सई नदी की करुण कथा : पौराणिक और ऐतिहासिक नदी मर रही है

आप उतना ही कहें जितना अपने कहे हुए को पूरा कर सकें

आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

आचार्य पण्डित पृथ्वीनाथ पाण्डेय का संदेश

आप उतना ही कहें जितना अपने कहे हुए को पूरा कर सकें (कथनी-करनी एक-जैसी रहे और दिखे।)

मै ऐसे किसी भी व्यक्ति को पसन्द नहीं करता, जो अपने 'कर्म और कथन' के स्तर पर 'अविश्वसनीय' लगे। ऐसे लोग 'धूर्त्त' और 'अवसरवादी' होते हैं। मै ऐसे लोग को अपने 'मन' से हमेशा के लिए 'बाहर' का रास्ता दिखा देता हूँ; क्योंकि मै जितना कहता हूँ उतना करता हूँ, इसलिए दूसरे से भी वैसी ही अपेक्षा बनी रहती है।
 
आप भी ऐसा मार्ग अपनायें, ताकि 'धूर्त्त' और 'मक्कार' लोग से दूरी बनी रहे तथा आप सुखपूर्वक निष्कण्टक (बाधारहित, व्यतिक्रमरहित, व्यवधानरहित) अपने गन्तव्य की ओर अग्रसर रहें।
  
आप यदि किसी के पास कोई भाव वा (अथवा) विचार अथवा अन्य कोई सामग्री प्रेषित करते हों और उधर से न तो कोई अभिक्रिया प्राप्त होती हो और न ही प्रतिक्रिया तो वैसे लोग से धीरे-धीरे दूरी बनाने की स्थिति मे आते रहें तथा प्रतीक्षा करते रहें, कदाचित् वे लोग अपने आचरणदोष मे परिष्कार ला सकें; 'अन्यथा' की दशा मे (विपरीत स्थिति) "तू अपने घर-मै अपने घर" की नीति का प्रतिपादन करने के प्रति सन्नद्ध हो जायें और उसे परिणाम तक पहुँचायें।
 
आप यदि अपनी कथनी-करनी तथा कर्म-प्रतिबद्धता के प्रति एकरूप हैं तो स्वयं को मानसिक स्तर पर सुदृढ़ करते हुए, अविचल (जो विचलित न हो।) स्वावलम्बी बनायें। आपको किसी भी स्तर पर परमुखापेक्षी (दूसरों से अपेक्षा करनेवाला) न होना पड़े। इसके लिए आप अपने और अपने परिवार की समस्त सदस्य-सदस्याओं के स्वाभिमानपूर्वक जीवन-यापन (जीवन व्यतीत, जीवन जीने) करने के लिए समस्त अपरिहार्य (अनिवार्य) संसाधन और सुविधाओं की व्यवस्था कर दें। ऐसी स्थिति मे, आप स्वतन्त्र मतिगतिरति के साथ स्वयं को कुछ 'उठा हुआ' (उन्नत) अनुभव करते हैं, जो आपकी 'जिजीविषा' (जीने की इच्छा) और 'जिगीषा' (जीतने की इच्छा) को ऊर्जा प्रदान करता है।
  
आइए! छल-छद्म चरित्र जीनेवालों-वालियों का अभिज्ञान (पहचान) करें और अपनी ज्ञानेन्द्रियों को सजग और समयसत्य करते हुए, उनसे सुदूर बने रहें।

(सर्वाधिकार सुरक्षित― आचार्य पं० पृथ्वीनाथ पाण्डेय, प्रयागराज; १५ जनवरी, २०२३ ईसवी।)