उत्तरप्रदेश के मुख्यमन्त्री ‘आदित्यनाथ योगी’ के नाम ‘डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय’ का मुक्त पत्र

भाषाविद्-समीक्षक डॉ० पृथ्वीनाथ पाण्डेय

महोदय!

      उत्तरप्रदेश राज्य में जी रहे जनसामान्य का जीवन आज जितना आतंकपूर्ण है उतना कभी नहीं रहा। जिस भाँति आपके राज्य की सरकार अकल्पनीय-अप्रत्याशित निर्णय कर राज्य के नागरिकों को हतप्रभ और भयभीत करती आ रही है, वह किसी भी शासन की दीर्घायु पर प्रश्नचिह्न लगा देती है। आपने शासन में आने से पूर्व चुनावी सभा में जो-जो भरोसा दिलाये थे, वे आपके सत्तासीन होते ही कर्पूर की टिकिया की भाँति उड़ चुके हैं। कहाँ है, आपकी समदर्शिता? कहाँ है, एक योगी-जैसा चरित्र, जो सर्वकल्याण का शंखनाद करता है। अहम्मन्यता का भाव-विचार 'सर्वनाश' की ओर ले जाता है। 'नाथ-सम्प्रदाय' के मूलभूत सिद्धान्त 'प्रेय-श्रेय', 'योग-क्षेम' वहन करने के प्रति आग्रहवान रहा है, जबकि आपका सिद्धान्त और आचरण "एकोहम् द्वितीयो नास्ति" का रहा है। आपमें योगी-तत्त्व कितना है, यह अज्ञात है; परन्तु यह अवश्य ज्ञात है कि आपका शासन अत्याचारियों को प्रश्रय देता आ रहा है।     
      उत्तरप्रदेश राज्य वर्तमान में अपराध का गढ़ बन चुका है। एक भी नागरिक, चाहे वह किसी भी स्तर का हो, कहीं से भी सुरक्षित नहीं है। राज्य में जिन शिक्षित विद्यार्थियों को विनियोजित किया जाना चाहिए और न्यायिक आधार पर जिनका अधिकार है, उन्हें वर्षों से उनके अधिकार से वंचित रखा जा रहा है; एक बच्ची से लेकर वयोवृद्धा तक असुरक्षित हैं; शीलहरण तो सामान्य घटना बन चुकी है, इसे राज्य के नागरिकों ने भली-भाँति देख लिया है और यह भी अनुभव कर लिया है कि आपके दल के साथ सम्बद्ध राजनेताओं के व्याभिचारिक और जघन्य कर्मों के सप्रमाण सार्वजनिक होने पर भी आप-द्वारा संचालित शासन की ओर से किस प्रकार से उनका संरक्षण किया जाता है।     
      आपने लगभग २५ हज़ार 'गृह-आरक्षियों' (होम गाड् र्स) को इस आधार पर पदमुक्त करने का निर्णय सार्वजनिक कर दिया है कि उन्हें वेतन देने के लिए शासन के पास 'परिव्यय' (बजट) नहीं है। इस निर्णय से उनके परिवारों के लाखों सदस्य दुष्प्रभावित हो चुके हैं।  दूसरी ओर, १४ लाख २ हज़ार अराजपत्रित कर्मचारियों को अकस्मात् 'बोनस' (३० दिनों के वेतन के बराबर) देने के लिए आपका वही कथित 'बजट' बन गया, जिसके कारण राज्य के राजस्व पर ६०८ करोड़ रुपये का भार पड़ेगा। यह कैसा विरोधाभास निर्णय है।
     निस्सन्देह, आप शाब्दिक योगी हैं, कार्मिक नहीं, अन्यथा समदर्शी होते। मुख्यमन्त्री किसी राज्य का 'संरक्षक' होता है, 'विध्वंसक' नहीं। बलप्रयोग कर शासन करनेवाला अल्पजीवी होता है; उसका पापकर्म उसपर प्रत्येक क्षण प्रभावी रहता है। 

    अयोध्या में लाखों-करोड़ों दीपक जलाकर निरर्थक हिन्दुत्व का पोषण करने के लिए दीपक, बाती, तैलादिक के लिए करोड़ों रुपये की धनराशि कहाँ से आपके पास आयी है, इस पर विचार किया है? 

    अतिवाद के दीये की ज्योति दीर्घकालिक नहीं होती; भभक कर निष्प्रभ हो जाती है।        

    राज्य में बड़ी संख्या में समस्याएँ हैं, जिनके निराकरण की ओर से शासन उदासीन है। राज्यपाल, मुख्यमन्त्री, विधायकों, मन्त्रियों, महापौरों, प्रशासकीय अधिकारियों आदिक को वेतन-भत्ते के अतिरिक्त जो अन्य सुविधाएँ दी जा रही हैं, उन्हें घटाने के लिए शासन के संचालक क्यों नहीं विचार कर रहे हैं? उत्तरप्रदेश हिन्दी संस्थान, संस्कृत संस्थानम्, भाषा संस्थान, उर्दू संस्थान आदिक में जो प्रतिवर्ष करोड़ों रुपये के पुरस्कार "मैं तेरा-तू मेरा" के आधार पर बाँट दिये जाते हैं, उन्हें क्यों नहीं समाप्त किये जाते? वहाँ से जो सेवानिवृत्त हो चुके हैं, उन्हें वहाँ पर उनका सेवाविस्तार कर क्यों रखा गया है? इस पर उत्तरप्रदेश शासन मौन है। उन संस्थानों में अयोग्य कर्मचारी कार्यरत हैं, उन्हें क्यों नहीं पदमुक्त किया जाता?

     आक्रोशित मन की बातें बहुत हैं; फिर कभी लिखूँगा।
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