ का आयोजन किया गया था, जिसमें देश के बुद्धिजीवीवर्ग की सहभागिता थी।

कृष्ण नारायण पाठक (चिन्तक- विचारक, बेंगलुरु)

कृष्ण नारायण पाठक (चिन्तक- विचारक, बेंगलुरु) की मान्यता है, “अराजक माहौल से मुक्ति-हेतु शासक को दूरदर्शिता दिखाते हुए, अन्तर्मन से विधि-व्यवस्था के प्रति जनमानस में विश्वास जगाना पड़ेगा। व्यापक दृष्टि पर प्रसारित इस सन्देश से जनसामान्य में सरकार के प्रति बनता भरोसा, गुण्डों-माफ़ियाओं के प्रति खड़े होने का नैतिक बल प्रदायक होगा। निश्चिन्त रहने की स्थितिवाली उ० प्र० सरकार राजनैतिक नफ़ा-नुकसान के गणित से बाहर रहकर, प्रशासन को राजनैतिक हस्तक्षेप से मुक्त होने का विश्वास जगाये। क्रियात्मक शक्तिसम्पन्न प्रशासकों में यह अंकुश रहने का संकेत स्पष्टतः दिखाये कि पक्षधरता किसी क़ीमत पर बरदाश्त नहीं होगी। शासन विधि-व्यवस्था की धज्जी उड़ानेवालों के साथ अपनी गोपनीय व्यूहरचना के अन्तर्गत ऐसी काररवाई कराये, जो अन्य के लिए एक अभूतपूर्व सबक़ बन जाये। सरकार को भरोसा करना होगा कि उसके कठोर शासन का परिणाम चुनाव में भी अनुकूल मिलेगा। आर्थिक अपराध अन्य अपराधों के लिए खाद-पानी है, अतः इन अपराधियों की सम्पत्ति हर हाल में, उनके काम में आने लायक़ न छोड़ी जाये। किसी भी अपराधी की पैरवी करने और उसके साथ दिखनेवाले को, उस अपराधी से भी ‘बड़ा अपराधी’ मानने की व्यवस्था बनायी जाये।”

रामाशीष तिवारी ‘शजर’ (अध्यापक, गोण्डा)

रामाशीष तिवारी ‘शजर’ (अध्यापक, गोण्डा) ने कहा, “समय-समय पर गठित आयोगों-द्वारा प्रेषित सुझावों पर तत्काल अमल करते हुए जीर्ण-शीर्ण पुलिस सेवा-नियमावली में व्यापक संशोधन हों। निचले स्तर के कार्मिकों के वेतन-भत्तों आदिक पर सहानुभूतिपूर्वक विचार करते हुए उन्हें सम्मानजनक वेतनमान/मानदेय दिया जाये। इससे पुलिस के प्रति समाज में व्याप्त नकारात्मक धारणा समाप्त होगी और वह अपना कार्य ईमानदारी से कर सकेगी। कथित जनसेवकों के अन्तःवास पर सुरक्षा-पहरा दे रहे सुरक्षा-बलों को जनमानस की सुरक्षा में नियुक्त किया जाये। उच्च पदों पर अधिकारियों की नियुक्ति राजनीतिक द्वेष-भाव से न हो, वरन उनके कार्यकाल की उपलब्धियों से हो। साल-दो-साल के बचे कार्यकाल में ‘पुरस्कार- स्वरूप’ पद न देकर न्यूनतम साल सेवा दे सकनेवाले अधिकारी का पदस्थापन किया जाये। राजनैतिक संरक्षण/पक्षपात समाप्त हो। अपराध की विवेचना के दौरान अधिकारी/कार्मिकों के तबादले न किये जायें। सर्वाधिक समस्या अवैध बालू-खनन की है, जो प्रशासन की मिलीभगत के बिना सम्भव नहीं। पुलिस यदि किसी को पकड़ती भी है तो उच्च-पदस्थ अधिकारी अनुचित लाभ प्राप्त कर उन्हें अभयदान करते हैं, जिससे पुलिस-बल निराश होता है। स्थानीय थाना, कोतवाली, चौकी की यह ज़िम्मेदारी हो कि वे अपने कार्यक्षेत्र में जनमानस के बीच पहुँचें और समाज में स्वयं के प्रति व्याप्त धारणा को सौहार्दपूर्ण तरीक़े से बदले, ताकि समाज में पुलिस की छवि स्वस्थ बन सके।”

गौरव अवस्थी (वरिष्ठ पत्रकार, रायबरेली)

गौरव अवस्थी (वरिष्ठ पत्रकार, रायबरेली) ने कहा, “अपराधी और राजनीति के गठजोड़ को तोड़ने के लिए चुनाव आयोग को अपने बनाये नियम बदलने होंगे। अपराधियों को चुनाव लड़ने से रोकने के लिए सज़ायाफ़्ता होना काफ़ी नहीं है; क्योंकि बड़े-बड़े अपराधी कभी दण्डित होते ही नहीं। इसका कारण है कि ऐसे दुर्दान्त अपराधियों के ख़िलाफ़ गवाही देने का साहस तो ख़ुद पुलिस वाले नहीं कर पाते तो आम जनता से क्या उम्मीद की जाये। इसे समझने के लिए विकास दुबे-प्रकरण का उदाहरण काफ़ी है। पुलिसतन्त्र में भी बदलाव की इच्छाशक्ति राजनेताओं में बलशाली बनाने की पहली कवायद तो आम जनता को ही करनी होगी। ऐसे नेताओं को जनता ताक़त दे, जो अपराधियों की सफ़ाई और जनता की सुरक्षा की प्राथमिकता व्यक्त ही न करे, अपितु उसे कर के भी दिखाये। अब समय आ गया है कि जनता को ही अपनी प्राथमिकताएँ बदलनी पड़ेंगी, अन्यथा वह दौर शुरू हो चुका है, जहाँ पुलिसवाले ही सुरक्षित नहीं है तो आम जनता की क्या बिसात?”

अभिलाष नारायण (वरिष्ठ पत्रकार और रंगकर्मी, प्रयागराज)

अभिलाष नारायण (वरिष्ठ पत्रकार और रंगकर्मी, प्रयागराज) का कथन है, “समस्या के मूल में है, पुलिस का चरम सीमा तक भ्रष्टाचार में लिप्त रहना। यह आम धारणा है कि ख़ाकी निष्कलंक हो ही नहीं सकती और वर्दीधारी इस धारण को नित्य ही मूर्त रूप देते रहते हैं। अब उनके ऊपर अंकुश आवश्यक है, पर यह असम्भव सा दिखता है; क्यों कि अपराधियों को राजनीतिक संरक्षण प्राप्त रहता है। ऐसे में, पुलिस पर अंकुश लगे कैसे? आवश्यकता है एक क्रूर; किन्तु ईमानदार शासक की, जो वोट की परवाह किये बिना दूध का दूध और पानी का पानी कर सके।”

डॉ० प्रभात ओझा (वरिष्ठ पत्रकार, नोएडा)

डॉ० प्रभात ओझा (वरिष्ठ पत्रकार, नोएडा) का मानना है, “जब तक राजनीति में अपराधी आते रहेंगे, पुलिस लाचार होगी; लिहाजा सबसे पहले निर्वाचन- प्रक्रिया में सुधार कर अपराधियों का राजनीति में प्रवेश पर रोक लगाना होगा। राजनीति और सत्ता में आये राजनेताओं से ही पुलिस-सुधार की उम्मीद की जा सकती है। अपराधी क़िस्म के राजनेता सत्ता में हों तो पुलिस का निष्पक्ष होना मुमकिन नहीं है। सख़्त सरकार ही पुलिस को नियन्त्रित कर सकती है। ऐसे में, पुलिस के बीच अपराधियों के मुख़बिर भी पैदा नहीं होंगे। राजनीति के अपराधीकरण की जड़ें किसी राज्य और पार्टी- विशेष के भीतर तक ही नहीं हैं, अपितु निर्वाचनक्षेत्रों में दबंगों को बढ़ावा देनेवाले राजनेताओं की नाक के नीचे अभयदान की मुद्रा में सुरक्षित है। पानी नाक के ऊपर पहुँच जाने पर नियन्त्रण बहुत मुश्किल हो जाता है। सच यह है कि पूरे कुएँ में भाँग घुली है। अब उस कुएँ को उलट देने की ज़रूरत है।”

डी० के० सिंह (अध्यापक और साहित्यकार, प्रयागराज)

डी० के० सिंह (अध्यापक और साहित्यकार, प्रयागराज) का मत है, “नेता पुलिस को अपने अधीन रखने का प्रयास करते हैं। अधिकतर नेता वही होते हैं, जो प्रारम्भ में अपराधी रहे हैं। चुनाव-प्रक्रिया में आपराधिक इतिहासवालों को कोई भी पार्टी टिकट न दे और जनता भी दाग़ियों को मत न दे। अगर सही कोई न हों तो ‘नोटा’ का प्रयोग करे, तभी पुलिस कुछ सकारात्मक कर पायेगी।”

डॉ० संगीता बलवन्त (राजनेत्री और साहित्यकार, ग़ाज़ीपुर)

डॉ० संगीता बलवन्त (राजनेत्री और साहित्यकार, ग़ाज़ीपुर) का कथन है, “किसी भी सभ्य समाज के लिए अपराध निन्दनीय है। अपराध को कम करने के लिए किसी भी शासन में कठोर सज़ा की व्यवस्था रही है। उससे अपराधी का हौसला कम होता है और वह अपराध करने से बचता है। अपराधी के राजनीतिक संरक्षण पर विराम लग जाये तो वह निहत्था हो जायेगा और उसका अपराध का कारोबार फूले फलेगा नहीं। अपराधी का कोई जाति धर्म नहीं होता। इस विचार को मानते हुए, सरकार, मीडिया तथा नागरिक को अपराध के विरुद्ध सदैव खड़े रहना चाहिए। उत्तरप्रदेश-सरकार सुशासन के लिए कटिबद्ध है और अपराधी किसी भी हालत में बख़्शे नहीं जायेंगे।”

डॉ० घनश्याम भारती (अध्यापक और साहित्यकार, सागर)

डॉ० घनश्याम भारती (अध्यापक और साहित्यकार, सागर) ने कहा, “राजनेताओं और पुलिस-अधिकारियों को चाहिए कि संघटित होकर राज्यहित में बढ़ रही आपराधिक गतिविधियों का समूल विनाश करने के लिए अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति का परिचय दें। पुलिसबल को राजनीति के कुचक्रों से दूर रखना अनिवार्य है; क्योंकि अपराधियों के राजनीतिक संरक्षण के कारण पुलिसतन्त्र लाचार रहता है।”

अशोक पाण्डेय (अधिवक्ता, बलिया)

अशोक पाण्डेय (अधिवक्ता, बलिया) की मान्यता है, “अपराध समाप्त करने के लिए मूल कर्त्तव्य की प्राथमिकता जन-जागरण, सामाजिक सेवा संघटन तथा सरकार की विभिन्न नीतियों के माध्यम से प्राथमिकता सुनिश्चित करनी होगी। अपराधों पर नियन्त्रण-हेतु विधायिका-द्वारा पारित क़ानून की कमी नहीं है, अपितु क़ानून का सही दिशा में क्रियान्वयन कराने में राज्य-शासन की सुदृढ़ इच्छाशक्ति दिखनी चाहिए। यही कारण है कि अराजक तत्त्व क़ानून के व्यावहारिक लचीलापन के कारण अपराध को व्यवसायिक कैरियर के रूप में अपनाते आ रहे हैं। आवश्यकता है, कार्यपालिका और न्यायपालिका का दायित्व सुनिश्चित किया जाये, अर्थात् अपराधिक मामलों का निस्तारण- हेतु एक समय-सीमा निर्धारित की जाये। जनसंख्या के आधार पर प्रशासनिक और पुलिसव्यवस्था का होना अनिवार्य है।”

परिसंवाद-आयोजक आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

परिसंवाद-आयोजक आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय की अवधारणा है, “अपराध बनाम राजनीति और राजनीति बनाम अपराध की युगों से चली आ रही परम्परा का अवसान करना होगा। इसके लिए उत्तरप्रदेश-शासन को क्षुद्र स्वार्थ और ‘स्वयम्भू निरंकुश शासक’ बनने की कुत्सित चाह छोड़कर जनगण की सुरक्षा प्राथमिकता होनी चाहिए। राज्य में पुलिसकर्मियों की संख्या यहाँ की जनसंख्या को देखते हुए बहुत छोटी है। अपराधियों के लिए एक ही क़ानून पर्याप्त है, इसका जिस दिन से कठोरतापूर्वक पालन होने लग गया तो अपराधी ‘अपराध करने का विचार तक’ नहीं लायेगा। यदि शासक चरित्रवान्, धीरोदात्त तथा प्रजापालक रहेगा तो उसके सभी तन्त्र सत्यनिष्ठा के साथ सक्रिय रहेंगे। मात्र सत्ता की राजनीति अपराधियों का हौसला बलन्द करती आ रही है। इसका मोह त्यागकर मुख्यमन्त्री को एक स्वस्थ प्रजापालक बनना होगा।”

अन्त में, परिसंवाद-आयोजक ने सहभागियों के प्रति अपनी कृतज्ञता प्रकट की।

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