एक परमात्मा का सुमिरन करने वाला शुद्ध धार्मिक है :- स्वामी निर्मलानंद महाराज

भवानीमंडी:- यथार्थ गीता प्रेमी भक्त मण्डल भवानीमंडी के तत्वाधान में परमहंस स्वामी परम पूज्य श्री अड़गड़ानंद जी महाराज के कृपापात्र स्वामी श्री निर्मलानन्द जी महाराज के भव्य सत्संग एवम प्रवचन का आयोजन जैन बोर्डिंग धर्मशाला भवानीमंडी में शुक्रवार को किया गया।
सत्संग के दौरान स्वामी निर्मलानंद जी महाराज ने कहा की” ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरनमामनुस्मरन । य प्रयाति त्यांजदेहम स याति परमां गतिम।।” प्रत्येक मनुष्य को सम्पूर्ण भाव से एक ईश्वर के नाम ओम जो अक्षय ब्रह्म का परिचायक है उसका जप करना चाहिए और तत्वदर्शी महापुरुष का ध्यान करना चाहिए। यथार्थ गीता को न समझने के कारण ही देश मे समस्याएं बढ़ रही है। सभी समस्याओं का समाधान मानव मात्र का धर्मशास्त्र केवल यथार्थ गीता है। हम सब का शास्त्र यथार्थ गीता है। महाराज श्री ने भजन की चार अवस्थाएं बैखरी, मध्यमा ,पश्यन्ति,परा की सुन्दर व्याख्या की। उन्होंने यथार्थ गीता व रामचरित्रमानस के माध्यम से कर्म, धर्म, योग, आस्तिक , नास्तिक जैसे विषयों पर सत्संग किया।

गीता आदि शास्त्र है। गीता संस्कृत में श्लोक होने से सम्पूर्ण जनमानस नहीं समझ पाता है। इसके लिए यथार्थ गीता ही एकमात्र विशुद्ध व्याख्या है जिसमे जनसाधारण लोग भी गीता के रहस्यमय अति गोपनीय भगवान श्रीकृष्ण व अर्जुन के संवाद को बड़ी सरलता से समझ सकते हैं। भगवान श्रीकृष्ण के अनुसार गीतोक्त युद्ध व गीतोक्त स्थल दोनों ह्रदय देश की वस्तु हैं गीता के प्रमुख प्रश्न कर्म,धर्म वेद व्यवस्था, प्रमुख है। सम्पूर्ण गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहीं भी यह नहीं कहा कि कृष्ण का जप कर। ॐ का जप व सतगुरु का ध्यान बताया।भगवान श्रीकृष्ण ने मानव मात्र के कल्याण के लिए एक परमात्मा में सम्पूर्ण श्रद्धा ॐ का जप व सद्गुरु का ध्यान यदि इतना करना बन गया तो वह शुद्ध धार्मिक है निश्चित ही उसका परम कल्याण होगा।

गीता के अनुसार परमात्मा का भजन अत्यन्त पापी दुराचारी ही क्यों न हो अनन्य भाव परमात्मा का चिंतन करने पर वह भी एक दिन साधु के समान हो जाता है व परम कल्याण को प्राप्त हो जाता है। महाराज श्री ने भक्तगणों को अपने कर कमलों से मानवधर्म शास्त्र यथार्थ प्रदान की।

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